राहुल गांधी की इज्जत दांव पर-कमलनाथ तनाव पर …

अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के महासचिव मप्र के प्रभारी दीपक बावरिया के विवादित बयानों ने कांग्रेस के ग्राफ को गिराया और स्थिति अब यहां तक पहुंच गई कि मध्यप्रदेश में
विशेष संपादकीय
विजय कुमार दास
मध्यप्रदेश में 2018 का विधानसभा चुनाव बकौल अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष राहुल गांधी के महाभारत के रूप में लड़ा जाना चाहिए था, लेकिन 72 वर्षीय कमलनाथ को प्रदेश कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष और युवा सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया को चुनाव अभियान समिति का अध्यक्ष बनाकर कांग्रेस ने यह समझ लिया कि मध्यप्रदेश में वे सत्ता के करीब पहुंच ही गए हैं। शुरुआती दिनों में तो जब कमलनाथ और सिंधिया आए तो ऐसा लगा भी कि कांग्रेस की सरकार आने वाली है, क्योंकि कांग्रेस को यहां कमलनाथ के चेहरे के साथ-साथ जनता की शिवराज सरकार से मैदानी स्तर पर नाराजगी का फायदा मिल सकता है। कमलनाथ ने प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में कुछ ताकत दिखाई भी, एकजुटता के एक साथ कई प्रयास किए, लेकिन उनके तमाम प्रयासों पर पानी फेरते हुए अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के महासचिव और मध्यप्रदेश के प्रभारी दीपक बावरिया ने कांग्रेस को सत्ता में आने के जितने रास्ते खुले थे, सब एक साथ बंद कर दिए। इसी के चलते अब मध्यप्रदेश में राहुल गांधी की इज्जत दांव पर लग गई है और बेचारे कमलनाथ बेहद तनाव से गुजर रहे हैं। संपादक होने के नाते जब हम दीपक बावरिया के उन विवादित बयानों पर नजर डालते हैं, जिनकी वजह से कांग्रेस के कमलनाथ को तनाव पर आना पड़ा है तो लगता है कि दीपक बावरिया मध्यप्रदेश 2018 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के पराजय के लिए आखिरी कील ठोंकने वाले साबित होंगे, जिसका पूरा-पूरा फायदा केवल और केवल पिछड़ेपन, किसान और साधारण परिवार का औरा लिए जन आशीर्वाद यात्रा को लेकर गली-गली घूम रहे मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को ही मिलने वाला है। बावरिया के बयानों पर जरा नजर डालिए, उन्होंने कहा कि यादव समाज में संग्राम छिड़ गया है तो उनका पुतला फुंक गया। उन्होंने कहा कि विधानसभा टिकट के लिए 50 हजार रु. जमा करो, 60 साल के ऊपर के लोगों को टिकट न दिए जाएं। इनके उपरोक्त दोनों बयान, जिससे पूर्व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अरुण यादव नाराज हुए तो परंपरागत कांग्रेसियों ने फिर एक बार घर बैठने का फैसला कर लिया। बावरिया ने मीडिया को कह दिया कि सरकार के हाथों बिका हुआ है तो फिर मीडिया के कड़े ऐतराज के सामने बावरिया औंधे मुंह गिर पड़े। बावरिया के विवादों की गाड़ी यहां थमती नहीं, उन्होंने कमलनाथ और सिंधिया को छोटा दिखाते हुए 9 ऐसे रत्नों की नियुक्तियां कर दीं, जिनकी वजह से भोपाल में कमलनाथ और सिंधिया के समर्थकों में भयंकर नाराजगी उभरकर सामने आई। बावरिया जानते हैं कि उनका कद कमलनाथ और सिंधिया के सामने मेढक की तरह है, लेकिन अपनी टर्र-टर्र आवाज और उछल-कूद से अस्तित्व बनाने के चक्कर में कमलनाथ के सामने संकट का पहाड़ खड़ा कर देते हैं। ताजी घटना विंध्य प्रदेश की है, जहां विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह को वहां के कार्यकर्ता अपना भावी मुख्यमंत्री समझते हैं, उनके सामने यह कहना कि सरकार बनी तो ज्योतिरादित्य सिंधिया या कमलनाथ में से ही किसी को मुख्यमंत्री बनाया जाएगा तो अजय सिंह के समर्थक बिफर पड़े, उन्होंने अंडे- टमाटर भले न फेंके हों, लेकिन झूमाझटकी करके बावरिया के कारण कांग्रेस में उभरते हुए झगड़े का प्रमाण तो दे ही दिया। इसके पहले कांग्रेस संगठन में मंडल और सेक्टर तथा ब्लाक इकाइयों को संगठन में बदलाव करके कांग्रेस से जुड़े निष्ठावान लोगों को परेशान किया, यह बात कमलनाथ आज तक नहीं पचा पाए। अंतिम और कड़वा सच यह है कि बावरिया की मध्यप्रदेश में कांग्रेस के बड़े-बड़े नेताओं से पटरी ही नहीं बैठती, जिसकी वजह से कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ अनावश्यक रूप से दबाव झेलते हैं और ऐसे समय में जब उन्हें भाजपा के संगठन और शिवराज जैसे स्टार प्रचारक से मुकाबला करना हो तो दीपक बावरिया को मध्यप्रदेश की जिम्मेदारी से अलग कर देने में ही कांग्रेस तनाव मुक्त वातावरण में काम कर सकेगी, ऐसा कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं है, वरना यदि सच को कमलनाथ और सिंधिया कबूलने को तैयार न हों तो राहुल गांधी भी मध्यप्रदेश में कितना दम लगाएंगे। सरकार आना या सरकार में नहीं आना अलग बात है लेकिन तनावमुक्त रहकर चुनाव को खेल भावना से युद्ध की तरह लडऩा तभी संभव हो सकता है, जब कांग्रेस के घर में विवादों को रोज-रोज जन्म देने वाला कोई भी हो, ऐसे समय में दूर रहें या दिल्ली रहें, क्योंकि बावरिया यह कहकर कांग्रेस में सेंध लगाते हैं कि जब भाजपा षडय़ंत्र करती है तो अजय सिंह माफी क्यों मांगते हैं?