अन्ना के लिए दीवानगी नहीं बची

राजेश माहेश्वरी
प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे एक बार फिर अनशन पर हैं लेकिन इस बार उनका आंदोलन पिछली बार से अलग है। साल 2011 में अन्ना आंदोलन का जोर संसद से जन लोकपाल विधेयक पारित कराने पर केंद्रित था लेकिन इस बार के आंदोलन में कई अन्य मुद्दे भी जुड़े गए हैं। अन्ना इस बार अपना आंदोलन किसानों की समस्याओं के निराकरण, लोकपाल-लोकायुक्त कानून, चुनाव सुधार एवं अन्य मांगों को लेकर कर रहे हैं। खास बात है कि पिछले आंदोलन को सफल बनाने वाले चेहरे इस बार नहीं दिखाई देंगे। अन्ना ने इस बार नए चेहरों पर विश्वास जिताया है जिनके हाथ आंदोलन के संचालन की बागडोर होगी। यह नई टीम रामलीला मैदान में ठीक उसी तरह आंदोलन का संचालन करेगी जैसा कि 2011 में अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया, कुमार विश्वास और किरण बेदी ने किया था। जब अन्ना ने 2011 में आंदोलन किया था तब देश में भ्रष्टाचार एक प्रमुख मुद्दा था और कई घोटाले की खबर सामने आ रही थी। आज हालात वैसे नहीं हैं लेकिन इसका मतलब यह तो नहीं कि जनलोकपाल और लोकायुक्त की जरूरत खत्म हो गई। अन्ना के दिल्ली में रामलीला मैदान के उनके पिछले बड़े आयोजन में लाखों की भीड़ उमड़ी थी। मैं भी अन्ना, तू भी अन्ना, अब तो सारा देश है अन्ना के नारे सर्वत्र सुनाई देने लगे। 1974 के लोक नायक जयप्रकाश की याद इस गांधीवादी वृद्ध ने ताजा कर दी। इसके आगे वही हुआ जो गांधी, विनोबा और जयप्रकाश के साथ हो चुका था। अन्ना के कंधों पर चढ़कर कुछ लोग सत्ता की कुर्सी पर जा बैठे। लोकपाल ठंडे बस्ते में चला गया और भ्रष्टाचार के खिलाफ लडने वाले सूरमा खुद भ्रष्टाचार के गंदे नाले में डुबकी लगाने में व्यस्त हो चले। लाखों की जनसभा से निकलकर बेचारे अन्ना पूरी तरह अपने गांव में सिमटकर रह गए। उनके प्रति कोई दीवानगी नहीं बची। भले ही सब उनका सम्मान करते हों किन्तु उनके उपदेश उबाऊ लगने लगे। सवाल ये है कि अन्ना का ताजा आंदोलन क्या पहले जैसा प्रभाव छोड़ सकेगा और क्या केजरीवाल एंड कम्पनी के सहयोग के बगैर वे वैसा दबाव बना पाएंगी। अन्ना हजारे की पहली मांग वही है जो 2011 में थी यानी जनलोकपाल बिल। अन्ना की मांग है कि सिविल सोसायटी द्वारा ड्राफ्ट किए गए जनलोकपाल बिल को लागू किया जाए। जनलोकपाल एक स्वतंत्र संस्था होगी जो भ्रष्टाचार के मामलों की एक साल के भीतर जांच पूरा कर लेगी। अन्ना हजारे की दूसरी मांग राज्यों में लोकायुक्त की नियुक्ति को लेकर है। उनका कहना है कि एक बार लोकायुक्त की नियुक्ति होने पर उनका स्थानातंरण नहीं किया जा सकता और नहीं उन्हें पद से हटाया जाएगा। पद से हटाने के लिए विधानसभा से महाभियोग प्रस्ताव को पास कराना होगा। अन्ना की तीसरी मांग है कि स्वामीनाथन रिपोर्ट को लागू किया जाए। भारत में हरित क्रांति के जनक प्रोफेसर एमएस स्वामीनाथन की अध्यक्षता में नेशनल कमीशन फॉर फारमर्स ने दिसंबर 2004 से अक्टूबर 2006 के बीच में पांच रिपोर्ट सरकार को सौंपी थी। इन रिपोर्ट में किसानों से जुड़े तमाम मुद्दों को शामिल किया गया है। साथ ही साथ उसके समाधान के लिए भी बातें सुझाई गई हैं। अन्ना ने नरेंद्र मोदी सरकार को 43 बार पत्र लिख कर इन मुद्दों पर चर्चा करने के लिए समय मांगा था लेकिन सरकार के तरफ से कोई जवाब नहीं आया। अन्ना ने कहा कि सरकार के इस रवैये से हार कर अनशन कर रहा हूं। अन्ना के 43 पत्रों का जवाब नहीं देना बताता है कि सरकार इन मुद्दों को लेकर कितनी गंभीर है। अन्ना के मुद्दे कुछ नए और कुछ बरसों पुराने हैं। हां, सहयोगी जरूर बदले-बदले से हैं। किसान भी उनका साथ देने आ गए हैं। संसद के सत्र के कारण दिल्ली में वैसे भी गहमागहमी है। विपक्षी एकता की नई-नई मुहिम चल पड़ी हैं। मोदी सरकार 2019 के चुनाव की तैयारी में जुटी है वहीं कांग्रेस अपने पुनरुद्धार के लिए हाथ पांव मार रही है। ममता बनर्जी और कुछ अन्य नेता तीसरे मोर्चे के पुनर्जन्म के लिए प्रयासरत हैं। ऐसे में अन्ना के गांधीवादी अनशन पर कौन ध्यान देगा और क्यों देगा ये बड़ा सवाल है। जिन टीवी चौनलों ने अन्ना का लाइव कवरेज करते हुए अपनी टीआरपी बढा ली थी वे इस बार भी क्या उन्हें वैसा ही महत्व देंगे? सवाल और भी हैं किंतु अन्ना खुद उत्तर देने की स्थिति में नहीं रहे क्योंकि लाख ईमानदारी के बावजूद वे जिस तटस्थता का नाटक करते हैं वह उन्हें छोडना होगी। जयप्रकाश जी ने 1974 में सामने आकर नेतृत्व किया तो देश में बड़े परिवर्तन की बुनियाद पड़ गई। अन्ना उस अवसर को चूक गए। यदि वे आम आदमी पार्टी को ही आशीर्वाद देते रहते तब वह इस तरह पथभ्रष्ट न हुई होती और केजरीवाल भी तानाशाह न बन पाते। यही सब देखते हुए अन्ना के इस प्रयास की सार्थकता समझ में नहीं आती। उन्हें ये स्वीकार कर लेना चाहिये कि हाथ आया एक बेहतरीन अवसर उन्होंने गंवा दिया और बीते कुछ बरसों में देश जितनी तेजी से बदल रहा है उसमें उन जैसे लोगों के लिए जगह नहीं बची है। न वे तेज गति से दौड़ पाएंगे और न ही आगे बढ़ गए लोग रुककर उनके साथ आने की प्रतीक्षा करेंगे। 28 दिसंबर 2011 की तस्वीर. तब मुंबई के बांद्र कुर्ला कॉम्प्लेक्स ग्राउंड में अन्ना हजारे ने जन लोकपाल बिल के लिए अनशन किया हुआ था। तत्कालीन यूपीए सरकार ने लोकसभा में भ्रष्टाचार विरोधी बिल पास कर लोकपाल बनाने की दिशा में एक कदम बढ़ाया था। इसके बाद अन्ना ने अपना अनशन तोड़ा था। अन्ना के आंदोलन से निकले अरविंद केजरीवाल एक उम्मीद थे. जब वो राजनीति में आए तो लोगों को को लगा कि जरूर कुछ बदलाव करेंगे लेकिन केजरीवाल भी उसी रास्ते पर चले जिस पर देश की राजनीति चलती आई है। उनके इस तरीके से लोगों में गलत संदेश गया। हो सकता है कि अन्ना के इस आंदोलन में भीड़ कम होने का एक कारण यह भी हो। भीड़ भले ही उस आंदोलन जैसी नहीं है। मीडिया में जिस तरह 2011 के अनशन को जगह दी जाती थी, इस आंदोलन को नहीं दी जा रही है। यह आंदोलन लोगों के बीच चर्चा का विषय भले ही न बना हो और सोशल मीडिया पर अन्ना हजारे का मजाक उड़ाया जा रहो लेकिन जिन मांगों को लेकर अन्ना अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर बैठे हैं वो मांगे निहायत जायज हैं।
अन्ना आंदोलन पर बैठ चुके हैं। आंदोलन कब तक चलेगा यह कोई नहीं जानता। वहीं इस बार अन्ना पिछली की गलतियों से सबक लेते हुए राजनीतिक लोगों को मंच पर जगह नहीं देने की बात कर रहे हैं। अन्ना ने आंदोलन शुरू करते ही सरकार को संकेत दे दिया था कि उनका इरादा क्या है। उन्होंने कहा कि इस उम्र में हार्ट अटैक से मरने की बजाय समाज की सेवा करते हुए मरना पसंद करूंगा। अगले साल चुनाव होने वाले हैं. पिछले आंदोलन का असर भी इस समय सत्ता सुख ले रही बीजेपी देख चुकी है। अगर आंदोलन को सरकार ने गंभीरता से नहीं लिया और अन्ना के मांगों पर ठोस निर्णय नहीं हुआ, तो यह आंदोलन सरकार के लिए कहीं दिक्कत न खड़ा कर दे। वैसे अन्ना को लेकर शायद देश में कोई दीवानगी नहीं बची है। इसलिए टीआरपी के जान फंूकने वाला मीडिया भी उनसे दूरी बनाये है।