हिन्द को अभी भी गांधी के स्वराज की तलाश

सुनील दत्त तिवारी
कोई भी देश तभी उन्नति कर सकता है, जब वो अपने अस्तित्व से पूरी तरह वाकिफ हो। इसे अपने लिए सोचना-सीखना होगा, अपनी समस्याओं के समाधान खुद तलाशना होगा। पर मैं जिस ओर भी देखता हूं मुझे लगता है कि हमारी हालत अभी भी उस पक्षी जैसी है, जो लंबी कैद के बाद पिंजरे में से आजाद तो हो गया हो, पर उसे नहीं पता कि इस आजादी का करना क्या है ? इसके पास पंख हैं पर ये खुले आसमान में उडऩे से डरता है। ये सिर्फ उस सीमा में ही रहना चाहता है जो उसके लिए निर्धारित की गई। व्यक्तिगत और सामूहिक रूप से हम वॉल्टर मिटी (एक उपन्यास का काल्पनिक चरित्र जो एक काल्पनिक दुनिया में ही रहता है) जैसी जिंदगी ही जी रहे हैं। हमारे अंदर की जिंदगी बाहर की जिंदगी से बिलकुल उलट है। हमारी सोच और कामों में जमीन-आसमान का अंतर है। हम बदलाव तो चाहते हैं पर बरसों से चली आ रही लीक से हटकर सोच पाने का साहस ही नहीं जुटा पाते। मैं समझता हूं कि हमारे देश में भी कई पुलिस-अफसर ऐसे होंगे, जो जनता के मन में डर पैदा करने की बजाय उसकी सेवा और सहायता करना चाहते हैं। उन्होंने यह भी पढ़ा-सुना होगा कि इंग्लैंड में पुलिस का जनता से व्यवहार बहुत मददगार होता है , पर वे अंग्रेजी साम्राज्य से मिली हुई व्यवस्था के शिकार हैं जो अपने देश में तो अलग है पर यहां के लिए नहीं। इस औपनिवेशिक परंपरा के अनुसार, जब भी कोई व्यक्ति उनके दफ्तर में दाखिल हो, तो डर भर दिया जाए, उससे जितना हो सके प्रतिरोधी और गैर-मददगार व्यवहार किया जाए। ये व्यवस्था हर सरकारी दफ्तर में चपरासी से लेकर मंत्री तक में देखी जा सकती है। जब सरकार यह कहती है कि विकास के लिए कठोर क़दम उठाने होंगे, तब उसका पहला मतलब यह नहीं होता है कि लोगों की बेहतरी के लिए कठोर क़दम उठाना है। वास्तव में सरकार आर्थिक विकास नीति के जाल में जब गहरे तक फंस जाती है, तब कठोर क़दम उठाती है।
हर साल उद्योगों के लगभग चार लाख करोड़ रुपये की शुल्क छूट, अंतरराष्ट्रीय व्यापार मंचों/समझौतों के दबाव में स्थानीय बाजार को बदहाल बनाने, बैकों के ज़रिये बड़े व्यापारिक समूहों को देने के बाद वसूल न कर पाने और फिर भारी भरकम (लोक ऋण) का बोझ बढ़ जाने के कारण जनता को चुभने वाले क़दम उठाए जाते हैं। आर्थिक विकास की मौजूदा परिभाषा बहुत गहरे तक फंसाती है। यह पहले उम्मीद और अपेक्षाएं बढ़ाती है, फिर उन्हें पूरा करने के लिए समाज के बुनियादी आर्थिक ढांचे पर समझौते करवाती है, शर्तें रखती है और समाज के संसाधनों पर एकाधिकार मांगती है।
इसके बाद भी मंदी आती है और उस मंदी से निपटने के लिए और रियायतें मांगती है तब तक राज्य और समाज इसमें इतना फंस चुका होता है कि वह बाजार की तमाम शर्तें मानने के लिए मजबूर हो जाता है क्योंकि तब तक उत्पादन, ज़मीन, बुनियादी सेवाओं से जुड़े क्षेत्रों पर निजी ताक़तों का क़ब्जा हो चुका होता है। मूल बात यहां से शुरू होती है कि यदि आर्थिक विकास हो रहा है, तो गऱीबी कम होना चाहिए, पर कम हो रही नहीं है। यदि देश का सकल घरेलू उत्पाद बढ़ रहा है, तो देश, सरकार और समाज पर से कजऱ़् कम होना चाहिए, पर यह तो सैंकड़ों गुना बढ़ गया। यह कैसा विकास है? हमें जीडीपी के भ्रम से बाहर आना होगा, क्योंकि यह और पूंजीपतियों को करों में छूट देकर खड़ा किया गया भ्रम जाल है। बार-बार सुनते हैं कि 1947 में हमें राजनीतिक आजादी तो मिल गई थी, किन्तु सामाजिक और आर्थिक आजादी के लिए देशज स्वतंत्रता आंदोलन की रूपरेखा हम गढ़ नहीं पाए। उपनिवेशवाद ने हमारी आंखों में केंद्रीकृत अर्थव्यवस्था और मशीनी विकास की दृष्टि डाल दी थी। हम उसे बदलने का जोखिम उठा नहीं पाए। पता नहीं कहां से हमें सबसे बड़ा बनाने, सबसे विशाल निर्माण, विश्वगुरु, महागुरु, महाशक्ति बनने का भ्रम-विष वाला कीड़ा काट गया। इस विष ने हमसे अपनी ख़ुद की स्वाभाविक क्षमताओं को पहचानने के ताक़त छीन ली। हमने यह दावा नहीं किया कि विश्वयुद्धों और इसके बाद लगातार बने रहे युद्धों के माहौल में भारत दुनिया को इंसानियत का व्यवहार सिखा सकता है। यह बता सकता है कि समान और गरिमामय समाज बना पाना संभव है। भारत अपने ऐतिहासिक अनुभवों और सीखों के आधार पर इस सिद्धांत को बदल सकता था कि युद्धों से ही शांति और अमन हासिल किया जा सकता है। आज़ादी के उत्सव की रस्म अदायगी का यह सवाल अगस्त 1947 की उस उमस भरी रात में शायद बूढ़े गांधी के सामने भी आया होगा। लेकिन शिकायती और निराशावादी ठहरा दिए जाने की कीमत पर भी एक अनाश्वस्त खोजी की तरह वे कलकत्ते के बेलियाघाटा की गलियों में अपने अर्थों वाला स्वराज ढूंढ़ रहे थे। कौमी एकता और असली आज़ादी का मर्म खुद भी समझने की कोशिश कर रहे थे और यथासंभव अधिक से अधिक लोगों को समझाने की कोशिश भी कर रहे थे। 15 अगस्त, 1947 को दिन के दो बजे कलकत्ते में ही कम्युनिस्ट पार्टी के कुछ सदस्य महात्मा गांधी से मिलने आए। उन्होंने गांधी से पूछा कि क्या वे आज आज़ादी का उत्सव नहीं मनाएंगे? इस पर उन्होंने कहा था – ‘मैं इस हर्षोल्लास में भाग नहीं ले सकता, जो कि एक दु:खद प्रसंग है। Ó ठीक एक दिन पहले यानि 14 अगस्त को यहीं पर एक खचाखच भरी प्रार्थना-सभा में उन्होंने कहा था – ‘कल का दिन विदेशी जुए से मुक्ति के लिए तय किया गया दिन है। इसलिए वह एक महान दिन है। आप बेशक उसे बहुत धूमधाम से मनाएंगे। लेकिन वह ऐसा दिन होगा जिस दिन इन दोनों ही देशों के कंधों पर एक बड़ा भारी बोझ पडऩे वाला है। मैं आप सबसे अनुरोध करूंगा कि कल के दिन आप समस्त भारत के कल्याण के लिए 24 घंटे का उपवास रखें और दिन में प्रार्थना करें और जहां तक बन सके, यह दिन चरखा कातने में बिताएं।Ó यह कोई अनायास नहीं था। आज़ादी के लिए जब से यह दिन मुकर्रर किया गया था, तभी से गांधी इस पर लगातार इसी भावना में बोल रहे थे। आज़ादी से करीब एक महीने पहले 20 जुलाई, 1947 को उन्होंने कहा था- ‘वे कहते हैं कि जिस आज़ादी के लिए आप लड़ रहे थे वह तो मिल गई और राजनीतिक आज़ादी के साथ-साथ आर्थिक आज़ादी भी मिल जाएगी। यह सब कुछ होने पर भी मैं आजादी के दिन यानी 15 अगस्त को खुशी नहीं मना सकता। मैं आपको धोखा नहीं देना चाहता, इसलिए मैं जाहिरा यह बात कह रहा हूं। मगर मैं आपसे यह नहीं कह सकता कि आप भी खुशी न मनाएं। आखिर सब काम मेरी मर्जी के मुताबिक थोड़े ही न होते हैं. …यह न सोचें कि गांधी क्यों नहीं खुशी मनाता। अगर कोई न मनाना चाहे तो कांग्रेस किसी को मजबूर तो करती नहीं, लेकिन मेरी अपनी राय है कि वह दिन खुशी मनाने के लिए नहीं है। मैं तो उस दिन आज़ादी मिली समझूंगा जिस दिन हिन्दू और मुसलमानों के दिलों की सफाई हो जाएगी। Ó 27 जुलाई को उन्होंने कहा था – ‘जब हमारे दिल में किसी प्रकार का जहर नहीं होगा, तभी तो हम 15 अगस्त का दिन दिल खोलकर मना सकेंगे। Óकोई कह सकता है कि भारत के विभाजन ने हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच जिन अप्रिय परिस्थितियों को जन्म दिया था, गांधी जी उसके तात्कालिक क्षोभ के मारे ऐसा कह रहे होंगे। लेकिन गहराई से जानने पर समझ में आता है कि केवल इतना भर नहीं था। जैसा कि सुविज्ञ लोग जानते ही होंगे कि गांधी के अर्थों वाले स्वराज का मतलब केवल अंग्रेजों से लेकर भारतीयों के हाथ में सत्ता सौंप दिया जाना भर नहीं था। तब से करीब चार दशक पहले गांधी ने ‘हिन्द स्वराजÓ में अपने अर्थों वाली आज़ादी को खोल-खोल कर समझा दिया था। ‘हिन्द स्वराजÓ सही अर्थों में एक क्रांतिकारी दस्तावेज था, है और शायद रहेगा भी। खुद को क्रांतिकारी कहने वाले माक्र्समना वामपंथियों ने भी भारत के उच्च-मध्यवर्ग और शासक-वर्ग की वैसी बारीक परतें नहीं उधेड़ी होंगी, जो बिना किसी बैरभाव के गांधी ने हिन्द स्वराज में उधेड़ी हैं। इसलिए भारत में वैकल्पिक समाज और राजनीति को रचने का अहिंसक रास्ता जानने-समझने के लिए ‘हिन्द स्वराजÓ आज भी कहीं अधिक प्रासंगिक और महत्वपूर्ण हो जाता है। क्योंकि यह गांधी द्वारा तब की गई कई अप्रिय भविष्यवाणियों को आज के भारत में अक्षरश: सही साबित कर रहा है। गांधी के स्वराज में उसका समाधान भी था लेकिन वह आवश्यक रूप से एक कठोर नैतिक और आध्यात्मिक मार्ग था इसलिए सत्ताधीशों, सत्ताकामियों और सत्ता से विहीन लेकिन सत्ता के नव-दावेदारों के लिए कहीं से भी आकर्षक, रुचिकर और स्वीकार्य नहीं था। गांधी का यह नैतिक रवैया जहां शासक-वर्ग के अहंकार से टकराता था, वहीं यह सत्ता के नव-दावेदारों की महत्वाकांक्षाओं से भी टकराता था। क्योंकि गांधी का स्वराज वास्तव में सत्ता की मूल प्रकृति को ही चुनौती देता था। 15 अगस्त, 1947 को बंगाल के मंत्रियों को अपने संदेश में उन्होंने कहा था- ‘आज से आपको कांटों का ताज पहनना है। अपने भीतर सत्य और अहिंसा का विकास करने का निरंतर प्रयास करें। विनम्र बनें, सहनशील बनें. …सत्ता के मद से सावधान रहें, सत्ता मनुष्य को भ्रष्ट कर देता है। सत्ता की चमक-दमक के जाल में फंसने से बचें। याद रखें कि भारत के गांवों की गरीब जनता की सेवा के लिए आप पदासीन हैं। Óदूसरी ओर वंचित लेकिन सत्ताकामी आम जनता को भी आज़ादी का वास्तविक अर्थ बताते हुए उन्होंने 22 मार्च, 1931 को गुजराती ‘नवजीवनÓ में लिखा था- ‘मेरी नजर में स्वराज की प्राप्ति के लिए राजा और प्रजा दोनों की शिक्षा-दीक्षा में बहुत अधिक बदलाव की जरूरत है। लुटेरे और लुटनेवाले दोनों अंधेरे में भटक रहे हैं। ये दोनों रास्ता भूल गए हैं। दोनों में से एक की भी स्थिति सहन करने के योग्य नहीं है। पर राजवर्ग और धनिकवर्ग के गले यह बात जल्दी नहीं उतरेगी। एक के गले उतरी तो दूसरे के अपने आप उतर सकेगी, यह सोचकर मैंने रंक या गरीब की सेवा पसंद की है। सब राजा नहीं हो सकते, लेकिन ‘सबÓ में तो सभी के समा सकने की गुंजाईश है। इसलिए यदि गरीब को अपने हक का और साथ ही अपने कर्तव्य का भान हो जाए तो, आज ही स्वराज है। उसी साल 6 मार्च को भारतीय एवं विदेशी पत्रकारों के साथ एक प्रेसवार्ता में उन्होंने कहा था- ‘जहां तक मैं समझता हूं पूर्ण स्वराज के पूरे अर्थ को व्यक्त करनेवाला शब्द या शब्द-समूह अंग्रेजी भाषा में नहीं है। इसलिए मैं सिर्फ इसका अर्थ समझा सकता हूं , स्वराज का शब्दार्थ है अपने आप पर शासन करना, … स्वराज पवित्र शब्द है, वैदिक शब्द है। इसका अर्थ है आत्मशासन या आत्मनियंत्रण, न कि सभी नियंत्रणों से मुक्ति जैसा कि बहुधा ‘इंडिपेंडेंसÓ का अर्थ किया जाता है। Ó 24 जुलाई, 1921 को गुजराती ‘नवजीवनÓ में उन्होंने लिखा था- ‘(प्रचलित अर्थों में) स्वराज का एक अर्थ देश की बहुसंख्यक जनता का शासन भी होता है। जाहिर है जहां बहुसंख्यक जनता नीतिभ्रष्ट हो या स्वार्थी हो, वहां उनकी सरकार अराजकता की स्थिति ही पैदा करेगी, और कुछ नहीं। Ó शायद हमें आज एक मसीहा की जरूरत है जो हमें इस गुलामी से निकाल कर एक आजाद सोच और नए मूल्यों का निर्माण करने का साहस दे। जिससे हम अपने शासकों के साथ जुडऩे की बजाय आम जनता के साथ जुड़ें।