क्या गुजरात के तट से आया मानसून प्रदेश में सियासी फसल दे पायेगा

होमेंद्र देशमुख (मुन्ना)
मप्र मे इस बार मानसून गुजरात से आया है आश्चर्य किंतु सत्य ! आता तो रहा होगा । पर चूंकि मैं मौसम विज्ञानी नही हूं, इसलिए कोई पुख्ता दावा नही कर सकता पर यही सुनता रहा हूं कि मानसून राज्य के पूर्वी -दक्षिणी सीमा के डिंडौरी बालाघाट छिंदवाड़ा की ओर से ही मप्र मे आता रहा है ।
बताइये कभी आपने सुना था कि कभी संयुक्त रहे मप्र मे मानसून का प्रवेश गुजरात से हुआ होगा । हमेशा मानसून बस्तर होते बालाघाट के रास्ते राजधानी पहले आता था, फिर मालवा के इंदौर फिर राजस्थान व गुजरात की ओर यही सिस्टम बढ़ता रहा है । वहीं अरब सागर से दूसरा बना सिस्टम भी कवर देते हुए मालवा को दूसरी खेप मे तरबतर करता था । हां मानसून के दस्तक से पहले हमेशा एक सिस्टम जरूर मुंबई से चलकर कभी-कभी महाराष्ट्र -गुजरात के बीच खंडवा से या विदर्भ के नागपुर से सीधे आता रहा है , लेकिन वह प्री-मानसून या बंबई बरसा होता था । जो अरब सागर मे नमी व तूफान से आता था ।
गुजरात से मानसून
आश्चर्य लेकिन सत्य है । मप्र और छत्तीसगढ़ मे इस बार चुनाव है । और गुजरात की छोर से प्रदेश मे पहुँचा यह मानसून । मोदी जी को तो बनारस मे मां गंगा ने बुलाया था ! लेकिन लगता है मोदी जी ने मानसून को इस बार पहले गुजरात मे बुलाया लिया ! यह सब महज मजाक और इत्तेफाक की बात हो सकती है !
लेकिन यह। मजाक और अतिशयोक्ति होगी कि हर साल मप्र को मानसून का संदेशा भेजते रहने वाले छत्तीसगढ़ मे भी अब के बरस ये मानसून कहीं मप्र के डिंडौरी और मंडला से प्रवेश करने की नौबत न आ जाए..!
सिर्फ नाम के लिए छत्तीसगढ़ के बस्तर मे 2 जून 2018 को पहुंचे मानसून का 2 जुलाई तक वहां कहीं अता-पता नही था । मानसून की खैंच वहां भी चल रही है ।
कुछ भी हो रहा है..!
अरब सागर के तट पर बसा गुजरात देश के प्रधानमंत्री जी का गृह राज्य है । चाहे मानसून कहीं से आए पर मप्र और छत्तीसगढ़ के चुनावी साल मे इस बार मानसून यहां जम कर नही बरसा तो मोदी जी के लिए भी चुनावी फसल काटना जरा मुश्किल हो सकता है। ऐसे मे उनके समर्थक चाहे कहें -मोदी जी ने गुजरात से मानसून भेजा है , चाहें विरोधी कहें – अब मानसून भी मोदी जी ने हाइजैक कर लिया है..!
बात इतनी सी है कि गंगा उल्टी बहे न बहे पर शायद मानसून जरूर उलटी बहने लगी.?
अब कहने वाले कहते रहो
मोदी इफेक्ट..!-एक जरूरी बात बता दूं । मानसून पूरी तरह से हवाओं के बहाव पर निर्भर करता है। आम हवाएं जब अपनी दिशा बदल लेती हैं तब मानसून आता है। जब ये ठंडे से गर्म क्षेत्रों की तरफ बहती हैं तो उनमें नमी की मात्रा बढ़ जाती है जिससे बारिश होती है। भारत में मानसून हिन्द महासागर व अरब सागर की ओर से हिमालय की ओर आने वाली हवाओं पर निर्भर करता है। जब ये हवाएं भारत के दक्षिण पश्चिम तट पर पश्चिमी घाट से टकराती हैं तो भारत और आसपास के देशों में भारी वर्षा होती है। ये हवाएं भारत सहित दक्षिण एशिया में जून से सितंबर तक सक्रिय रहती हैं। वैसे किसी भी क्षेत्र का मानसून उसकी जलवायु पर निर्भर करता है। अमूमन मानसून की अवधि में तापमान में तो कमी आती है, लेकिन आर्द्रता (नमी) में अच्छी वृद्धि होती है। आद्रता की जलवायु विज्ञान में महत्वपूर्ण भूमिका मानी जाती है। यह वायुमंडल में मौजूद जलवाष्प की मात्रा से बनती है और पृथ्वी से वाष्पीकरण के विभिन्न रूपों द्वारा वायुमंडल में पहुंचती है।
संयुक्त मप्र के छत्तीसगढ़ मे अमूमन पूर्व यानि बस्तर की ओर से प्रवेश करता रहा है । अब मप्र मे , जहां यह मानसून डिंडौरी मे छत्तीसगढ़ से और बालाघाट मे महाराष्ट्र के गोंदिया की ओर से आता है । इस बार मानसून प्रदेश मे अपने औसत प्रवेश के लगभग 10 दिनों के बाद 24 जून को तो पहुच गया लेकिन आपको आश्चर्य होना चाहिए इस बार मानसून ने गुजरात की सीमा से मप्र मे प्रवेश किया है । जहां 24 जून को मप्र के धार ,बड़वानी, झाबुआ। अलीराजपुर खरगोन मे मानसून ने प्रवेश किया वहीं मानसून 25 जून को इंदौर फिर अगले 48 घंटों के भीतर ,इसके बुधवार 2। जून की शाम मप्र की राजधानी भोपाल पहुंचने की आधिकारिक पुष्टि कर दी गई । पर आई और कहां गुम हो गई, इस मानसून का कुछ पता नही चल रहा ।
वहीं गुजरात के ही दूसरे छोर से निकलता मानसून ,देश की राजधानी दिल्ली की ओर कूच कर गया । दिल्ली मे भी मानसून मप्र से ही होकर पहले जाता रहा है । जुलाई का महीना शुरू हो चुका है । सोयाबीन, उड़द और धान की फसल बोने का समय निकला जा रहा है । मप्र और छत्तीसगढ़, दोनों जगह किसान अच्छी वर्षा का इंतजार कर रहे हैं । पिछले सालों के किसानों की आत्महत्या और सरकार की भरपाई का कसर इस साल के मानसून पर टिकी है । पर मोदी के राज्य से आया मानसून भी मोदी जी की तरह बोम्म मार कर रह गया । राजस्थान के साथ मप्र और छत्तीसगढ़ मे यह साल चुनाव का है । जुलाई के इस सप्ताह मे कहीं कहीं छुटपुट बारिश हो रही है लेकिन झमाझम बारिश का शहरियों के साथ साथ किसानों को भी इंतजार है । गुजरात से आए इस मेहमानी मानसून का शोर कहीं नही और अब मप्र और छत्तीसगढ़ मे बंगाल की खाड़ी से आते नमी पर मौसम विभाग के साथ किसानों को भी इंतजार जारी है । पर इस चुनावी साल मे मानसून की खैंच ने इन राज्यों के किसानों के अलावा सत्ता से जुड़े सियासी लोगों की चिंता भी बढ़ा दी है । दरअसल मप्र मे पहले गेहूं, फिर प्याज और इस साल लहसून जैसे कैश क्रॉप पर भावांतर के भंवर मे फंसे किसानों के लिए मानसून की खैंच, नवंबर मे होने वाले चुनाव मे इस बार आग मे घी का काम कर सकती है । उसके बाद अगले मानसून के पहले लोकसभा का चुनाव होना है । इसलिए सत्ता से जुड़े लोग अच्छी मानसूनी बारिश और भरपूर फसल की दुआ मांग रहे हैं । भारत की कृषि और अर्थव्यवस्था अभी भी मानसून के तेवर से नापी जाती है । ऐसे मे विधान सभा चुनाव वाले राज्यों मे मतदाता और किसान के चेहरे पर खुशी होगी तभी सत्ता की फसल काटी जा सकेगी ।
लेखक एबीपी न्यूज मे वीडियो जर्नलिस्ट हैं