भाजपा की चिन्ता: अपने ही बुने जाल में फंसती नजर आ रही है

ओमप्रकाश मेहता
भाजपा ने संविधान निर्माता बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर के नाम पर जो वोट बटौरने का सपना देखा था, इन्हीं इतिहास व संविधान पुरूष की प्रतिमाएं पूरे भारत में खंडित की जा रही हैं और केन्द्र सरकार को संविधान निर्माता की प्रतिमाओं की माकूल सुरक्षा का आदेश राज्य सरकारों को जारी करना पड़ा। पिछली दो अप्रैल को देशभर में ‘भारत बंद के दौरान हुई हिंसक वारदातों विशेषकर भाजपा शासित राज्यों में हुई हत्याओं ने पार्टी को दलदल में ढकेलने का काम किया है और अब भाजपा के लिए उसी के दल के दलित सांसद ‘सिरदर्द बनते जा रहे है, ये सांसद भी उस प्रदेश से है, जिसे भाजपा अपना सबसे सुरक्षित ‘गढ़ मानने लगी है।
अब ऐसा लगने लगा है कि केन्द्र में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी ने प्रमुख प्रतिपक्षी दलों कांग्रेस, बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी को फंसाने के लिए जो ‘दलित जाल बुना था, उसमें अब स्वयं भाजपा फंसती नजर आ रही है। इसी का परिणाम है कि संविधान निर्माता बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर के नाम पर जो वोट बटौरने का सपना देखा था, इन्हीं इतिहास व संविधान पुरूष की प्रतिमाऐं पूरे भारत में खंडित की जा रही है और केन्द्र सरकार को संविधान निर्माता की प्रतिमाओं की माकूल सुरक्षा का आदेश राज्य सरकारों को जारी करना पड़ा। पिछली दो अप्रैल को देशभर में ‘भारत बंद के दौरान हुई हिंसक वारदातों विशेषकर भाजपा शासित राज्यों में हुई हत्याओं ने पार्टी को दलदल में ढकेलने का काम किया है और अब भाजपा के लिए उसी के दल के दलित सांसद ‘सिरदर्द बनते जा रहे है, ये सांसद भी उस प्रदेश से है, जिसे भाजपा अपना सबसे सुरक्षित ‘गढ़ मानने लगी है।
वास्तव में केन्द्र में सत्तारूढ़ भाजपा ने अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारने की शुरूआत तब से की, जब उसने संसद में संविधान संशोधन की पहल की, यह संशोधन चाहे न्यायपालिका की देन रहा हो, किंतु इससे देश के दलित भड़क गए और उन्हें ऐसा लगा कि भाजपा संविधान में संशोधन कर उनकी आरक्षण सुविधा को छीनना चाहती है और उसका परिणाम दो अप्रैल के ”भारत बंद के रूप में सामने आया, जिसमें आंदोलन ने हिंसक रूप धारण कर लिया और एक दर्जन से अधिक निर्दोष मारे गए, जिनमें सर्वाधित मध्यप्रदेश के थे।
वैसे भाजपा की अनुसूचित जाति/जनजाति की नीति को लेकर दलित सांसद एक लम्बे समय से पार्टी के अंदर अपना विरोध दर्ज करवाते आ रहे है, इसके अलावा हैदराबाद में रोहित बेमूला की आत्महत्या, गुजरात के ऊना में कथित गो-रक्षकों द्वारा दलितों की बेरहमी से पिटाई, सहारनपुर के शब्बीरपुर काण्ड जैसे घटनाओं के बाद भाजपा के पाले से दलित वोट बैंक का एक बड़ा हिस्सा खिसक गया, इसके बाद दो अप्रैल के ‘भारत बंद काण्ड ने भाजपा की जड़ों को हिला कर रख दिया। इसलिए भाजपा के चार उत्तरप्रदेशिय सांसदों ने ‘विद्रोह का झण्डा थाम लिया, इसे भाजपा का आंतरिक मामला इसलिए नहीं कह सकते क्योंकि ये सांसद खुलकर पार्टी के सामने आकर खड़े हो गए है, अब भाजपा को आशंका है कि यह महामारी कही अन्य दलित सांसदों तक न फैल जाए, इसीलिए अब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने स्वयं इन को मनाने-पटाने की जिम्मेदारी अपने हाथों में ले ली है, मोदी ने इस बारें में उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को भी अपने आचार-व्यवहार में सुधार लाने के निर्देश दिए है, क्योंकि ये सांसद अपने प्रदेश के मुख्यमंत्री के दुव्यवहारी बर्ताव से भी काफी दु:खी है, साथ ही संघ प्रमुख मोहन भागवत ने भी भाजपाध्यक्ष को बुलवा कर दलित-पिछड़ों को पार्टी से जोड़े रखने की पर्याप्त नसीहतें दी है, इसी कारण पार्टी को अब अपनी दलित नीति में संशोधन करने को मजबूर होना पड़ रहा है।
वैसे यदि हम ज्यादा नहीं सिर्फ चार साल पुराने ही इतिहास के पन्ने पलटकर देखें तो हमें पता चलेगा कि 2014 के चुनावों के समय यूपीए सरकार की जड़े उखाडऩे के लिए भाजपा ने लोकलुभावन नारे देकर दलित वोट बैंक को लुभाने का करतब किया था, इनमें प्रमोशन में आरक्षण के लिए संसद से विधेयक पारित कराने, दलितों की भर्ती का बैकलॉग पूरा करने और प्रायवेट नौकरियों में भी आरक्षण के मुद्दे प्रमुख थे, जो अब अन्य चुनावी वादों के साथ जुमलों में बदल दिए गए है। साथ ही इस सच्चाई को भी नकारा नहीं जा सकता कि जन संघ के समय से ही इस पार्टी में दलित सरोकारों को खास वरियता नहीं दी गई थी, जब बंगरू लक्ष्मण को दलित वोट बैंक के दबाव में पार्टी अध्यक्ष बनाना पड़ा तो उन्हें रिश्वत काण्ड में फंसाकर बाहर का रास्ता दिखा दिया गया, अब राष्ट्रपति जी के दलित चयन के नाम पर राजनीतिक रोटियां सैंकने का प्रयास किया जा रहा है, जबकि इनके पहले यूपीए सरकार के दौरान दलित नेता के.आर. नारायण राष्ट्रपति रह चुके है। कुल मिलाकर अब भाजपा धीरे-धीरे दलित दलदल में फंसती जा रही है और अब इस दलदल से बाहर निकलने का उपक्रम करने लगी है, जबकि चार राज्यों के विधानसभा चुनाव सन्निकट है और लोकसभा चुनाव भी ज्यादा दूर नहीं है, ऐसे में क्या भाजपा ‘डेमैज कन्ट्रोल कर पाएगी?