सभी जिला निर्वाचन अधिकारियों से किसान हुए भयंकर नाराज

कृषि विभाग के 15 हजार अधिकारी-कर्मचारी चुनाव ड्यूटी पर होने से
विशेष रिपोर्ट
विजय कुमार दास

मध्यप्रदेश में विधानसभा चुनाव का बुखार केवल राजनेताओं को ही आता है, ऐसा नहीं है। सबसे ज्यादा उत्साह या अतिरेक जिलों में विधानसभा के चुनाव संपन्न कराने वाले कलेक्टर एवं जिला निर्वाचन अधिकारियों में देखा जा रहा है। कभी-कभी ऐसा लगता है कि विधानसभा चुनाव मध्यप्रदेश में लोकतंत्र का चुनाव नहीं, बल्कि आंधी-तूफान बन गया है और सभी जिलों के निर्वाचन अधिकारी इतने भयभीत हो चुके हैं कि उन्हें यह बात समझ में नहीं आ रही है कि किस अधिकारी और कर्मचारी की चुनाव में ड्यूटी लगाई जाए। आप को यह जानकर आश्चर्य होगा कि मध्यप्रदेश में सभी 52 जिलों के कलेक्टर एवं जिला निर्वाचन अधिकारियों ने कृषि कल्याण विभाग के अदने से कर्मचारी से लेकर प्रथम श्रेणी, द्वितीय श्रेणी तथा तृतीय श्रेणी सभी स्तर के अधिकारियों को भी चुनाव में संलग्न कर दिया है। एक जानकारी के अनुसार किसान कल्याण तथा कृषि विकास द्वारा जारी परिपत्र में यह सूचित किया गया है कि कृषि विभाग के अधिकारियों एवं कर्मचारियों को मानव क्षमता प्रबंधन के निर्देशानुसार विधानसभा चुनाव का मतदान संपन्न कराने के लिए आवश्यक रूप से प्रथम एवं द्वितीय सत्र के प्रशिक्षण में सम्मिलित होने को कहा जाए। यदि उक्त आदेश के परिपालन में कोई कोताही बरती गई तो उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई सुनिश्चित की जाए। जिला निर्वाचन अधिकारियों के उक्त तुगलकी आदेश का व्यापक असर पूरे मध्यप्रदेश के किसानों को शिवराज सरकार के खिलाफ एक बार फिर से नाराज होने का कारण बन गया है। उल्लेखनीय है कि रबी की फसल की बोनी प्रारंभ हो चुकी है, किसानों को खाद-बीज की तत्काल आवश्यकता है, किसानों को लाखों की संख्या में फसल बीमे का पंजीयन भी कराना होगा लेकिन कृषि कल्याण विभाग के 15 हजार अधिकारियों एवं कर्मचारियों को चुनाव ड्यूटी में तैनात करने के आदेश से किसानों में भयंकर नाराजगी का वातावरण अनावश्यक रूप से बन गया है। आपको यह जानकर भी आश्चर्य होगा कि कृषि कल्याण संचालनालय में जिसे विभाग का मुख्यालय कहा जाता है, यहां से भी 230 अधिकारी और कर्मचारी चुनाव के लिए तैनात कर दिए गए हैं। अब यह सारे अधिकारी अपनी दो-दो पासपोर्ट साइज की फोटो प्रभारी अधिकारी के माध्यम से प्रशिक्षण हेतु तैयार कराने से लेकर चुनाव संपन्न होने तक अर्थात् 11 दिसंबर, 2018 तक मध्यप्रदेश के किसानों की सुध नहीं ले पाएंगे। किसान संगठनों के नेताओं को शिवराज सरकार के खिलाफ अकारण फिर से एक बार भड़काऊ वातावरण निर्मित करने का मौका मिल गया है और वे निर्वाचन अधिकारियों द्वारा जारी किए गए आदेश के खिलाफ गुस्सा जाहिर करने के लिए मुख्य निर्वाचन अधिकारी के पास जा भी सकते हैं। बात भी सही है कि रबी फसल की बोनी के लिए किसान के सामने खाद-बीज और फसल बीमा के मुद्दे किसानों के सामने मुंह बाए खड़े हैं, जिसका निपटारा जिलों में पदस्थ सहायक संचालक से लेकर मृदा संरक्षण अधिकारी तक को करना है, जो अब डेढ़ महीने तक उपलब्ध नहीं होंगे और किसान का नाराज होना स्वाभाविक है।