सेहतमंद बनाती आयुष्मान योजना से दूर क्यों 5 राज्य

आरके सिन्हा
आयुष्मान मित्रों को 15 हजार रुपये पगार दी जाएगी। वहीं मेडिकल और परा मेडिकल प्रशिक्षित प्रोफेशनल को 50 हजार से 90 हजार रुपए तक की मासिक पगार दी जाएगी। उम्मीदवारों की नियुक्ति सरकारी अस्पताल, निजी अस्पताल, कॉल सेंटर, रिसर्च सेंटर और बीमा कंपनियों के द्वारा की जाएगी। यानी आयुष्यान योजना दो स्तरों पर गेम चेंजर साबित होने जा रही है। पहला, इससे करोड़ों की तादाद में परिवारों को हेल्थ बीमा मिलेगा। दूसरा, रोजगार के असीम अवसर मिलेंगे। अब बीमारों को चंगा करने के लिए तो उपर्युक्त योजना आई है, पर मानसिक रूप से बीमारों का इलाज करना थोड़ा कठिन है। अब कुछ कथित ज्ञानी कह रहे हैं कि सरकार ने अभी तक आयुष्मान योजना के लिए सिर्फ 2000 करोड़ का ही प्रावधान किया है।
सरकार ने समाज के अंतिम व्यक्ति को महंगे मेडिकल बिल से राहत दिलाने के इरादे से आयुष्मान भारत योजना का श्रीगणेश किया है। मोदी जी की नीयत साफ है सबका साथ-सबका विकास सरकार की मंशा है कि गरीब और निम्न मध्यम वर्ग के परिवारों को उस स्थिति में तत्काल मदद मिल जाए जब उनके परिवार का कोई सदस्य बीमार पड जाये। सब जानते हैं कि मोटे मेडिकल बिलों के कारण जनता त्राहि-त्राहि कर रही है। सरकार की इस महत्वाकांक्षी योजना के तहत करीब 10 करोड़ परिवारों का 5 लाख रुपये सालाना का स्वास्थ्य बीमा कराया जाएगा। निश्चित रूप से इस योजना को सही तरह से लागू करने से करोड़ों शहरी और ग्रामीण गरीबों को लाभ होगा। लेकिन न जाने क्यूं इस महान कल्याणकारी योजना को पांच राज्य क्रमश: दिल्ली, केरल, ओडिशा, पंजाब और तेलंगाना अपने यहां लागू करने के लिए तैयार नहीं है। कारण शुद्ध राजनीतिक हैं वे इस योजना की निंदा कर रहे हैं, इसमें हास्यास्पद मीन-मेख निकाल रहे हैं। अब आप स्वयं ही सोच लीजिए कि देश की राजनीति में किस हद तक नकारात्मक सोच आ गई है। अगर आप विपक्ष में हैं,तो आप सरकार की हर योजना में कमी ही निकालेंगे। यह कहाँ से उचित ठहराया जा सकता है, लोकतंत्र तो सर्वानुमति से चलता है, ना कि छींटाकशी करने से।बहरहाल, आयुष्मान भारत योजना के तहत प्रत्येक परिवार को सालाना पांच लाख रुपये की बीमा कवरेज दी जाएगी और वे सरकारी या निजी अस्पताल में कैशलेस इलाज करा सकेंगे। अनुमान के मुताबकि इस योजना के तहत अब देश के करीब 10 हजार अस्पतालों में ढाई लाख से ज्यादा बेड गरीबों के लिए रिजर्व हो जाएंगे। यह उन ढाई लाख गरीबों के लिए सुखद और अद्भुत आनंदायक अनुभूति होगी, आयुष्मान भारत योजना में शामिल करीब दस हजार अस्पतालों में 13 सौ से ज्यादा बीमारियों और इससे संबंधित पैकेज को इलाज में शामिल किया गया है। जिसमें कैंसर की सर्जरी, हार्ट की बाइपास सर्जरी, आंख-दांत का ऑपरेशन, सीटी स्कैन, एमआरआई जैसी तमाम चीजें महंगे इलाज शामिल हैं जिसके बारे में गरीब तो गरीब, अच्छे भले लोग भी नाम सुनते ही ठिठक जाते थे। आयुष्मान योजना का एक और पक्ष भी है। यह योजना देश में रोजगारों की बौछार भी करने जा रही है। इसके तहत करीब 1 लाख से ज्यादा रोजगार के अवसर पैदा होंगे। इस योजना के तहत आयुष्मान मित्रों की भर्ती की जाएगी। दरअसल सभी सूचीबद्ध अस्पताल में रोगियों की सहायता के लिए आयुष्मान मित्र होंगे जो लाभार्थियों और अस्पताल के बीच समन्वय करेंगे। वे सहायता डेस्क संचालित करेंगे और योजना में पंजीकृत करने एवं पात्रता की पुष्टि के लिए दस्तावेजों की जांच करेंगे। आयुष्मान मित्रों को 15 हजार रुपये पगार दी जाएगी। वहीं मेडिकल और परा मेडिकल प्रशिक्षित प्रोफेशनल को 50 हजार से 90 हजार रुपए तक की मासिक पगार दी जाएगी। उम्मीदवारों की नियुक्ति सरकारी अस्पताल, निजी अस्पताल, कॉल सेंटर, रिसर्च सेंटर और बीमा कंपनियों के द्वारा की जाएगी। यानी आयुष्यान योजना दो स्तरों पर गेम चेंजर साबित होने जा रही है। पहला, इससे करोड़ों की तादाद में परिवारों को हेल्थ बीमा मिलेगा। दूसरा, रोजगार के असीम अवसर मिलेंगे। अब बीमारों को चंगा करने के लिए तो उपर्युक्त योजना आई है, पर मानसिक रूप से बीमारों का इलाज करना थोड़ा कठिन है। अब कुछ कथित ज्ञानी कह रहे हैं कि सरकार ने अभी तक आयुष्मान योजना के लिए सिर्फ 2000 करोड़ का ही प्रावधान किया है। अब इन ज्ञानियों को पता होना चाहिए कि सरकार ने इतनी राशि कुछ तो सोच-समझकर ही रखी होगी। सरकार आगे चलकर आवश्यकता अनुसार इस राशि में इजाफा करती ही रहेगी। पर कुछ लोगों को आलोचना करने में सुख मिलता आता है। आलोचना करके इनकी भूख-प्यास मिट जाती है। खैर, यह योजना ट्रस्ट मॉडल या इंश्योरेंस मॉडल पर काम करेगी और पूरी तरह कैशलेस होगी। इसमें 20 राज्यों ने ट्रस्ट मॉडल, चार ने संयुक्त मॉडल (यानी 50 हजार तक के दावे का भुगतान की जिम्मेदारी को सौंपा जाना) और शेष ने बीमा कंपनियों का मॉडल अपनाया है। जिन राज्यों में ट्रस्ट मॉडल है, वहां तो हरेक अस्पताल के भुगतान के लिए स्वास्थ्य विभाग क्षेत्रीय अधिकारियों की जिम्मेदारी तय की गई है। संयुक्त मॉडल में छोटे भुगतान यानी 50 हजार तक की जिम्मेदारी बीमा कंपनियों पर है और बड़े में ट्रस्ट मॉडल है। इसी तरह से फंड के लिए कुछ राज्यों ने एक गैर-लाभकारी ट्रस्ट बनाया है जहां उन्होंने अपने बजट से हेल्थ केयर फंड निकाला है। केंद्र सरकार इसमें लगभग 60 प्रतिशत योगदान करेगी। जब अस्पतालों में लाभार्थियों का इलाज होगा, तो इलाज की लागत सीधे अस्पताल के खाते में ट्रांसफऱ कर दी जायेगी। तो मोटा-मोटी इसी तरह से काम करती रहेगी आयुष्मान योजना। पर आयुष्मान भारत योजना पर बिना-सोचे समझे भड़ास निकालने वाले ये भी कह रहे हैं कि बेहतर होता कि सरकार हर जिले में एम्स जैसे अस्पताल बना देती। यह सुझाव वैसे कतई बुरा नहीं है। देश में नए अस्पताल तो बनते रहने ही चाहिए। पर इन ज्ञान देने वालों को कौन समझाए कि मौजूदा सरकार के कार्यकाल के दौरान झारखंड और गुजरात में एक-एक नए एम्स स्थापित करने को मंजूरी मिली है । इसके अलावा मोदी सरकार में एम्स जैसे 20 नए अस्पताल स्थापित किए गए हैं । पर ये तो बोलेंगे ही क्योंकि इन्हें बोलना है। देश के हेल्थ सेक्टर में लगातार सुधार करते रहने की जरूरत है। अब भी हमारे हेल्थ सेक्टर में बहुत कुछ करने की जरूरत है क्योंकि आजादी के बाद इस क्षेत्र में काम ही बहुत कम हुआ है। इसलिए अगर कुछ इस दिशा में हो रहा है, तो उसका सर्वत्र स्वागत होना चाहिए। यह तथ्य किसी से छिपा हुआ नहीं है किकुछ अस्पताल रोगी को मात्र पैसे देनेवाला ग्राहक मानने लगे हैं। इसके कारण ही डाक्टरों और रोगियों के आपसी संबंध कटु हो रहे हैं। अब डाक्टरों का पहले वाला सम्मान भी नहीं रहा समाज में। इसकी एक वजह यह भी है कि रोगी को फजूल किस्म की टेस्टों के नाम पर खुल्लम-खुल्ला लूटा जा रहा है। उसे रोगी न समझकर ग्राहक माना जाने लगा है। आयुष्मान भारत जैसी योजनाओं का शुरू करने के पीछे मोटे तौर पर लक्ष्य यही है कि देश में हेल्थ सेक्टर में अभूतपूर्व सुधार किया जाए। निजी अस्पतालों में रोगी की आंखों में धूल झोंककर पैसा कमाया जा रहा है। मरीजों से अकारण टेस्ट करवाए जाते हैं। रोगी टेस्ट करवा-करवाकर ही और बीमार हो जाता है। उस दीन-हीन रोगी को मालूम ही नहीं होता कि जिन मेडिकल टेस्ट को करवाने के लिए उसे कहा जा रहा है,उसकी कितनी उपयोगिता है। चूंकि डाक्टर साहब का आदेश है, तो उसका पालन करना उस बेचारे रोगी का धर्म है। इस तरह के धूर्त डाक्टरों और अस्पतालों पर भी एक्शन होना चाहिए। पर यह क्या बात है कि किसी नई योजना को सिरे से खारिज कर दिया जाए?
देश के हर नागरिक को सेहतमंद रखने के लिए केन्द्र और राज्यों को मिलकर काम करना होगा। पर हैरानी होती है कि तेलंगाना, ओडिशा, दिल्ली, केरल और पंजाब ने आयुष्मान भारत योजना को लागू करने से इनकार कर दिया है। इनका दावा है कि उनके पास अपनी जनता के लिए इससे बेहतर स्वास्थ्य योजना है। यह कोई तर्क ही नहीं है आयुष्मान योजना से अपने को अलग रखने के। इसका नुकसान ये होगा कि इन सभी पांच राज्यों के करोड़ों लोग इस बेहतरीन कल्याणकारी योजना का लाभ पाने से वंचित हो जाएंगे। पर देर-सवेर ये पांच राज्य भी आयुष्मान भारत योजना का हिस्सा बनेंगे ही। ये अपनी जनता के हितों की लंबे समय तक अनदेखी तो नहीं कर सकते।
(लेखक राज्य सभा सदस्य हैं)