ग्लैमर नहीं, ज्ञान को देखकर आइए: आलोक मेहता

भोपाल, 30 अगस्त । वरिष्ठ पत्रकार पद्मश्री आलोक मेहता ने कहा कि मीडिया में जाने वाले विद्यार्थियों को ग्लैमर देख कर के इस क्षेत्र में नहीं जाना चाहिए। बल्कि ज्ञान को ध्यान में रखकर आना चाहिए। टीवी, रेडियो और प्रिंट मीडिया एक-दूसरे के प्रतियोगी नहीं है, बल्कि पूरक हैं। मीडिया में हर समय चुनौती रही है, आगे भी रहेगी।
श्री मेहता माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित सत्रारंभ कार्यक्रम के समापन सत्र में प्रिंट मीडिया का भविष्य विषय पर विद्यार्थियों को सम्बोधित कर रहे। उन्होंने कहा प्रिंट या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का सबसे बड़ा खतरा नकल की होड़ है।
प्रिंट मीडिया का भविष्य असुरक्षित नहीं है। जब टेलीविजन आया उस समय भी इस तरह के सवाल उठे लेकिन आज भी मुद्रित माध्यमों को पढ़ा और पसंद किया जा रहा है। हमारे सामने चुनौतियां जरूर हैं। आर्थिक संकट भी है लेकिन निराशा की जरूरत नहीं है। पत्रकारिता के छात्रों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा प्रिंट के अच्छे भविष्य के लिए बेहतर विज्ञापन कॉपी लिखना सीखना चाहिए। आज कई विदेशी कम्पनियां देश में निवेश कर रही हैं, उन्हें हिंदी में विज्ञापन की जरूरत है। पत्रकारिता के विद्यार्थियों को विज्ञापन कॉपी लिखना भी आना चाहिए।
समापन सत्र की अध्यक्षता करते हुए कुलपति जगदीश उपासने कहा कि पत्रकारिता में जाने के लिए मानसिक और शारीरिक तैयारी दोनों आवश्यक है। हमको 18 घंटे काम करने की क्षमता पैदा करनी पड़ेगी। आज आवश्यकता है कि हम इंट्रेस्टेड, पेशनेट, स्किल्ड और कनेक्टेड रहें। समाज से हमें रियल टाइम और लाइव कनेक्टेड रहना पड़ेगा। मंच पर कुलाधिसचिव लाजपत आहूजा भी उपस्थित थे। कुलपति उपासने ने शॉल, श्रीफल भेंटकर श्री मेहता को सम्मानित किया। कार्यक्रम का संचालन कुलसचिव प्रो. संजय द्विवेदी ने किया।
इस अवसर पर विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित मीडिया नवचिंतन पत्रिका के नवीन अंक, मीडिया प्रबंधन विभाग द्वारा अटल प्रबंधन वाणी, सत्रारंभ पर केन्द्रित आंतरिक समाचार पत्र सत्रारंभ-2018 का विमोचन किया गया। लेखन में सृजनात्मकता तभी संभव है जब हम अपने वातावरण को विभिन्न दृष्टिकोण से देखें। संवेदनशील बनें। किताबी परिभाषाएं पढ़कर सृजन संभव नहीं है। अगर हमें जीवन के बारे में लिखना है तो जीवन में उतरना होगा, उसको आत्मसात करना होगा। इसके लिए एक सृजनात्मक लेखक में परकायाप्रवेश और भावप्रवेश की कला होनी चाहिए।
श्री चतुर्वेदी ने यह बात सत्रारंभ कार्यक्रम के द्वितीय दिवस को सृजनात्मक लेखन विषय पर चर्चा करते हुए कही। श्री चतुर्वेदी ने कहा कि गंगा की गहराई को समझने के लिए हमें गंगा में उतरना होगा।
पुल पर खड़े होकर हम गंगा की गहराई नहीं माप सकते।
लेखन के लिए हम अपनी प्राथमिकता तय करें। रचनात्मक लेखन में सौन्दर्य तभी डाला जा सकता है जब हम मनसा, वाचा, कर्मणा लेखन में डूब जाएं। सिर्फ शब्दों का मायाजाल पसारकर सार्थक लेखन संभव नहीं है. लेखन में जान तभी आती है जब उसकी संवेदना को आत्मसात किया जाए। उन्होंने कहा कि भाषा गहनें है वे शरीर नहीं है, इसलिए विचार महत्वपूर्ण है।
स्वयं लेखन को ही तय करना होता है कि उसके लेख के लिए कौन-सी भाषा उपयुक्त होगी। लेखन के लिए मुमुक्षा होना आवश्यक है। कार्यक्रम का संचालन इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के विभागाध्यक्ष प्रो. श्रीकांत सिंह ने किया।