इस घटाघोप को छांटिए, वरना इतिहास माफ नहीं करेगा…!

राजाराम शुक्ल
सड़कों पर पंद्रह लाशों के बिछने, सैकड़ों के घायल होने, अरबों की संपत्ति फुंकने के बाद उन कलेजों को जरूर कुछ ठंडक मिली होगी जो सर्वोच्च न्यायालय की व्याख्या को अपनी डूबती राजनीति के लिए संजीवनी मंत्र मानकर चल रहे हैं। ये तो उन्हें पता चल गया होगा कि सर्वोच्च न्यायालय ने अजा-जजा अत्याचार निवारण अधिनियम 1989 के दुरुपयोग रोकने के उद्देश्य से की गई व्याख्या को स्थगित करने व पलटने से इंकार कर दिया है। अलबत्ता पुनर्विचार याचिका की सुनवाई के द्वार खुले हैं।
इस बीच खिसियाए लोगों की जो सतही और अभद्र प्रतिक्रियाएं आ रही हैं वो किसी भी लोकतांत्रिक देश के लिए बड़े ही शर्म का विषय है। जजों पर जातीय और चरित्रगत हमले किए जा रहे हैं। जबलपुर हाईकोर्ट परिसर में तो जाति विशेष के वकीलों ने ही सर्वोच्च न्यायालय के जजों के खिलाफ नारेबाजी की जिसे हाईकोर्ट बार एसोसियेशन ने संग्यान में लिया। बालाघाट से खबर है कि दो अफसरों ने छुट्टी लेकर बंद के दौरान हिंसक भीड़ का नेतृत्व किया, इनके खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई है। हालात जैसे बन रहे हैं उसे देखते हुए हम विश्वास के साथ कह सकते हैं कि सरकार वोटीय लोभ के चलते इनके आगे झुकी तो लोकतंत्र के इस आखिरी चिराग न्यायपालिका की साख भी मिट्टी में मिल जाएगी। उसी दिन से समझिएगा कि भारत देश का एक राष्ट्र के रूप में पतन शुरू हो चुका है।
सर्वोच्च न्यायालय की मंगलवार की कार्रवाई देश के प्राय: सभी अखबारों में सुर्खियों पर रही। सरकारी वकील दलितों की नाराजगी और फैली हिंसा को आधार बनाकर यह दरयाफ्त लेकर गए थे कि उस फैसले पर स्थगन दे दिया जाए। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा- प्रदर्शन कर रहे लोगों ने हमारा आदेश पढ़ा भी नहीं है। हमें जेलों में बंद निर्दोष लोगों की चिंता है। मामला संवैधानिक है हमें इससे कोई लेना देना नहीं कि कोर्ट के बाहर क्या हो रहा है।
डा.अंबेडकर की अध्यक्षता में तैयार किए गए संविधान की मूल आत्मा में ही यह निहित है कि भले ही सौ गुनहगार छूट जाएं लेकिन एक निर्दोष को सजा नहीं मिलनी चाहिए इस फैसले के पीछे भी बाबा साहब का वही पवित्र आदर्श है जिसे कतिपय लोग कानून को साजिशन कमजोर करने के नजरिए से देख रहे हैं।
अखबारों में यह फैसला देने वाले दो जजों यूयू ललित, एके गोयल और केंद्र सरकार के अटार्नी जनरल केके वेणुगोपाल के बीच हुई जिरह को पढ़ा होगा। इसके कुछ जरूरी अंशों को दोहराया जाना जरूरी है। जिरह पर नजरें इनायत करिए…
एजी वेणुगोपाल- देश भर के दलित नाराज हैं, 10 लोग मर चुके हैं, फैसले में अंतरिम रोक लगाएं।
जस्टिस गोयल- हम एससी, एसटी एक्ट के खिलाफ नहीं हैं। पर ये देखना होगा कि बेगुनाह को सजा न मिले। सरकार क्यों चाहती है कि बिना जाँच के लोग गिरफ्तार किए जाएं। अगर सरकारी कर्मचारी पर कोई आरोप लगाएगा तो वह कैसे काम करेगा? हमने एससी,एसटी एक्ट नहीं बदला, सीआरपीसी की व्याख्या की है।
एजी वेणुगोपाल- यह एक्ट पहले से ही सशक्त है इसमें बदलाव की जरूरत नहीं।
जस्टिस गोयल- सबसे बड़ी खामी यह है कि एक्ट में अग्रिम जमानत का विकल्प नहीं। अगर किसी को जेल भेजते हैं और बाद में व। निर्दोष साबित होता है तो उसके नुकसान की भरपाई नहीं कर सकते। आपके आँकड़े बताते हैं कि कानून का अक्सर दुरुपयोग होता है।
एजी वेणुगोपाल- कई मामलों में दुरुपयोग का पता चला है मगर उस आधार पर कानून में बदलाव जरूरी नहीं।
जस्टिस ललित- क्या किसी निर्दोष को उसका पक्ष सुने बिना जेल भेजना उचित है? अगर किसी सरकारी कर्मचारी के साथ ऐसा होता है तो वह कैसे काम करेगा? कानून सजा की बात करता है गिरफ्तारी की नहीं।
जस्टिस गोयल- यह अकेला ऐसा कानून है जिसमें किसी को कानूनी उपचार नहीं मिलता। केस दर्ज होते ही व्यक्ति को तुरंत गिरफ्तार कर जेल भेज देते हैं। झूठे आरोप लगाकर किसी की स्वतंत्रता छीनने का हक किसी को नहीं दे सकते।
एमिकस क्यूरी अमरेंद्र शरण- सीआरपीसी भी कहती है कि गिरफ्तारी से पहले जाँच करनी चाहिए। प्रावधान भले ही एक्ट के हों, लेकिन प्रक्रिया सीआरपीसी की ही होती है। कोर्ट की गाइडलाइंस से एससी-एसटी एक्ट के केस की जांच, ट्रायल और अन्य न्यायिक प्रक्रिया पर कोई असर नहीं पड़ेगा।
जस्टिस गोयल- आरोपी को गिरफ्तार करने की शक्ति सीआरपीसी देती है, एससी-एसटी एक्ट नहीं। हमने सिर्फ प्रक्रियात्मक कानून की व्याख्या की है, एससीएसटी एक्ट की नहीं। जजों की टिप्पणी के बाद भ्रम के जाले साफ हो जाने चाहिए। लेकिन जिन लोगों ने अपनी आंखों में कुतर्कों की पट्टी बांध रखी है और जो लोग सियासत की भट्टी को धौकते ही रहना चाहते हैं उनका क्या किया जा सकता है?
यद्यपि इसी स्वच्छंदता के मूल में बीमारी की जड़ भी है क्योंकि हम तथ्यों-तर्कों पर विचार करने की बजाय अपनी ही बजाने में उतारू रहते हैं। एक नामचीन बुद्धिजीवी ने तर्क दिया कि जाटों के आंदोलन में तो जाटों ने महिलाओं की इज्जत लूटी थी इस आंदोलन में दलितों ने कहीं किसी की इज्ज़त नहीं खराब की, कहीं ऐसा हुआ हो तो बताएं। दूसरे नामचीन बुद्धिजीवी ने मेरे लेख की काट में एक लेख ही लिख मारा कि हिंसा आंदोलनकारियों ने नहीं की वरन् आंदोलनकारियों को ही हिंसात्मक वारदातों का सामना करना पड़ा। एक महानुभाव ने लिखा कि आपकी कलम मनुवाद की चासनी से लिपटी है, वैसे आपका नाम ही मनुवाद का द्योतक है। एक सज्जन ने पता नहीं कहाँ से मेरे लेख में संघ का दृष्टिकोण निकाल लिया और मेरे जैसे अदने से लेखक को ही समाज का विभाजनकारी बता दिया। बहरहाल ऐसी प्रतिक्रियाएं नब्बे में दस ही रहीं और मीडिया के इस स्वच्छंदी दौर में यह स्वाभाविक भी है।
गंभीर चिंता जजों और न्यायपालिका की साख पर हुई टिप्पणियों को लेकर है। इसी के आसपास आंबेडकर जयंती और परशुराम जयंती है। जातियों ने इन दोनों महापुरुषों को अपना आयकन बना रखा है। तवा गरम है और तंदूर धधक रहा है। इन स्थितियों से दृढ़ता से निपटना होगा। मैं 10 अप्रैल के जवाबी बंद के खिलाफ हूँ। एक गलती का जवाब दूसरी बड़ी गलती से नहीं दिया जाना चाहिए। समर्थ बहुसंख्यकों की जातीय या सांप्रदायिक गोलबंदी और भी खतरनाक है। यह टकराव हरहाल में टलना चाहिए। मुश्किल ये है कि आज देश में ऐसा कोई विश्वसनीय चेहरा नहीं जिसकी समझाइश का असर पड़े। काश अटलबिहारी वाजपेयी भौतिक रूप से इतने असहाय न होते। फिर भी एक तरीका है- देश के हर वर्ग और हर विधा के श्रेष्ठ और सम्मानीय लोगों की एक कमेटी बने। वैसी ही जैसे पूनापैक्ट के समय गाँधी ने आंबेडकर, एमसी राजा और मदनमोहन मालवीय की समिति बनाई थी। ये पहल सिविल सोसायटी की ओर से होनी चाहिए जो रक्तरंजित जातीय-वर्गीय टकराव को टाले और देश की समरसता को स्वाहा करने की आहुति लिए बैठे स्वयंभुओं को जवाब दे।