पण्डित जवाहर लाल नेहरू को भुला देने के प्रयास में नरेन्द्र मोदी…!

ओमप्रकाश मेहता
इस आजाद देश के पहले और लगातार सोलह साल साढ़े दस महीने प्रधानमंत्री के रूप में स्वतंत्र भारत पर राज करने वाले स्व. पण्डित जवाहरलाल नेहरू के बताए गए मार्ग पर यह देश लगभग सड़सढ साल चला, किंतु 2014 में देश के राष्ट्रीय क्षितिज पर उभरे नरेन्द्र मोदी नामक धूमकेतु ने पिछले चार सालों में हर स्तर पर स्व. पण्डित नेहरू को विस्मृत करवाने का प्रयास किया और वह प्रयास आज भी जारी है, फिर वह चाहे नीतियों के स्तर पर हो या शासन संचालन के स्तर पर या कि नेहरू जी के व्यक्तित्व के स्तर पर। संभवत: मोदी जी ने इसकी शुरूआत अपने शासन के दूसरे वर्ष में उस समय की थी, जब उन्होंने गुजराती इतिहास पुरूष सरदार वल्लभ भाई पटेल को पं. नेहरू से ज्यादा काबिल बताते हुए कहा था कि ”यदि पं. नेहरू अपनी कुटिल चाल से महात्मा गांधी को प्रभावित कर देश के पहले प्रधानमंत्री नहीं बनते और यह मौका यदि सरदार वल्लभ भाई पटेल को मिलता तो आज देश का नक्शा ही कुछ और होता तथा कश्मीर जैसी समस्याएं नहीं होती, मोदी जी ने अपनी इस दलील के साक्ष्य में देश की रियासतों को खत्म कर उन्हें भारतीय गणराज्य के साथ जोडऩे के सख्त कदम की बात कहीं। यद्यपि आजादी के पहले और उसके बाद भी गुजरात से कई राष्ट्रीय नेता उभर कर आए, जिनमें स्वयं महात्मा गांधी के अलावा वल्लभ भाई पटेल, मोरारजी भाई आदि है, किंतु मोदी जी का प्रयास अपने सभी गुजराती पूर्वज नेताओं को पीछे छोड़ अपने योगदान की छाप देश में छोडऩा है, इसीलिए अब उन्होंने न सिर्फ ”नेहरू काल के पुराने दस्तावेज खंगाल कर उनकी ऐतिहासिकता खत्म करने का बीड़ा उठाया है, बल्कि नेहरू के पंचशील सिद्धांत को खत्म कर अपना स्वयं का पंचशील सिद्धांत को महत्व देना शुरू कर दिया है, जिसकी शुरूआत उन्होंने चीन से की है। हाल ही की मोदी की चीन यात्रा को लेकर कई सवाल खड़े किए गए, जैसे जब कोई समझौते नहीं होने है, दस्तावेजों पर हस्ताक्षर नहीं होने है, संयुक्त वक्तव्य नहीं होने है, पत्रकारवार्ता नहीं होना है तो फिर मोदी की चीन यात्रा क्यों?
लेकिन स्वयं मोदी ही अपनी इस चीन यात्रा का सही आंकलन कर सकते है, और कोई अन्य नहीं? इस यात्रा में चीन के राष्ट्रपति शी के साथ हुई गुप्त चर्चाओं की परतें धीरे-धीरे प्रधानमंत्री के चीन के प्रति रूख से खुलकर सामने आएगी, जिसकी पहली परत तिब्बती धर्मगुरू दलाईलामा को लेकर खुली है, चीन यात्रा के बाद मोदी जी ने अब यह प्रयास शुरू कर दिए है कि दलाईलामा अपने उत्तराधिकारी चयन के पूर्व ही तिब्बत लौट जाए, इसीलिए मोदी ने न सिर्फ दलाईलामा से चर्चा बंद कर दी, बल्कि हर तरीके से उन्हें ये संदेश दिया जा रहा है कि वे तिब्बत लौट जाए। जबकि दलाईलामा आज से करीब साठ साल पहले पं. नेहरू के प्रधानमंत्रित्व काल में भारत आए थे और तभी से यही है, नेहरू जी ने न सिर्फ उन्हें इस देश में शरण दी थी, बल्कि भारतीय धर्मगुरूओं की तरह उन्हें हर तरह की सुख-सुविधा उपलब्ध कराई थी, इसी से दुखी होकर चीन के तत्कालीन शासक माओत्से तुंग और चाऊ एन लाई ने नेहरू जी को ”हॉफ ह्यूमन-हॉफ डेविल(आधा इंसान-आधा राक्षस) कहा था। पिछले साठ सालों में नेहरू के बाद इंदिरा जी व भाजपा के ही अटल बिहारी वाजपेयी के अलावा आधा दर्जन प्रधानमंत्री आए, किंतु दलाईलामा पद पर किसी ने कोई आपत्ति नहीं की, किंतु अब चीन की शह पर कुछ ऐसा वातावरण भारत सरकार तैयार कर रही है, जिससे कि दलाईलामा भारत छोड़कर तिब्बत लौट जाए।
मोदी जी की नेहरू जी से तुलना की बात यहीं खत्म नहीं होती हाल ही में नेहरू जी ने पंचशील सिद्धांतों को मुकाबले मोदी जी ने भी चीन को लेकर अपने पंचशील सिद्धांतों की घोषणा की, जिसमें चीन के संदर्भ में समान दृष्टिकोण, बेहतर और साझा समस्या समाधान शामिल है, जबकि पं. नेहरू ने 1954 में चीन को ही लेकर जिन पंचशील सिद्धांतों की बात कही थी उनमें एक-दूसरे की संप्रभुता का सम्मान, गैर- आक्रामकता, एक-दूसरे के आंतरिक मामलों में दखल नहीं, साझा लाभ के लिए समानता और सहयोग तथा शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व शामिल थे।
किंतु यह भारत ही नहीं पूरा विश्व जानता है कि चीन कतई भरोसे के लायक नहीं है, यह वही देश है जिसने 1962 में ‘हिन्दी-चीनी, भाई-भाई का नारा लगाकर भारत की पीठ में छूरा भौंका था। आज के संदर्भ में यह वही देश है जिसने डोकलाम विवाद पर लगातार सत्तर दिन तक आक्रामकता दिखाई थी। इसलिए यह भरोसे के काबिल कतई नहीं है, और अब तो यहां निरंकुश स्थायी शासन स्थापित हो गया है, इसलिए अब क्या कहा जाए? कुल मिलाकर प्रधानमंत्री भाई नरेन्द्र मोदी ने चीन के संदर्भ में अपनी नीतियों को पं. नेहरू की नीतियों से बेहतर बताने की कौशिश की है, अब देखिये आगे भी पं. नेहरू को विस्मृत कराने के प्रयास कहां-कहां किए जाते है?