स्वच्छ भारत बनाम मल-मूत्र ढोता भारत

राज वाल्मीकि
अक्टूबर 2 को गांधी जयंती यानी मोहनदास करमचंद गांधी का जन्मदिन मनाया जाता है। इसी दिन केन्द्र सरकार ने स्वच्छ भारत अभियान की शुरूआत की। स्वच्छ भारत मिशन बनाया। वर्ष 2017-18 में इसके लिए 17,843 करोड़ बजट का आवंटन किया गया और 188 लाख घरेलू शौचालय बनाने का लक्ष्य निर्धारित किया। स्वच्छ भारत सुनने में बहुत अच्छा लगता है और भला स्वच्छता किसे पसंद नहीं होती। पर दुखद यह है कि इस स्वच्छ भारत में एक ऐसा ‘अदृश्य भारतÓ भी है जो मैनुअली मानव मलमूत्र ढोता है। जिसे कोई देखना नहीं चाहता। जो इस अमानवीय मैला ढोने की प्रथा के बारे में सचमुच नहीं जानते और यदि जानना चाहते हैं उन्हें सफाई कर्मचारी आंदोलन की वेबसाइट और वरिष्ठ पत्रकार भाषा सिंह की पुस्तक ‘अदृश्य भारतÓ हिन्दी में या ‘अंसीनÓ नाम से अंग्रेजी संस्करण पढऩा चाहिए। मैला ढोने की अमानवीय और घृणित प्रथा के उन्मूलन के प्रति सरकार की उदासीनता का आलम यह है कि सरकार मैनुअल स्केवेंजरों की मुक्ति और पुनर्वास के लिए लगातार बजट आवंटन कम करती जा रही है। मैनुअल स्केवेंजरों के पुनर्वास लिए वर्ष 2013-14 में सरकार ने 570 करोड़ रुपये का बजट आवंटित किया था। उसे साल 2017-18 में घटाकर सिर्फ 5 करोड़ कर दिया। क्या बिडंबना है। इससे सरकार की मंशा जाहिर हो जाती है। सरकार के ही आंकड़े माने तो अभी भी एक लाख साठ हजार मैला ढोने वाले शुष्क शौचालयों की सफाई में लगे हैं। इनमें 95 प्रतिशत से अधिक महिलाएं हैं। जब इतनी सारी महिलांए मल ढोएं तो देश को उन्नत और स्वच्छ कैसे कहा जा सकता है। इसके अलावा रेलवे पटरी से मल सफाई करने वाले, खुले नाले में बहते मानव मल की सफाई करने वाले, सेप्टिक टैंक साफ करने वाले, गटर या सीवर साफ करने वालों के आंकड़े तो सरकार के पास भी नहीं हैं। सरकार की नीयत का पता तो इसी से चल जाता है कि मैला प्रथा उन्मूलन और मैला ढोने वालों के लिए बने कानून 1993 और 2013 के बावजूद अभी तक मैला प्रथा अस्तित्व में है। गौरतलब है कि स्वच्छ भारत अभियान के तहत पूरे देश में लाखों शौचालयों का निर्माण किया जा रहा है। इसके लिए लाखों की संख्या में सेप्टिक टैंक और ड्रेन बनाए जा रहे हैं। हमारा यह दृढ़ विश्वास है कि ये हमारी समस्या को और बढ़ा रहे हैं। जितने अधिक शौचालय होंगे उतने अधिक मैनुअल स्केवेंजर होंगे और उतनी ही अधिक मौतें होंगीं। हमारी रक्षा की बजाय सरकार हमें और अधिक असुरक्षित बना रही है और बार-बार इस प्रकार की हत्याओं के लिए उकसा रही है। बड़े गर्व से बताया जाएगा कि स्वच्छ भारत अभियान के तहत इतने लाख शौचालयों का निर्माण किया गया। पर इस पर चर्चा नहीं की जाती कि इन शौचालयों के भरने पर इनके गड्ढों की सफाई किससे करवाई जाएगी। सफाई के दौरान इनमें कितने लोगों की जान जाएगी। खैर ये तो बाद की बात है। अभी की कड़वी सच्चाई पर प्रधानमंत्री जी ने चुप्पी साध रखी है। पिछले 7 दिनों में जब 11 लोग सीवर सफाई में मारे गए प्रधानमंत्री जी मौन रहे। पिछले कुछ ही महीनों में 83 लोग जहरीली गैस से सीवर में घुटन से मरे, प्रधानमंत्री जी चुप रहे। पिछले साल यानी 2017 में 221 लोग मौत के सीवर में समा गये, प्रधानमंत्री जी मौन रहे। 1993 से अब तक 1790 लोगों को सीवर की जहरीली गैस ने लील लिया, प्रधानमंत्री जी मौन धारण किए रहे। जैसे कुछ हुआ ही न हो। या हो सकता है कि इस आध्यात्मिक कार्य में लगे, लोगों की वे क्यों चिंता करें। आखिर उनका मानना है कि मानव मल साफ करना आध्यात्मिक अनुभव है। ये बात अलग है कि उन्होंने कभी इस आध्यात्मिक कार्य का स्वयं अनुभव नहीं किया। आज 21वीं सदी के भारत में यानी डिजिटल इंडिया में लोगों की सीवर में जान जाना क्या भारत सरकार और हम सब के लिए शर्म की बात नहीं होनी चाहिए? क्यों नहीं सीवर टैंकों की सफाई में तकनीक का इस्तेमाल किया जाता? इस तकनीक के युग में जब बड़े-बड़े कार्य तकनीक के माध्यम से किए जा रहे हैं तो सीवर सफाई के लिए भी रोबो मशीने बनाई जा सकती हैं या विदेशों से खरीदी जा सकती हैं। पर सबसे पहले सरकारों में, राजनीतिक दलों में इससे निपटने के लिए प्रबल इच्छा शक्ति होनी चाहिए। जिस प्रकार सरकार ने स्वच्छ भारत अभियान चलाया। इसी प्रकार सीवर में हो रही मौतों से बचाव के लिए भी देशभर में बड़े पैमाने पर जागरूकता फैलाने और मशीनो से सफाई को अनिवार्य बनाने का अभियान चलाए तो निश्चित रूप से इसमें सफलता मिलेगी। किसी की जान जहरीली गैसों से दम घुटने से नहीं जाएगी। पर विडंबना देखिए कि भारत सरकार के पास मंगल ग्रह पर मंगलयान भेजने की तकनीक है पर सीवर सफाई की नहीं। सवाल है कि देश में मैला प्रथा उन्मूलन के लिए जब साल 1993 और 2013 के दो-दो कानून हैं तो फिर उनका पालन क्यों नहीं हो रहा है। इतना ही नहीं, सुप्रीम कोर्ट ने भी 27 मार्च 2014 को इस बारे में अपना आदेश पारित किया है। इन सब प्रावधानों के तहत न तो किसी व्यक्ति को सीवर में उतरने की जरूरत है और न ही मैला ढोने जैसे अमानवीय कार्य करने की। ये कानून और आदेश न केवल मैनुअल स्केवेंजरों की मुक्ति की बात करते हैं बल्कि उनके लिए गैर-सफाई कार्यों में उनके पुनर्वास की भी व्यवस्था करते हैं। सवाल फिर वही कि इन लोगों का पुनर्वास क्यों नहीं हो पा रहा है? क्या इसके लिए प्रशासन का ढुलमुल रवैया जिम्मेदार नहीं है? ध्यान देने की बात यह भी है कि सफाई कार्य करने वाले शत-प्रतिशत दलित लोग ही क्यों होते हैं। इसके पीछे सरकार की जातिवादी मानसिकता है। जावितादी मानसिकता के लोग यह सोचते हैं कि सफाई का कार्य तो दलितों का जन्मजात पेशा है। सदियों से ये लोग करते आ रहे हैं। हमारे देश में पितृसत्तात्मक व्यवस्था होने के कारण शुष्क शौचालयों की सफाई में ज्यातादर महिलाएं जुड़ी हैं। यह लैंगिक असमानता पितृसत्ता की देन है जबकि देश का संविधान स्त्री-पुरुष में कोई भेदभाव नहीं करता। सबको समान अवसर और अधिकार प्रदान करता है। पर संविधान को लागू करने वालों की मानसिकता का क्या किया जाए। यहां हमारा सभ्य समाज भी कठघरे में आ जाता है। क्या मैला ढोने जैसी अमानवीय व्यवस्था और सीवर में मौतों के लिए हम सब जिम्मेदार नहीं हैं? हम कहां इन अपने कर्तव्य का निर्वाह करते हैं। क्या सीवर में हो रही इन मौतों के खिलाफ हम सबको आवाज उठाने की जरूरत नहीं है? सीवर में जान गंवाने वाले अधिकतर युवा ही होते हैं और जब उनकी विधवा या उनके बच्चे बिलखते हैं और बताते हैं कि अकाल मृत्यु के शिकार हुए उनके पति और पापा इज्जत की जिंदगी जीना चाहते थे। वह क्षण न केवल भारत सरकार के लिए बल्कि सभ्य समाज के लिए शर्मिंदगी भरा होता है। तब हमें अपने देश पर गर्व नहीं बल्कि शर्म आती है। यह अकारण नहीं है कि सफाई कर्मचारी आंदोलन के लोग नारे लगाते हैं – ”भारत सरकार शर्म करो। सीवर में हत्याएं बंद करो। जब हम किसी बेरोजगार या गरीब व्यक्ति को चंद रुपयों का लालच देकर जहरीली गैसों से भरे सीवर में सफाई के लिए अंदर जाने को विवश करते हैं और वे अंदर जाकर मर जाते हैं तो इसे स्वाभाविक मौत नहीं बल्कि हत्या ही कहा जाएगा। सरकार के ही एक आंकड़े के अनुसार अभी भी देश में एक लाख साठ हजार महिलाएं शुष्क शौचालय साफ करने में लगी हैं। इनकी सर्वाधिक संख्या उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, उत्तराखंड और जम्मू-कश्मीर में है। सीवर और सेप्टिक टैंक साफ करने वाले देश भर में कितने लोग हैं, इसका आंकड़ा सरकार के पास भी नहीं है। सरकार की मंशा इस बात से भी जाहिर हो जाती है कि एक ओर तो वह मैला प्रथा को प्रतिबंधित करती है। दण्डनीय अपराध घोषित करती है। दूसरी ओर रेलवे में खुद प्लेटफार्म और पटरियों पर मल साफ करने के लिए सफाई कर्मचारी नियुक्त करती है। मैला प्रथा जैसे कलंक को दूर करने के लिए कमी संसाधनों की नहीं बल्कि सरकारी मानसिकता की है। सरकार की उदासीनता की है। सरकार सीवर-सेप्टिक की सफाई छोटी मशीनों से करवा सकती है। इन छोटी रोबो मशीनों को जर्मनी, जापान जैसे देशों से भी खरीदा जा सकता है या स्वदेश में ही हिंदुस्तान ऐरोनाटिक्स लिमिटेड या अजंता टेकनोलोजी से निर्मित कराया जा सकता है। जो ‘मेक इन इंडियाÓ का भी अच्छा उदाहरण होगा। सफाई कर्मचारियों को ये मशीनें सरकार द्वारा उपलब्ध करा देने और इनके उपयोग करने का प्रशिक्षण देने से मैनुअल स्केवेंजरों की न केवल बेरोजगारी दूर हो जाएगी बल्कि वे बिना जान गंवाएं इज्जत से अपनी आजीविका चला सकेंगे। जिसे कोई देखना नहीं चाहता। इसलिए वह अनदेखा रह जाता है। सड़ांध मारते मानव मल से बजबजाते भारत को अनदेखा करने से बात नहीं बनेगी। इस दूषित भारत की गंदगी दूर करने पर ही हमारा भारत सही अर्थों में स्वच्छ भारत कहलाएगा। पर सवाल यही है कि क्या प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी, नोटबंदी की तरह इस दूषित भारत को स्वच्छ करने यानी मैलाप्रथा उन्मूलन एवं मैनुअल स्केवेंजरों की मुक्ति और इज्जतदार पेशों में पुनर्वास करने की घोषणा करेंगे?