क्या मोदी का घोड़ा इंदिरा की राह पर सरपट दौड़ रहा…?

ओमप्रकाश मेहता

पूरे देश के जागरूक नागरिकों व बुद्धिजीवियों की यह जिज्ञासा है कि आपातकाल के काले साये को गुजरे तो चार दशक से भी अधिक हो गए, इस अवधि में अटल बिहारी वाजपेयी जैसे मुखर नेताओं जैसी कई सरकारें आई और चली गई, किंतु अब 43 साल बाढ़ प्रधानमंत्री नरेन्द्र भाई मोदी को आपातकाल की उनकी ‘फैंसी ड्रेस सेवाÓ की कैसे याद आ गई और उन्होंने अपने पुराने काल की घटना को 2019 के साथ जोडऩे को मजबूर होना पड़ा? फिर मोदी जी तो यह भी अच्छी तरह जानते है कि आपातकाल तो कांग्रेस की करतूत थी, क्या सिर्फ उसी को सम्बल बनाकर 2019 की चुनावी वैतरणी पार की जा सकती है? और क्या अब उस कांग्रेस में अभी भी इतनी ताकत है क्या, जो वह मोदी की कुर्सी को हिला सके या मोदी जी कांग्रेस के संगी-साथियों को आपातकाल के नाम पर कांग्रेस से दूर करने का असफल प्रयास कर रहे हैं?
अब जब आपातकाल की बात स्वयं हमारे प्रधानमंत्री जी ने छेड़ ही दी है, तो भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठतम नेता लालकृष्ण आडवानी जी का वह ताजा बयान भी याद आने लगा है कि ”आपातकाल को दोहराए जाने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकताÓÓ उन्होंने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के शासन के तरीके की हंसी उड़ाते यह भी जोड़ा था कि ”नेताओं का अहंकार तानाशाही की ओर ले जाता है।ÓÓ अब चाहे स्वयं नरेन्द्र मोदी व अमित शाह अपने बुजुर्ग नेता के इस बयान से नाराज हुए हो और उन्होंने आडवानी जी को झिड़की देने के लिए उन्हें चाहे उस कार्यक्रम में आमंत्रित न किया हो जिसमें आपातकाल में जेल जाने वालों को सम्मानित किया गया, लेकिन भाजपा के इस बुजुर्ग नेता ने अपना संदेश तो पूरे देश में फैला ही दिया और उसी संदेश के मूल्यांकन में पूरा देश जुट गया।
अब यह तो स्वयं श्री आडवानी जी जाने जी जाने कि उन्हें आखिर ऐसा विवादास्पद बयान अपने ही उद्दंड शिष्य के खिलाफ क्यों देना पड़ा? उन्होंने कौन सी तानाशही और अहंकार की ओर इशारा किया है? किंतु यह तय है कि नौवें दशक के उम्र पड़ाव पर अनुभवों का भारी टोकरा सिर पर उठाए चल रहे माननीय आडवानी जी को कुछ तो ऐसा लगा ही होगा जो नरेन्द्र भाई को इंदिरा जी के निकट खड़ा करता हो? फिर यदि सही कहा जाए तो यह मान्यता अकेले आडवानी जी की नहीं, यदि अटल जी कुछ बोल पाने की स्थिति में होते तो वे भी शायद कुछ इसी तरह की भावनाऐं व्यक्त करते, क्योंकि आज न तो भाजपा के संरक्षक संघ की कोई अहमियत रह गई है और न ही भाजपा के अनुषांगिक संगठनों विहिप, बजरंग दल आदि की जब राजग (एनडीए) के सहयोगी दलों की ही कोई अहमियत नहीं रह गई तो फिर अन्यों के बारे में क्या कहा जाए? आज तो सत्ता व संगठन का पूरी तरह बंटवारा हो चुका है सत्ता मोदी के पास, संगठन अमित भाई के पास, और बाकी सभी इन्ही राम-हनुमान के भक्त। अब तो देश में यही होता है जो ये दोनों सर्वोच्च नेता चाहते है, अब ऐसी स्थिति को आखिर क्या कहा जाए?
जहां तक आडवानी जी की आशंका का सवाल है, वह इस दृष्टि से भी सही साबित हो रही है कि मोदी-शाह ने अगले कुछ ही महीनों में देश के सभी प्रमुख प्रतिपक्षी नेताओं को कानूनी-शिकंजें में लाकर उन्हें जेल में डालने की तैयारी शुरू कर दी है, जिसकी शुरूआत चिंदम्बरम् से काफी पहले हो चुकी है, अब संभावना व्यक्त की जा रही है कि कांग्रेस के गांधाी कुनबे को घेरने की भी शुरूआत कर दी गई है, जिसमें प्रियंका के पति वाड्रा को आयकर के शिकंजे में कसने की तैयारी है। इसी तरह न सिर्फ कांग्रेस बल्कि बसपा, सपा, राजद, जदयू आदि के नेताओं की भी पुरानी फाइलें खंगाली जा रही है, जिससे कि चुनाव के पहले इनके महागठबंधन के मंसूबे पर पानी फैरा जा सके और शेष नेता डरकर ”मोदी शरणम् गच्छामिÓÓ का पाठ शुरू कर दें। अपने मकसद को पूरा करने के लिए नरेन्द्र भाई साम-दाम-दण्ड-भेद हर नीति का उपयोग करने को तत्पर दिखाई दे रहे हैं, वे येन-केन-प्रकारेण 2019 को फतह करना चाहते हंै, अब यह एक अलग बात है कि उनके चार वर्षीय शासनकाल को हर तरीके से बदनाम करने के लिए राष्ट्र संघ सहित कई देश एक जुट होने लगे हैं, जिसका ताजा उदाहरण कश्मीर को लेकर राष्ट्र संघ का बयान और महिला अत्याचार पर विश्व स्तरीय सर्वेक्षण रिपोर्ट है। इस प्रकार कुद मिलाकर अभी यह कतई साफ नहीं है कि देश को किस दिशा में ले जाने की तैयारी की जा रही है? और देश का भावी भविष्य क्या होगा?