कर्नाटक चुनाव में भ्रष्टाचार मुद्दा नहीं बन पाया

राजेश माहेश्वरी
कर्नाटक के चुनाव पर पूरे देश की निगाहें टिकी हुई हैं। भाजपा और कांग्रेस में जुबानी जंग छिड़ी हुई है। दोनों ओर से आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। इन सब के बीच जमीनी मुद्दे और मसले दृश्य से ओझल दिखाई देते हैं। भ्रष्टाचार का मुद्दा कर्नाटक चुनाव में अहम माना जा रहा था। कांग्रेस और भाजपा ने एक दूसरे पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगाए हैं, बावजूद इसके कर्नाटक चुनाव में भ्रष्टाचार का मुद्दा न बन पाना हैरान करता है। फिलवक्त कर्नाटक चुनाव अपने अंतिम दौर में चल रहा है। आठ दिन बाद वहां नई सरकार बन जाएगी। कांग्रेस जहां अपने इस आखिरी दुर्ग को बचाने के लिए प्रयासरत है वहीं भाजपा दक्षिण के प्रवेश द्वार को फिर हथियाने के लिए एड़ी चोटी एक करने में जुटी है। पूर्व प्रधानमंत्री एच. डी. देवेगौड़ा की पार्टी जेडीएस (जनता दल सेकुलर) को उम्मीद है कि कांग्रेस-भाजपा बहुमत से वंचित रहकर उसका समर्थन लेने मजबूर हो जाएंगे। कर्नाटक की राजनीति और नौकरशाही में भ्रष्टाचार की जड़े गहरी हैं, ऐसे में भ्रष्टाचार का चुनावी मुद्दा न बन पाना यह दर्शाता है कि यहां सभी दल हमाम में नंगे हैं।
पहली बार जब कर्नाटक में भाजपा की सरकार बनी थी, तब भाजपा के पहले मुख्यमंत्री बी. एस. येदियुरप्पा थे। कर्नाटक में भाजपा और कांग्रेस की जुबानी जंग छिड़ी हुई है। कांग्रेस और भाजपा अपनी-अपनी जीत के लिए जनता पर भरोसा जता रहे हैं। वर्तमान मुख्यमंत्री सिद्धारमैया पर भी आरोप हैं। अब देखना होगा कि आगामी दिनों में विकास के नाम पर वोट मिलते हैं या कांग्रेस पर एक बार वोटर फिर से भरोसा करता है, यह परिणाम आने पर ही पता लगेगा। कर्नाटक चुनाव प्रचार में अपने पूर्व के भाषणों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एचडी देवेगौड़ा के प्रति जो आदरभाव दिखाया उसे राजनीति के जानकार भाजपा के मनोबल में कमी का संकेत मान रहे थे लेकिन पूर्व प्रधानमन्त्री द्वारा ज्योंही भाजपा से नजदीकी की सम्भावना से इंकार किया गया त्योंही नरेंद्र मोदी की सौजन्यता ने आक्रामकता का रूप ले लिया। दरअसल भाजपा के हौसले बुलंद होने की एक वजह लिंगायत मुद्दे के कमजोर पडऩे की संभावना भी है। इस समुदाय को अल्पसंख्यक का दर्जा देने की सिफारिश केंद्र को भेजकर मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने जो ब्रह्मास्त्र छोड़ा था उससे भाजपा भोंचक होकर रह गई थी। मुख्यमन्त्री पद के उसके चेहरे येदियुरप्पा भी लिंगायत हैं। अपने परम्परागत वोट बैंक में सेंध लगने से घबराई भाजपा ने फौरन साधु-संतों के आगे मत्था टेकना शुरू कर दिया।
पार्टी अध्यक्ष अमित शाह कर्नाटक की राजनीति के शक्ति केंद्र समझे जाने वाले प्रमुख मठों में गए और उनको समर्थन के लिए मनाया। भाजपा खेमे का दावा है कि लिंगायत समुदाय को अल्पसंख्यक बनाकर हिन्दू धर्म से अलग करने के सिद्धारमैया के दांव को अधिकतर मठाधीशों ने हिंदुत्व के लिए खतरा मानते हुए भाजपा के समर्थन का मन बना लिया है जबकि शुरुवात में वे सब ढुलमुल थे। उप्र के मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ को भाजपा ने कर्नाटक में तीसरा सबसे बड़ा चुनाव प्रचारक बनाया क्योंकि जिस नाथ सम्प्रदाय के श्री योगी प्रमुख हैं उसके अनुयायी बहुत बड़ी संख्या में कर्नाटक के गांव -गांव तक फैले हैं।
मंदिर-मठ में दर्शन करने, पूजा-पाठ करने प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह गए हैं, तो कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी भी पीछे नहीं रहे हैं। राहुल इस दौर की राजनीति में अपना ‘हिंदुत्वÓ साबित करना चाहते हैं, जबकि उन्होंने मस्जिद और चर्च में जाकर भी दर्शन किए हैं, धर्म-लाभ लिया है। इन आदतों और भ्रमणों पर कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन इन चुनावों के वक्त ही धर्म और आस्थाओं की याद क्यों आती है? बहरहाल इनमें तो कुछ प्रक्रियाएं ऐसी हैं, जो हमारे मौलिक अधिकारों से जुड़ी हैं। तो फिर बेचारा चुनाव आयोग भी क्या कर सकता है?
दूसरी तरफ कांग्रेस के हमले की कमान पूरी तरह से पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी के हाथ में है जो सीधे प्रधानमंत्री पर निशाना साधकर भाजपा का मनोबल कमजोर करने की नीति पर चल रहे हैं। राहुल जानते हैं कि सत्ता विरोधी रुझान कांग्रेस को नुकसान पहुंचा सकता है इसीलिए वे दानापानी लेकर सीधे प्रधानमंत्री को घेरते हैं क्योंकि गुजरात में तो भाजपा की सत्ता होने से उसे प्रादेशिक मुद्दों पर भी घेरा जा सका लेकिन कर्नाटक में कांग्रेस की ही सरकार रहने से उसकी तारीफ करना नुकसानदेह हो रहा था। ताजा खबरों के मुताबिक खुद सिद्धारमैया अपने दोनों निर्वाचन क्षेत्रों में कड़े संघर्ष में फंसे हैं। राहुल के आक्रमण और इस पर प्रधानमन्त्री के जवाब से प्रादेशिक चुनाव का स्वरूप राष्ट्रीय हो गया। भाजपा भी मन ही मन यही चाह रही थी क्योंकि मुख्यमंत्री के तौर पर सिद्धारमैया भाजपा के चेहरे येदियुरप्पा पर शुरू से ही भारी पड़ते आ रहे हैं। चुनाव के राष्ट्रीय मुद्दों पर केंद्रित होने से जेडीएस का सबसे ज्यादा नुकसान हो गया क्योंकि राष्ट्रीय राजनीति में उसकी कोई खास भूमिका नहीं है। मतदान के चंद रोज पहले कर्नाटक से आ रहे संकेतों से मुकाबले के और कड़ा होने की उम्मीदें बढ़ चली हैं जिससे देवेगौड़ा खेमे में चिंता का माहौल है। यदि यही स्थिति बनी रही और भाजपा लिंगायत मतों में श्री सिद्धारमैया द्वारा लगाई सेंध को बेअसर कर सकी तो उसे 115 से ऊपर सीटें मिल सकती हैं वरना मामला 100 के लगभग ठहरेगा और ऐसा ही कांग्रेस के साथ भी है। लेकिन इतने महत्वपूर्ण चुनाव में भी जिस तरह की राजनीति देखने मिल रही है वह चिंता पैदा करने के लिए पर्याप्त है। ऐसा लग रहा है चुनाव आईपीएल मैच जैसा होकर रह गए हैं जिसमें केवल और केवल जीत मायने रखती है।
इस स्थिति में कोई बदलाव होने की उम्मीद नजर नहीं आ रही। आगामी सप्ताह कर्नाटक का चुनाव सम्पन्न होते ही सेनाएं मय तोपखाने के मप्र, छत्तीसगढ़ और राजस्थान के मोर्चे पर तैनात कर दी जाएंगीं। नए-नए मुद्दे तलाशे जाएंगे जिनमें उलझाकर जनता का ध्यान असली समस्याओं से भटका दिया जाएगा। सबसे बड़ी दिक्कत तो ये है कि मतदाता भी बेचारा क्या करे उसके सामने जो विकल्प होंगे उसी में से तो चुनना पड़ेगा। कर्नाटक में भी कमोबेश यही स्थिति है। राज्य की कांग्रेस और केंद्र की भाजपा सरकार से निराश होने पर भी उसे इन्हीं को ढोना पड़ेगा क्योंकि तीसरी पार्टी की अवसरवादिता और धोखाधड़ी वह देख ही चुकी है। देखें कर्नाटक के नाटक का अंत कैसा होता है?
बहरहाल जनादेश 15 मई को सार्वजनिक होगा, लेकिन उसके 10 दिन पहले ही प्रधानमंत्री मोदी ने कांग्रेस को ‘पीपीपी पार्टीÓ (पंजाब, पुडुचेरी, परिवार पार्टी) बनने की भविष्यवाणी की है, तो इस आकलन को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। हालांकि कर्नाटक चुनाव में भ्रष्टाचार कोई गंभीर मुद्दा नहीं बन पाया है, लेकिन प्रधानमंत्री का आरोप है कि कांग्रेस ने कर्नाटक में लूट और वसूली का माफिया-तंत्र स्थापित कर रखा है और उसी के जरिए दाना-पानी दिल्ली तक जाता रहा है, लिहाजा कर्नाटक का चुनाव जीतना कांग्रेस के लिए जरूरी है, ताकि खाने-पीने का बंदोबस्त बना रहे। उधर कांग्रेस ने भाजपा के मुख्यमंत्री उम्मीदवार येदियुरप्पा के खिलाफ 23 आपराधिक मामलों के आरोप बार-बार लगाए हैं और 11 अन्य शीर्ष नेताओं के नाम गिनाए हैं, जिन पर आपराधिक केस के कलंक चस्पां हैं। हैरानी है कि ये आरोप चुनावी मुद्दा ही नहीं बन पाए हैं।
सर्वेक्षण करने वाली अधिकतर संस्थाओं के निष्कर्ष चूंकि त्रिशंकु विधानसभा की भविष्यवाणी कर चुके हैं इसलिए पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवेगौड़ा के बेटे कुमारस्वामी दिन में ही किंग मेकर बनने के ख्वाब देखने लग गए। यद्यपि बीते सप्ताह में नरेंद्र मोदी की ताबड़तोडय़ों ने भाजपा की उम्मीदें बढा दी हैं और वह अपने बल पर सत्ता हासिल करने का दम भरने लगी है। उसके 85-90 तक सिमटने के जो अनुमान लगाए जा रहे थे उनके मनोवैज्ञानिक दबावों से उबरकर पार्टी के चुनाव प्रबंधक पूर्ण बहुमत की बात करने लगे हैं। इसका संकेत प्रधानमंत्री द्वारा जेडीएस पर कांग्रेस की गुप्त मदद करने के आरोप से लगता है। चूंकि खुफिया और अन्य कई स्रोतों से प्रधानमंत्री को सूचनाएं मिलती रहती हैं, लिहाजा प्रधानमंत्री के किसी भी बयान को हल्के में नहीं लिया जा सकता। यदि दो शहरों के युवाओं के समर्थन को ‘रुझानÓ माना जाए, तो जनादेश चौंका भी सकता है। शायद ऐसे ही जन-समर्थन को देखते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने 15 के स्थान पर 21 रैलियां कर्नाटक में करना तय किया है, लेकिन कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी भी फरवरी माह से चुनाव प्रचार में जुटे हैं। ऐसे में कर्नाटक का जनादेश दिलचस्प रहेगा, क्योंकि यहीं से व्याख्याएं शुरू होंगी कि भारत ‘कांग्रेसमुक्तÓ होगा अथवा नहीं!