कौन है हिंसा की चिन्गारी को सुलगाने का जिम्मेदार ?

प्रसंगवश: राजेश सिरोठिया

एससी-एसटी एक्ट के तहत आरोपी को बगैर जांच के गिरफ्तारी करने पर लगाई गई रोक पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ दलित हिंसा का जो तांडव मध्यप्रदेश सहित कई राज्यों में हुआ है, उसने राजनीतिक दलों की सोच के दीवालिएपन को उजागर कर दिया है। दल से पहले देश की बात करने वाले नेता जातिवाद के दलदल से अपनी वोटों की फसल लहलहाना चाहते हैं। कड़वे किंतु हितकर फैसले अपनमे तईं लेने के बजाए कांग्रेस ने ‘लॉ विल टेक इट ऑन कोर्सÓ (कानून अपना काम करेगा) वाला भाव ओढ़ा।
इससे अदालतों को वह दिशा-निर्देश जारी करना शुरू किए, जो राजनीतिक नेतृत्व को जारी करना चाहिए थे। लेकिन कांग्रेस से चलते-चलते मोदीजी की भाजपा के राजनीतिक सफरनामे में नया फलसफा जुड़ गया। वो यह है कि ‘लॉ विल टेक इट माय कोर्सÓ (कानून वही करेगा, जो हम कहेंगे)। भाजपा के शासनकाल मेंं दो फैसले तो ऐसे हुए हैं। पहला तो मप्र में हुआ जब सुप्रीम कोर्ट के दिशा निर्देश पर मप्र हाईकोर्ट के उस फैसले के खिलाफ सरकार ने चुनौती दी, जिसमें सरकारी नौकरियों में पदोन्नति पर आरक्षण को रद्द कर दिया गया था। उप्र सहित कई राज्यों ने इसको फटाफट लागू करते हजार मुलाजिमों को रिवर्ट भी कर दिया। मप्र में सरकार का किसी को रिवर्ट नहीं करने वाला भाव रहता तो भी ठीक था। लेकिन ‘कोई माई का लाल पदोन्नति में आरक्षण खत्म नहीं करा सकताÓ वाले बोल वचन अब भारी पड़ रहे हैं। क्योंकि केंद्र की सरकार ने बगैर जांच के किसी को भी गिरफ्तार करने जैसे अदालत के विवेक सम्मत फैसले को पुनर्विचार याचिका के जरिए चुनौती देकर आग में घी डालने का काम किया है।
केंद्र सरकार राहुल गांधी के महज इस बयान से असहज हो उठी कि केंद्र सरकार ने इस मामले को मजबूती से नहीं लड़ा है। पदोन्नति में आरक्षण के मामले में शिवराज सरकार ने तू कौन मैं खाम-खां वाली भूमिका निभाई तो इधर मोदी ने पक्षकार बनने का काम किया। मालूम होना चाहिए इस मामले में सरकार का कोई सीधा लेना-देना था ही नहीं। महाराष्ट्र के अफसर की याचिका पर यह फैसला हुआ है, जो अपने अधीनस्थ दलित कर्मचारी की चरित्रावली खराब करने के बदले में एससी-एसटी एक्ट के तहत दर्ज मुकदमे के खिलाफ लड़ाई लड़ रहा था। सुप्रीम कोर्ट ने कोई एससी-एसटी एक्ट तो खत्म नहीं किया। उसने गिरफ्तारी के पहले जांच की बात ही तो कही है। वह भी यह देखते हुए कि 80 फीसदी से ज्यादा मामले अदालत की दहलीज पर साबित ही नहीं हो पाते। अन्य धाराओं के तहत भी गिरफ्तारी के पहले जांच का प्रावधान है। एससी-एसटी एक्ट सहित सारे कानून दलित समाज सहित देश के हरेक नागरिक को सुरक्षा का कवच देने के लिए बने हैं। लेकिन एससी-एसटी एक्ट को कवच के बजाए हथियार के रूप में इस्तेमाल करने की छूट दी जा सकती है। अब मोदीजी को न जाने क्या हुआ कि वह राहुल गांधी के तंज पर गौर फरमाने लगे।
यह तो हुई राजनीतिक बात। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि हिंसा भड़काने के पीछे कौन हैं। फौरी तौर पर तो इसमें किसी भी राजनीतिक दल का हाथ हिंसा की चिन्गारी को सुलगाने में नहीं दिखता। फिर कौन-सी ताकतें बच जाती हैं जिन्होंने बेहद सुनियोजित तरीके से बवंडर खड़ा कर दिया। यह चौंकाने वाली बात सामने आ रही है कि इसे किसी दल ने नहीं बल्कि उसी संगठन ने हवा दी है, जिसको पहले दिग्विजय सिंह ने पदोन्नति में आरक्षण देकर खड़ा किया और मौजूदा सरकार ने उनकी अदालत की लड़ाई लडऩे में मदद की।
ग्वालियर से जो खबरें छनकर सामने आई हैं उसमें तो यही बात सामने आ रही है। यह संगठन अब यह मानकर चल रहा है कि सरकार ने उन्हें पदावनत नहीं करके फौरी राहत जरूर दी है, लेकिन अदालत में मामला लटकने से उनकी भी तो तरक्की रूक गई है। दलित युवा सरकार के कोरे आश्वासन से बौखलाया हुआ है। ऐसा लगता है कि उनकी खीझ को आग बनाकर दलित हिंसा का दावानल खड़ा किया गया है।
राजनीतिक दल इस हादसे से अपने नफे-नुकसान का ऑकलन करने में जुट गए हैं, शिवराज ने पदोन्नाति में आरक्षण के मामले को सुप्रीम कोर्ट तक खींचकर दलितों को साधने की कोशिशें कई महीने पहले शुरू कर दी थीं, लेकिन हाल में जब उन्हें अहसास हुआ कि उनके इस पैंतरे से मप्र में सवर्ण समाज के कर्मचारी और उनसे जुड़ा बड़ा वोट बैंक नाराज हो रहा है तो शिवराज ने सरकारी नौकरियों में सेवानिवृत्ति की आयु सीमा दो वर्ष बढ़ाकर नया कार्ड खेल दिया। अब उनके सामने दुविधा है कि किसके पक्ष में खड़े हों, यानि एक तरफ कुआं और दूसरी तरफ खाईं। लेकिन इसका सबसे बड़ा नुकसान या खतरा दिख रहा है तो वह है हिंदुत्व के भाव में बिखराव का। यह अंतत: देश की एकता और अखंडता के लिए खतरा बन सकता है। ईश्वर से यही प्रार्थना है कि ऐसा कतई न हो।