प्रभुता पाय काहि मद नाहीं

प्रभाकर चौबे
प्रभुता पाय काम मद नाहीं- यह कहा जाता रहा है। लेकिन आज कुछ नेता विशेष अर्थ में प्रभुता की भाषा किसी खास तरफ इशारा कर बोल रहे हैं वह प्रभुता पाय काम मद नाहीं-जैसा सरल नहीं है। यह दूर तक अर्थ दे रहा है। यह खतरनाक है। जम्मू-कश्मीर के उप मुख्यमंत्री ने यह मामूली घटना है कहकर उस तरह की सोच को उजागर किया है और यही लोकतंत्र के लिए घातक बनेगा। हमारे यहां राजा या लोकतंत्र के प्रमुख के गुण को साफ बताया गया है- मुखिया मुख सो चाहिए खान-पान सो एक…पाले-पोसे सकल अंग तुलसी सहित विवेक…।
पिछले हफ्ते की बात है- जम्मू-कश्मीर सरकार में उप मुख्यमंत्री की शपथ लेने के कुछ ही देर बाद कविन्द्र गुप्ता ने कठुआ में आठ साल की बच्ची के साथ किए गए सामूहिक बलात्कार और हत्या को मामूली घटना करार दिया। उन्होंने कहा कि इस पर ज्यादा बात नहीं की जाए न इस पर ध्यान दिया जाए। अभी तक तो गुप्ता केवल विधायक थे, अब उप मुख्यमंत्री बन गए हैं। उप मुख्यमंत्री का पद तो महत्वपूर्ण होता है। जब वे इस शर्मनाक घटना के प्रति ऐसा रुख रख रहे हैं तो मामले की जांच व उसपर सरकार का रुख कैसा होगा, यह सोचकर ही दिल दहल उठता है। कठुआ की इस घटना ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया और सरकार के उप मुख्यमंत्री पद पर बैठे व्यक्ति के लिए यह एक मामूली घटना है।
उनकी इस अभिव्यक्ति से ही दिल बैठ रहा है। पता नहीं इस देश का आगे क्या होने वाला है। ऐसे क्षण में लोक अभिव्यक्ति की याद आती है। जब लोक बहुत ही निराश हो जाता है। कहीं उजाले की एक किरण भी दिखाई नहीं पड़ती। जीवन दूभर हुआ जाता है। निकलने का कोई रास्ता नहीं मिलता तब दुखी मन से लोक अभिव्यक्ति फूट पड़ती है। कहां जाई, का करी। आज देश की स्थिति, देश का लोकतंत्र पर इस तरह प्रहार देखकर लगता है कहां जाई का करी…। कहिन जाए, का कहिए… उप मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद कविन्द्र गुप्ता ने यह कहा होता कि मामला गंभीर है और दोषियों को सजा दिलाई जाएगी तो सरकार और लोकतंत्र पर विश्वास जमता। यहां तो पद पर पहुंचते ही गुप्ता जी ने मामला ही खारिज कर दिया। कोई मानो चना-मुर्रा जैसी बात हो। और यह ज्यादा चिंतनीय है कि न तो मुख्यमंत्री ने, भाजपा ने उनके बयान पर आपत्ति की, दोनों ही खामोश रहे। जम्मू-कश्मीर में दोनों ही दल की सरकार में बने रहने की मजबूरी है सत्ता सुख की नाव में सफर कर रहे हैं। सरकार से अलग नहीं रहेंगे, चाहे जो हो जाए। शुचिता, अ पार्टी विथ डिफरेंट, करप्शन के प्रति जिरो टालोंटा… आदि-आदि कहने-सुनने के लिए है- उन्होंने कहा- जनता ने सुना बस। यह गंभीर बात ही नहीं है यह राज में जनसुरक्षा के प्रति राज की प्रतिबद्धता पर सवाल खड़ा करता है। एक वरिष्ठ नेता तो यहां तक कह दिया कि इतने बड़े देश में ऐसी घटनाएं होती रहती हैं। कितने दुख की बात है कि ऐसी घटनाओं को बड़े-बड़े पदों पर आसनी हमारे जननेता हल्के में ले रहे। सवाल यह भी उठता है कि जम्मू-कश्मीर के उप मुख्यमंत्री ने इतने हल्के से क्यों लिया। वे यह कहकर कि यह मामूली घटना है क्या संदेश देना चाह रहे थे और किसे वे यह संदेश दे रहे थे। किस पब्लिक को एड्रेस कर रहे थे- किसे संतुष्ट कर रहे थे। उप मुख्यमंत्री का दायित्व एक वर्ग, एक समाज, एक सीमा तक का नहीं होता। समग्रता में होता है। वह सबके लिए काम करता है। उप मुख्यमंत्री मतलब मुख्यमंत्री के तत्काल बाद की पोजीशन वाला मंत्री- वे सिंचाई मंत्री नहीं हैं। उनकी बड़ी जिम्मेदारियां हैं। कभी-कभी ख्याल आता है कि देश में ये सब क्या हो रहा है। ऐसा नहीं कि पहले सब हरा ही हरा या स्वर्ग रहा हो। ऐसा नहीं था।
पहले भी सेक्टिरियन सोच थी और घोर पक्षपात था। अपनों को बचाने ताकतवर समूह भिड़ जाता था और सत्ता उसका साथ देती रही। आदि-आदि… आदि-आदि… घोर पक्षपात देखा। लेकिन कहीं कोई, किसी कोने कांतर में लोकतंत्र बैठा मिल जाता। यह लोकतंत्र उसे आगाह करता, उसे रास्ते पर चलने का निर्देश देता, उसे अपनी लोकतांत्रिक ड्यूटी समझाता इसलिए तमाम तुष्टाई सत्ता के मद में मस्त रहने के बावजूद प्रकट में ऐसी जबान नहीं निकलते। अपवादस्वरूप निकली हो। हो सकता है समाज के प्रति एक संकोचभाव था लोकतंत्र के अंदर बैठे सत्ताधीशों में। अब दुख यह कि वह संकोच ही खत्म हो गया। एकदम दबंगई आ गई है और यह दबंगई सामान्य नहीं है। यह जाति विद्वेष की सीमा पार कर रही है। यह खतरनाक है। सबका विकास सबके साथ एक भावनात्मक नारा है ठीक उसी तरह जिस तरह कहा जाता रहता है प्राणीमात्र का कल्याण हो, सब सुखी रहें आदि-आदि… कहने का मतलब यह कि लोकतंत्र शासन में भी सत्ता की परिधि व परिधि के किनारे बैठे लोगों की अधिनायकवादी प्रवृत्तियां चलती रही है। प्रभुता पाय काम मद नाहीं- यह कहा जाता रहा है। लेकिन आज कुछ नेता विशेष अर्थ में प्रभुता की भाषा किसी खास तरफ इशारा कर बोल रहे हैं वह प्रभुता पाय काम मद नाहीं-जैसा सरल नहीं है। यह दूर तक अर्थ दे रहा है। यह खतरनाक है। जम्मू-कश्मीर के उप मुख्यमंत्री ने यह मामूली घटना है कहकर उस तरह की सोच को उजागर किया है और यही लोकतंत्र के लिए घातक बनेगा। हमारे यहां राजा या लोकतंत्र के प्रमुख के गुण को साफ बताया गया है- मुखिया मुख सो चाहिए खान-पान सो एक…पाले-पोसे सकल अंग तुलसी सहित विवेक…। मुखिया को सारे अंगों के साथ समान व्यवहार करना चाहिए। केवल वाणी में नहीं वरन कर्तव्यों में भी। लेकिन यहां आज लोकतंत्र में कुछ की प्रवृत्तियां विपरीत दिखाई दे रही है। सोचो तो कठुआ का बलात्कार कांड जितना निंदनीय, दिल दहला देने वाला रहा। लेकिन जम्मू-कश्मीर के उप मुख्यमंत्री ने इसे मामूली घटना कहकर एकदम दुखी कर दिया। दुख ही नहीं, बड़ी चिंता में डाल गया। यह बयान कि लोकतंत्र में आखिर चुनी हुई सरकार क्या मकसद से चुन-चुनकर काम करेगी और किसका दुख कम, किसका ज्यादा यह इस विशेष सोच से काम करेगी। जम्मू-कश्मीर के उप मुख्यमंत्री ने क्या जानबूझ कर किसी खास वर्ग को संदेश देने, किसी को खुश करने के उद्देश्य से ऐसा बयान दिया अथवा वे सरकार में मामले की गंभीरता के प्रति प्रतिबद्ध नहीं है। हमारा विशाल देश अपने लोकतंत्र को लेकर सशंकित भी हो रहा है। जो लोग यह कहते हैं कि 70 सालों में लोकतंत्र मजबूत होता चला है वे यह तो लोकतंत्र की आधी-अधूरी समझ रखते हैं। यह वोट के बढ़ते प्रतिशत को ही लोकतंत्र की मजबूती समझ रहे हैं और जनता के बीच भ्रम फैला रहे हैं। देश आजाद हुआ-आजाद हुआ कई तरह की बंदिशें लेकर लेकिन धीरे-धीरे बंदिशें ढीली की जा रही थीं कि कुछ वर्चस्ववादी ताकतों को यह पसंद नहीं आ रहा था कि देश के नागरिक, नागरिक समूह अपने फैसले खुद लेने लगे-उसे पूछकर ही कोई त्योहार, कोई पर्व, कोई उत्सव मनाना होगा। उसे पूछकर ही अपने कपड़े-लत्ते, खान-पान की आदतों को तय करना है। मीडिया एकदम खुशामदी हो गया है और राज की कृपादृष्टि पाने आतुर है। उसने स्वतंत्र चिंतन कहीं गिरवी रख दिया है- तुलसी दास ने कहा है-
सचिव, वैद्य, गुरु तीन जो प्रिय बोलहिं भय आस राज, धर्म, तनतीनका होइये बेगहि नास…
आज हमारा मीडिया अपने लोकतांत्रिक धर्म से परे चला गया है। सबसे बड़े दुख की बात यह है कि आज मीडिया अविश्वसनीय हो गया है। पहले कुछ मीडिया में आता तो कहा जाता- मीडिया में आया है….। मतलब झूठ नहीं हो सकता। अब कहा जाता है मीडिया में आया तो लोग हंसेंगे और कहेंगे- मीडिया में आया है- तब तो हंडरेड परसेंट झूठ है। यह हालत कर दी गई है मीडिया की। तो आम जनता को न अपने जनप्रतिनिधियों पर भरोसा है न लोकतांत्रिक सरकार पर। जिसे वह कहती है कि उसने चुना है, उस पर भरोसा न न्यायालय पर न प्रशासन पर न शासन पर। वह अंधेरे में कुछ टटोल सी रही है। उसे कुछ सूझ नहीं रहा। वह लोकतंत्र की किताब के शब्दों में कुछ खोज रही कि वह इसमें कहां परिभाषित है। आज हमारा लोकतंत्र कुछ ठगों द्वारा हथिया लिया गया जनता के नाम पर की जाने वाली शासन व्यवस्था है।
आज सबसे बड़ी चुनौती लोकतंत्र को बचाने की है। ये छोटे-मोटे बयान इन्हें छोटा-मोटा मानकर उपेक्षित न किया जाए? निंदा कर अपने कर्तव्य की इतिश्री न मान ली जाए- इन बयानों के पीछे घातक जहर छिपा है। लोकतंत्र को इस जहर से बचाना है। आज लोकतंत्र के पावन जल में अपने जहरीले फन लिए कुछ ताकतें बैठ गई हैं। इनके कई फन हैं- हर फन को नष्ट करना है- लोकतंत्र तभी बचेगा। कुछ ताकतें लोकतंत्र को नष्ट करने पर तुली हैं।
लोकतंत्र से उनका आशय है सत्ता में पहुंचकर अपना एजेंडा लागू करने का एक तंत्र का माध्यम। लोकतंत्र एक कल्चर है- इस कल्चर को बचाना है। यह 21वीं सदी है। अपने सामने के खतरों की पहचान की ताकत सबमें आ चुकी है। लोकतंत्र को नष्ट करने वाली ताकतें धीरे-धीरे संगठित हो रही हैं। ताकत ग्रहण कर रही हैं- तमाम तरह के बयान उनके लोकतंत्र को नष्ट करने में साथ देने वालों को साथ चलने के लिए ही है। इन सबको समझना है। यह बड़ा कठिन समय है। केवल वाणी मात्र से लोकतंत्र नहीं बच जाएगा। लोकतंत्र मनुष्य के श्रेष्ठतम उज्जवल पक्ष को सामने लाता है जो इन कठोरपंथियों को पसंद नहीं।