आखिर क्यों नहीं कायम कर पाई महबूबा अपने विधायकों पर विश्वास ?

जम्मू कश्मीर में तीन साल तक सत्ता में रहे भाजपा -पीडीपी गठबंधन से भाजपा द्वारा रिश्ता तोड़ लिए जाने के बाद पीडीपी की मुखिया महबूबा मुफ्ती को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने के लिए विवश होना पड़ा। इसके बाद किसी भी दल अथवा गठबंधन के बाद पास बहुमत न होने के कारण राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाना पड़ा। राज्य विधानसभा छह माह के लिए निलंबित कर दी गई है। पीडीपी का साथ देने के लिए कांग्रेस और नेशनल कांफ्रेस तैयार नही है। नेशनल कांफ्रेंस तो राज्य में जल्द ही विधानसभा चुनाव कराने के पक्ष में है ,किन्तु राज्य में अभी कानून व्यवस्था की स्थिति चुनाव के अनुकूल नहीं है। आतंकी हमलों की घटनाओं में रमजान के पवित्र महीने जो बढ़ोत्तरी हुई थी,उसके लिए मेहबूबा मुफ्ती के पास कोई संतोषजनक जवाब नही था, जबकि रमजान के दौरान आपरेशन आल अभियान को स्थगित रखने की मांग उन्होंने ही कि थी। वे तो अमरनाथ यात्रा के दौरान भी ऑपरेशन स्थगित रखने के पक्ष में थी, परंतु रमजान महीने में जिस तरह से आतंकी घटनाओं में बढ़ोत्तरी हुई थी उसके बाद केंद्र सरकार को पुन: अभियान शुरू करने की अनुमति देनी पड़ी। इसी के कुछ दिन बाद भाजपा ने सत्तारूढ़ गठबंधन से बाहर आने का फैसला कर लिया था। मुख्यमंत्री की कुर्सी जाने के बाद पहले तो महबूबा कुछ दिनों तक चुप रही,परंतु धीरे-धीरे उन्हें यह अहसास होने लगा कि उनकी ही पार्टी के कुछ विधायक मुख्यमंत्री के रूप में उनकी कार्यशैली से खुश नही थे। ऐसे विधायक पार्टी का साथ छोड़ सकते हैं तो मेहबूबा बौखला उठी। उन्हें अब यह डर सताने लगा कि ये असंतुष्ट विधायक कही भाजपा से न जाकर मिल जाए ,जिससे भाजपा सरकार बनाने में सफल हो जाए। मेहबूबा मुफ्ती अपनी गलतियों को स्वीकारने की बजाय भाजपा पर पीडीपी को तोडऩे का आरोप लगा रही है। अपने विधायकों को एकजुट रखने में नाकाम मेहबूबा ने केंद्र सरकार को धमकी दे डाली है कि अगर पार्टी को तोडऩे की कोशिश की गई तो इसके परिणाम खतरनाक होंगे। मेहबूबा मुफ्ती ने कहा कि 1987 में लोगों ने मुस्लिम संयुक्त मोर्चा के पक्ष में मतदान किया था,लेकिन नई दिल्ली ने दखल देकर उसे तोड़ दिया था, जिसके परिणाम के रूप में अलगांववादी नेता यासीन मलिक एवं आतंकी संगठन हिज्बुल मुजाहिदीन के सरगना सैयद सलाउद्दीन को उभरने का मौका मिला था। 1987 के चुनावों में सलाउद्दीन का पोलिंग एजेंट यासीन मलिक ही था। सलाउद्दीन बाद में पाकिस्तान चला गया था। महबूबा उस दौर को एक बार फिर दोहराने की धमकी दे रही है। मेहबूबा पार्टी में फूट का ठीकरा भाजपा के सिर पर फोडऩा चाहती है, जबकि इस स्थिति के लिए वह स्वयं जिम्मेदार है। उन्होंने अगर ईमानदारी से गठबंधन धर्म निभाया होता तो राज्य में उनकी सरकार कार्यकाल पूरा कर सकती थी। मेहबूबा का अपना अलग एक एजेंडा था। मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने के बाद उन्होंने कहा भी था कि उन्होंने अपना एजेंडा पूरा कर लिया है। मुफ्ती ने सलाउद्दीन एवं यासीन मालिक का नाम लेकर औऱ भी खतरनाक परिणाम की जो धमकी दी थी उससे तो यही हकीकत का अनुमान लगाया जा सकता है कि मेहबूबा की सहानुभूति इन जैसे लोगो के प्रति जैसी पूर्व में थी उसमे कोई कमी नही आई है। पाकिस्तान के प्रति भी उनकी हमदर्दी पहले जैसी ही है। कश्मीर पर किसी भी तरह की बातचीत में वह पाकिस्तान को शामिल करने की वकालत हमेशा करती रही थी। उनके पिता स्व मुफ्ती मोहम्मद सईद तो जम्मू कश्मीर में शांतिपूर्ण चुनाव संपन्न होने का श्रेय पाकिस्तान को दे चुके है। भाजपा ने पीडीपी से गठबंधन कर संयुक्त सरकार बनाने का फैसला इसी उम्मीद से किया था कि इससे मेहबूबा के रुख में कुछ सकारात्मक बदलाव आएगा,किन्तु महबूबा नही बदली और भाजपा को गठबंधन तोडऩा पड़ा। अब मेहबूबा को लगता है कि उनके कुछ विधायको को भाजपा तोडऩा चाहती है,जबकि वस्तुस्थिति यह है कि पीडीपी के कुछ विधायक स्वयं ही पार्टी में घुटन महसूस कर रहे है। सत्ता से हटने के बाद पार्टी के ऐसे विधायकों ने मेहबूबा के प्रति बगावत के सुर बुलंद कर दिए है। घाटी के प्रभावशाली शिया नेता एवं पूर्व मंत्री इमरान अंसारी ने यह आरोप लगाया है कि मेहबूबा ने सरकार एवं पार्टी को फैमली शो बना रखा था।
उन्होंने अपने मंत्रिमंडल में महत्वपूर्ण विभाग अपने रिश्तेदारों को बाट दिए थे एवं वे लोग अपने हिसाब से सरकार एवं पार्टी को चलाना चाह रहे थे। हाल ही में पीडीपी के पांच विधायकों ने सार्वजनिक रूप से मेहबूबा की आलोचना की थी।उसी के बाद ये खबर आई थी कि पीडीपी के कुछ विधायक भाजपा के संपर्क में है। इधर भाजपा ने यह साफ कर दिया है कि वह पीडीपी के विधायकों को साथ लेकर नई सरकार बनाने की किसी भी संभावना पर विचार नही कर रही है। भाजपा ने कहा कि वह अनावश्यक चिंता कर रही है। उन्हें तो यह विचार करना चाहिए कि उनका जनाधार क्यों खिसक रहा है।
वैसे भी जम्मू कश्मीर में दलबदल कानून इतना सख्त है कि पीडीपी के असन्तुष्ट विधायकों के लिए भाजपा का दामन थामना आसान नही है।वैसे तो राजनीति संभावनाओं का खेल है औऱ मेहबूबा का वर्चस्व इसी तरह घटता रहा तो उनके राजनीतिक भविष्य पर प्रश्नचिन्ह लग सकता है। नेशनल कांफ्रेंस एवं कांग्रेस वहां शीघ्र ही चुनाव कराने के पक्ष मे है,लेकिन आतंकी गतिविधियों के कारण यह अभी सम्भव नही दिखाई दे रहा है। फिलहाल तो केंद्र सरकार की यह प्राथमिकता यह होनी चाहिए कि राज्य में सेना के द्वारा चलाया जा रहा अभियान शत प्रतिशत सफल हो तभी चुनाव के अनुकूल वातावरण बनाया जा सकेगा।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक और आईएफडब्ल्यूजे के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं)