राजनांदगांव में करुणा शुक्ला को पैराशूट से ही उतारा, डॉ. रमन गदगद…

विशेष रिपोर्ट
विजय कुमार दास

छत्तीसगढ़ के सबसे हाईप्रोफाइल विधानसभा क्षेत्र राजनांदगांव में अब चुनावी बिसातें बिछ गयी हैं। कांग्रेसी खेमे में आज उस समय खामोशी छा गयी, जब कांग्रेस ने मुख्यमंत्री और भाजपा के सबसे ताकतवर नेता डॉ. रमन सिंह के खिलाफ बिलासपुर की करुणा शुक्ला को मैदान में उतार दिया। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने सौ बार कहा, हर आम सभा में कहा कि हमारा प्रत्याशी पैराशूट से नहीं उतरेगा, लेकिन राजनांदगांव में उन्होंने पैराशूट से ही प्रत्याशी उतारा, इससे क्षेत्र के कांग्रेसियों में बेहद गुस्सा है, क्योंकि सभी को यह उम्मीद थी कि राहुल गांधी अपने वादों के अनुसार बाहरी प्रत्याशी नहीं थोपेंगे। कांग्रेसियों के गुस्से से यह साफ पता चलता है कि कांग्रेस मैदान में उतरने से पहले ही धराशायी हो गयी है। राजनांदगांव के मतदाता कांग्रेस से मुख्यमंत्री के खिलाफ किसी युवा एवं स्थानीय उम्मीदवार चाह रहे थे, जिसमें सबसे पहला नाम था युवा नेता सुरेन्द्र दास वैष्णव का। वे युवा होने के साथ-साथ जिला पंचायत के उपाध्यक्ष और क्षेत्र में कांग्रेसियों के चहेते हैं। कांग्रेस के पैराशूट उम्मीदवार से भाजपा प्रत्याशी डॉ. रमन सिंह की जीत तो तय था ही अब और बड़े अंतरों से जीतना पक्का हो गया है। पिछली बार डॉ. रमन सिंह ने कांग्रेस प्रत्याशी को करीब 36 हजार मतों से हराया था, इस बार यह अंतर 50 हजार से भी अधिक मतों का हो सकता है। राजनांदगांव क्षेत्र में राष्ट्रीय हिन्दी मेल की टीम ने करुणा शुक्ला की उम्मीदवारी के बाद मतदाताओं की राय जाननी चाही तो साफ पता चला कि कांग्रेसियों में बेहद नाराजगी है और वे एक स्वर से कहने लगे हैं कि अब तो डॉ. साहब की एकतरफा जीत होगी, इसका कारण सब यही बता रहे हैं कि कांग्रेस के पास स्थानीय प्रत्याशी का न होना है। अब हम डॉ. रमन सिंह को ही स्थानीय उम्मीदवार मानेंगे। सभी वर्गों का कहना है कि करुणा तो बाहर से आईं हैं यहां तो हमारे लिए सिर्फ डॉ. रमन सिंह है और जितना समर्थन हो सकेगा, हम उन्हें देंगे। राजनांदगांव में पैराशूट उम्मीदवार करुणा शुक्ला की उम्मीदवारी कोई भी बड़े नेता नहीं चाहते थे, सिर्फ प्रदेश अध्यक्ष भूपेश बघेल की जिद के कारण उनकी उम्मीदवारी की घोषणा करनी पड़ी। जबकि चुनाव अभियान समिति के अध्यक्ष डॉ. चरणदास महंत और नेता प्रतिपक्ष टी.एस. सिंहदेव स्थानीय युवा प्रत्याशी के पक्ष में थे, लेकिन उनकी बातों को अनसुना कर दी गई। टी.एस. सिंहदेव ने सुरेन्द्र दास वैष्णव की उम्मीदवारी को बेहतर बताया था। उनका कहना था कि सुरेन्द्र दास की उम्मीदवारी से एक अच्छा मुकाबला देखने को मिलेगा। लगभग ऐसी ही राय डॉ. चरणदास महंत का भी था। लेकिन करुणा शुक्ला की उम्मीदवारी से कांग्रेस के युवा कार्यकर्ताओं का उत्साह ठंडा हो गया। इस बात में कोई आश्चर्य नहीं होगा, मंगलवार को जब डॉ. रमन सिंह जुलूस निकालकर नामांकन भरने जाएंगे, तब कांग्रेस के बड़े-बड़े नेता उनके साथ नजर आएंगे। करुणा शुक्ला कोई दमदार प्रत्याशी नहीं है। भाजपा ने उन्हें सांसद बनाया था, जब वे भाजपा छोड़कर कांग्रेस में आईं तो बिलासपुर में कांग्रेस टिकट पर चुनाव हार गईं। इसके पहले वे जांजगीर से भी चुनाव हार चुकीं है। ऐसे नेता डॉ. रमन सिंह के सामने कैसे टिक पाएंगे। अब सवाल यहां यह उठता है कि फिर राहुल गांधी के राजधानी रायपुर में हजारों कार्यकर्ताओं के सामने दिए उस बयान का क्या मतलब रह गया। जिसमें उन्होंने कहा था कि किसी भी पैराशूट नेता को प्रत्याशी नहीं बनाया जाएगा। टिकट वितरण में पुराने नेताओं और स्थानीय को ही तवज्जो दी जाएगी। लेकिन उनका दावा टांय-टांय फिस्स हो गया, बिलासपुर से राजनांदगांव में प्रत्याशी पैराशूट से उतार दी गयी, ऐसे में एक बार फिर राहुल गांधी का दावा सिर्फ दावा ही बनकर रह गया, जैसे उन्होंने मई महीने के अपने छत्तीसगढ़ प्रवास में दावा किया था कि प्रदेश के सभी सीटों में 15 अगस्त तक प्रत्याशी तय कर दिए जाएंगे, लेकिन नहीं कर सकी और अब कांग्रेस काफी देर बाद अपने प्रत्याशी तय कर सकी है।