जनता समझ नहीं पाई ‘आइडिया और ‘गुस्से का मतलब

 

शिवराज आइडिया में आगे, सिंधिया गुस्से में, पिछड़ गए मुद्दे

विशेष सम्पादकीय
विजय कुमार दास

चुनाव का अवसर है, जनता को अपना प्रतिनिधि चुनना है गुण और दोष के आधार पर, लिहाजा पार्टी और प्रत्याशी दोष को दरकिनार करते हुए अपने गुण का प्रदर्शन कर रहे हैं। ताकि आम जनता को चयन की सहूलियत हो जाए। पिछले दो दिनों से विभिन्न प्रचार माध्यमों के द्वारा दोनों ही दल अपना-अपना चुनावी कैम्पेन शुरू कर चुके हैं, जहां एक ओर भारतीय जनता पार्टी के स्टार शिवराज सिंह चौहान आम जनता से सुझाव मांग रहे हैं और आइडिया में हो दम के आधार पर पूरा प्रचार शुरू कर चुके हैं। वहीं कांग्रेस के स्टार ज्योतिरादित्य सिंधिया के कैम्पेन में गुस्से का इजहार करते लोग दिखाई दे रहे हैं। दरअसल मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान लगभग तेरह वर्षों से अधिक समय से प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं और अब वे जनता से सुझाव मांग रहे हैं और उस आधार पर कमी को दूर करने का प्रयास किया जाएगा। लेकिन बतौर एक राजनेता अब शिवराज को सुझावों की नहीं अपितु दृढ़ इच्छाशक्ति की जरूरत है। मध्यप्रदेश को बीमारू राज्य से विकसित बनाने में मुख्यमंत्री के अहर्निश योगदान को नकारा नहीं जा सकता, लेकिन अभी भी एक बड़ा वर्ग जो शिक्षित है, लेकिन बेरोजगारी से हर दिन लड़ रहा है वो अब आइडिया देने की जगह परिणाम देखना चाहता है। यह भी सही है कि इन युवाओं को लालटेन की रोशनी में पढ़ाई नहीं करनी पड़ी है, यह भी सच है कि सड़कों के गड्ढों से होने वाली तकलीफों से इन्हें नहीं गुजरना पड़ा है, यह भी सही है उच्च या तकनीकी शिक्षा के लिए पैसों की कमी पढ़ाई में आड़े नहीं आई, यह भी सही है कि प्रदेश में मेडिकल की भरपूर सीटें बढ़ी हैं, यह भी उतना ही सही है कि इन युवाओं को सपने गढऩे के लिए खुला आकाश भी मिला है लेकिन इन सबके बावजूद यह भी सही है कि अभी भी मध्यप्रदेश में एक करोड़ 28 लाख शिक्षित बेरोजगार सुनहरे भविष्य का सपना लिए भटक रहे हैं। इन्हें सुझाव की नहीं रोजगार की जरूरत है, जो पिछले 14 वर्षों से अभी तक मध्यप्रदेश में अपनी जमीन तलाश रही है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा था कि भारत में प्रतिवर्ष 2 करोड़ रोजगार के अवसर उपलब्ध कराये जायेंगे, यदि ऐसा होता तो प्रदेश के भी 20-25 लाख नौजवानों को अवसर मिल जाता लेकिन अफसोस वह स्थिति अभी नहीं बनी है। पं. दीनदयाल उपाध्याय और अटलजी के दिखाए रास्ते पर चलने का पुरजोर वकालत करने वाली भाजपा से इस चुनाव में 1 करोड़ 28 लाख युवा और उनके परिजन इस आशा और जिज्ञासा के साथ टकटकी लगाकर देख रहे हैं कि युवाओं को रोजगार या बेरोजगारी भत्ता दिए जाने की बात कब होगी? हालांकि सरकार ने किसानों के लिए खजाना खोल दिया इतना दिया कि किसान समृद्धि की ओर है, प्रदेश के अनाज भण्डार भरे पड़े हैं लेकिन उसके वावजूद बेरोजगारी अभी भी मुंह बाये खड़ी है, इसको दूर करने के लिए किसी सुझाव की नहीं दृढ़ इच्छाशक्ति की जरूरत है और यदि आप आइडिया मांग ही रहे हैं तो इस सम्पादकीय के रूप में इन 1.28 करोड़ युवाओं की तरफ से मेरा यही आइडिया है कि कम से कम इन्हें रोजगार के अवसर तो मिल ही जाएं और नहीं तो बेरोजगारी भत्ता की मांग पर विचार किया जाए। आदर्श आचार संहिता प्रभावी है और मुझे पता है की आपकी मर्यादा इस समय लक्षमण रेखा पार करने से रोकेगी लिहाजा आपके दृष्टिपत्र में तो बेरोजगारी भत्ते के मुद्दे को शामिल किया ही जा सकता है। वहीं यदि बात कांग्रेस और ज्योतिरादित्य सिंधिया की करें तो इस राष्ट्रीय पार्टी का कैम्पेन ही गुस्से से शुरू होता है। इसमें किसान ,नौजवान ,गृहणी और कामगार का गुस्सा दिखाया गया है लेकिन इस गुस्से को शांत करने के तरीके के बारे में पार्टी मौन है। कांग्रेस ने अभी केवल नारा दिया है किसान का कर्जा माफ, बिजली बिल हाफ लेकिन क्या ये संभव है क्योंकि पूरा कर्ज दस दिन में माफ करेंगे ऐसी कोई ब्लूप्रिंट अभी सामने नहीं है। यदि यह कर भी लेते हैं तो जिन्होंने अभी तक ईमानदारी से अपना कर्ज चुकाया है वो ठगे से और अपमानित महसूस करेंगे, लिहाजा कोपभाजन का शिकार कांग्रेस को बनना होगा। युवाओं और बेरोजगारों को लेकर भी अभी पार्टी कोई पत्ते नहीं खोल रही है। किसी भी पार्टी के नीति निर्धारक नेता ने बेरोजगारों के रोजगार पर अपना मत व्यक्त नहीं किया है। यह कहने और प्रचारित करने से कि समाज के सभी वर्ग गुस्से में हैं काम चलनेवाला नहीं है। बल्कि विकल्प सुझाने होंगे जिसका अभी पूर्ण अभाव दिख रहा है। सुझाव और गुस्से के बीच आमजनता को ठोस विकल्प प्रस्तुत करना दोनों ही दलों के लिए उपयुक्त होगा ,क्योंकि जनता शिवराज के साथ चलना चाहती है लेकिन भविष्य के बेहतर समन्वय के साथ वहीँ कांग्रेस के गुस्से को भी अपनाना चाहती है मगर ठोस विकल्प के साथ। यानि यह कहें कि जनता शिवराज के आइडिया के साथ आगे नहीं है तो कांग्रेस के गुस्से के साथ पीछे भी नहीं है, लिहाजा सुझाव और गुस्से के प्रचार के तरीके पर दोनों दलों को फिर से मंथन की जरूरत है तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।