सर्वोच्च संवैधानिक पदों के चुनाव भी संसद के साथ ही हों…?

ओमप्रकाश मेहता
भारत के मौजूदा राजनीतिक दलों की सत्ता प्राप्ति के प्रति ललक तथा उसके लिए हर संवैधानिक या गैर-संवैधानिक कदम उठा लेने की उनकी हिम्मत को देखते हुए देश में विधानसभाओं व लोकसभा के चुनाव एक साथ कराने को आतुर मोदी सरकार संविधान में संशोधन की सर्वोच्च संवैधानिक पदों (राष्ट्रपति, उपराष्ट्रीय राज्यों के राज्यपाल) के चुनाव भी संसद व राज्य विधानसभाओं के साथ कराने का समयानुकुल कदम क्यों नहीं उठा लेती? यह इसलिए जरूरी है क्योंकि सर्वोच्च संवैधानिक पदों पर भी सत्तारूढ़ दल की समान विचारधारा के लोग विराजित हो सकें।
वैसे शायद मोदी सरकार ने अब तक इस संशोधन की जरूरत इसलिए महसूस नहीं की क्योंकि सौभाग्य से मोदी जी के शासन के पिछले चार सालों के दौरान ही राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति व अधिकांश राज्यों के राज्यपालों के पदों पर केन्द्र सरकार की मद से सत्ता के अनुकूल समान विचारधारा की शख्सियतें स्थापित हो गईं, क्योंकि यदि राज्यों से विश्लेषण की शुरूआत की जाए तो देश के तीस राज्यों में से फिलहाल पच्चीस राज्यों में राज्यपाल या उप-राज्यपाल केन्द्र में सत्तारूढ़ दल की विचारधारा से जुड़ी शख्सियतें विराजित हंै, यही स्थिति राष्ट्रपति व उप-राष्ट्रपति जी के पदों को लेकर भी है, इसलिए राष्ट्रपति भवन या राज्यों के राजभवन से समान विचारधारा वाली राज्य सरकारों को कोई खतरा नहीं है। हां, केन्द्र में सत्तारूढ़ दल या उसकी समान विचारधारा वाली सरकारों की यह शिकायत अवश्य है कि इन राज्यों में राज्यपाल अपनी सीमा से बाहर जाकर सरकार के दैनंदिनी कार्यों में हस्तक्षेप करते हंै। वैसे केन्द्र में सत्तारूढ़ दल की ही राज्य सरकारों वाले राज्यों में प्रतिपक्षी दल भी यह आरोप लगा रहे है कि राज्यपाल अपना मूल दायित्व छोड़ केन्द्र के लिए जासूसी का कार्य कर रहे हैं। फिर आज जिस विषय पर हमने मूलरूप से चर्चा छेड़ी है, वैसा यदि हो जाता है, उच्च संवैधानिक पदों के भी सरकार बदलने के साथ ही चुनाव हो जाएं तो फिर केन्द्र में सत्तारूढ़ दल को राज्यों में सत्ता प्राप्ति में ज्यादा कानूनी मशक्कत भी नहीं करनी पड़ेगी और वैसा सब केन्द्र में सत्तारूढ़ दल की भावना के अनुरूप हो जाएगा, जैसा कि हाल ही में कर्नाटक में हुआ है?
अब आज समान सिद्धांत, कानून व संवैधानिक समझ कहां काम आती है, जिसके ताजा उदाहरण गोवा, मणिपुर, बिहार और मेघालय हंै, जहां चुनाव में सबसे ज्यादा सीटें प्राप्त करने वाले दलों की उपेक्षा कर गठबंधन वालों की सरकारें बनवा दी और कर्नाटक में उसकी उलटबासी कर दी गई और अतिउदार राज्यपाल महोदय अपना बहुमत जुटाने और खरीद-फरोख्त करने के लिए एक पखवाड़े का समय भी दे दिया। यह संभव है कि कर्नाटक के राज्यपाल वजुवाला ने किसी पूर्वाग्रह के तहत यह कदम उठाया हो, क्योंकि कर्नाटक के देवैगौड़ा जब प्रधानमंत्री थे तब उन्होंने भी वह गुजरात विधानसभा भंग की थी, जिसके सिरमौर वजुवाला थे, यदि ऐसा है तो यह सही है कि राज्यपाल ने एक पत्थर से दो शिकार कर दिए अपने मित्र नरेन्द्र मोदी की शाबाशी भी हासिल कर ली और देवैगौड़ा से पुराना हिसाब भी बराबर कर लिया।
जो भी हो, किंतु आज देश के लिए यह सबसे बड़ा और अहम चिंता का विषय है कि जब सर्वोच्च संवैधानिक पद पर विराजित ‘महामहिमगणÓ इतने पक्षपाती हो जाएगें और अपने विशेष अधिकारों की आड़ में कानून व संविधान की धज्जियां उड़ाएगें तो फिर देश में लोकतंत्र कहां रह पाएगा? इस अहम् सवाल का उत्तर किसी ने भी खोजने की कौशिश की? आज मैं व्यक्तिगत रूप से इसीलिए काफी निराश होकर यह सब लिख रहा हूं।