शिवराज सरकार का रेत से रिश्ता खत्म, पंचायतें होंगी सशक्त लेकिन…

 

कांग्रेस द्वारा बार-बार अवैध रेत खनन और रेत माफियाओं से सरकार की सांठगांठ के आरोपों से मुक्त होने के लिए मंत्रिमंडल का होगा अहम् फैसला

विशेष रिपोर्ट
विजय कुमार दास
मध्यप्रदेश में विधानसभा चुनाव 2018 के लिए मात्र 3 महीनें शेष हैं और शिवराज सरकार के खिलाफ जंग छेडऩे वाली एकमात्र भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष कमलनाथ ने जितने मुद्दों पर अध्यक्ष बनने के बाद अभी तक व्यक्तिगत रूप से शिवराज सिंह चौहान पर आरोप लगाए हैं, उन आरोपों में घिसे-पिटे व्यापमं घोटाले के बाद ताजा-तरीन आरोप सरकार का रेत माफियाओं से सांठ-गांठ होने का मामला लगातार सुर्खियों में आने लगा है। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने अपने मंत्रिमंडल के सभी साथियों से परामर्श करने के बाद यह निर्णय लिया है कि सरकार का संबंध रेत के व्यवसाय से पूरी तरह समाप्त कर दिया जाए और ग्राम पंचायतों को अधिक से अधिक सशक्त बनाने की दिशा में ठोस कदम उठाए जाएं। सूत्रों के अनुसार मध्यप्रदेश खनिज साधन विभाग के प्रमुख सचिव नीरज मंडलोई ने मुख्यमंत्री की अवधारणा को ब्रह्मास्त्र मानते हुए नवंबर 2017 में पारित की गई रेत नीति के अंतर्गत जितनी भी खदानें असंचालित थीं, उसे ग्राम पंचायतों को हस्तांतरित करने के बाद उसके परिपालन में ठोस निर्देश जारी किए हैं और आने वाले मंत्रिपरिषद की भावी बैठक में बची हुई 334 खदानों का ठेका भी समाप्त करते हुए पंचायतों को स्थानांतरित करने का फैसला ले लिया है। उल्लेखनीय है कि 2017 में बनी नीति के अनुसार 530 रेत खदानें पंचायतों को हस्तांतरित की जा चुकी हैं, लेकिन अब जो नई रेत नीति प्रस्तावित की गई है, उसके अनुसार खदानों का संचालन मध्यप्रदेश में चाहे खदानें पुरानी हों या नई हों, अब सभी खदानें ग्राम पंचायतों द्वारा ही संचालित की जाएंगी। पूर्व में नीलामी के स्थान पर फिक्स रायल्टी पर खदानों का संचालन होगा और यह राशि 75 रुपए प्रति घन मी. रहेगी तथा 50 रुपए जिला खनिज प्रतिष्ठान को प्राप्त होगा। मंत्रिपरिषद के निर्णय हेतु तैयार किए गए प्रस्ताव में ग्राम पंचायतें ही खदानों को स्वयं संचालित करेंगी, ठेका नहीं देंगी। नर्मदा नदी के किनारे से मशीन द्वारा रेत का उत्खनन पूर्णतया प्रतिबंधित रहेगा। नई नीति के अनुसार निजी भूमि पर भी 75 रुपए रायल्टी तथा 150 रुपए जिला खनिज प्रतिष्ठान सहित रेत खनन का प्रावधान रहेगा, पूर्व में निजी भूमि पर रेत खनन का कोई प्रावधान नहीं था। प्रमुख सचिव नीरज मंडलोई द्वारा तैयार किए गए मसौदे के अनुसार अवैध उत्खनन एवं परिवहन पर दंड तथा वाहन राजसात करने का प्रावधान जिला कलेक्टर के विवेकाधिकार पर छोड़ दिया गया है। नई नीति के अनुसार वाहनों की अनावश्यक चेकिंग पर भी रोक लगाई गई है। अवैध उत्खनन एवं अवैध भंडारण के प्रकरणों में वाहन, मशीन सब कुछ राजसात किए जाएंगे और उसका उपयोग शासकीय एजेंसी द्वारा शासकीय कार्यों में किए जाने का प्रावधान है। रेत के भंडारण के अनुज्ञा की प्रक्रिया को भी सरल किया गया है। कोई भी व्यक्ति आवेदन मात्र देकर उसे 7 दिनों के पश्चात भंडारण की कार्रवाई वैधानिक रूप से कर सकता है। 42 पृष्ठों में तैयार की गई संक्षेपिका में यह तो पता चला है कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की अवधारणा के अनुसार रेत के व्यवसाय से सरकार का रिश्ता पूरी तरह समाप्त हो जाएगा और पंचायतों के सशक्तिकरण की दिशा में उन्हें ज्यादा से ज्यादा आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने में यह निर्णय पंचायतों के लिए लाभकारी तो होगा और सरकार कांग्रेस के आरोपों से मुक्त हो जाएगी। लेकिन रेत माफिया या दबंगई करके इस क्षेत्र में कब्जा करने वाले लोगों की मुट्ठी में पंच-सरपंच या सचिव नहीं रहेंगे, ऐसा असंभव है, क्योंकि पंचायतों को रेत के व्यवसाय से जोडऩे से पहले यदि सरकार बकायदा प्रशिक्षण शिविर लगाती और रेत के व्यवसाय के मैकेनिज्म को समझाती, फिर यह निर्णय लेती तो बात और ज्यादा बेहतर होती। परंतु नई रेत नीति राजनीतिक आरोपों से बचने के लिए यदि ठीक है तो रेत माफियाओं के चंगुल से पंचायतों को मुक्त करने का भी इलाज सरकार को निकालना होगा, वरना 20 हजार की रेत आज 55 हजार में भोपाल, इंदौर में बेची जा रही है, इसका मतलब क्या है? दूसरी बात यह है कि पंचायतों को यदि आर्थिक रूप से सशक्त बनाना ही है तो यह गंभीर चिंता का विषय है कि मध्यप्रदेश की सभी रेत खदानों से अभी तक मात्र 6 करोड़ 11 लाख रुपए की आय पंचायतों को हुई है, यह आंकड़ा चौंकाने वाला इसलिए है क्योंकि यदि पंचायतों को सशक्त करने का ही उद्देश्य है तो पंचायतों की आय पूरे प्रदेश में 100 करोड़ से ऊपर होनी चाहिए। इसलिए नई रेत नीति का स्वागत तो किया जाएगा, लेकिन शंकाओं और खामियों को दूर करने के लिए भी कड़े कदम उठाने होंगे।