सरकार के पिंजड़े का तोता तो अब दया का पात्र नहीं!

कृष्णमोहन झा
देश की सर्वोच्च जांच एजेंसी सीबीआई के निदेशक आलोक वर्मा एवं विशेष निदेशक राकेश अस्थाना के बीच पिछले एक साल से आरोप-प्रत्यारोप का दौर चल रहा था। दोनो के बीच का विवाद पिछले दिनों जिस तरह से सार्वजनिक हुआ है उससे सारा देश हैरान रह गया। केंद्र सरकार को आखिरकार हस्तक्षेप करने के लिए विवश होना पड़ा, क्योंकि सरकार के पास संस्था की प्रतिष्ठा बचाने के लिए औऱ कोई रास्ता नही बचा था। सरकार ने दोनों वरिष्ठ अधिकारियों को छुट्टी पर भेजकर वरिष्ठता में नम्बर तीन के अधिकारी नागेश्वर राव को संस्था का मुखिया बना दिया। सरकार के इस फैसले पर सवाल उठने लगे है क्योंकि संवैधानिक नियमों के अनुसार सरकार सीबीआई में नियुक्ति को लेकर सरकार अपने स्तर पर फैसला लेने के लिए स्वतंत्र नही है।
इसके जवाब में केंद्रीय मंत्री अरुण जेटली ने यह सफाई दी कि यह फैसला केंद्रीय सतर्कता आयुक्त की सलाह से किया गया है। गौरतलब है कि सीबीआई में वरिष्ठ पदों पर नियुक्ति का फैसला प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता एवं सुप्रीम कोर्ट की समिति मिलकर करती है। शायद इसलिए सीबीआई की निष्पक्षता पर प्राय: सवाल उठाए नही जाते है, परंतु दो वरिष्ठतम अफसरों के बीच इस विवाद ने तो देश की सर्वोच्च जांच एजेंसी की प्रतिष्ठा को ही तार तार कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने कभी इस संस्था को पिंजड़े का तोता कहने से भी परहेज नही किया था।
संस्था की प्रतिष्ठा को धूमिल कर देने वाले इस विवाद से तो यही निष्कर्ष निकलता है कि सरकार के पिंजड़े में कैद यह तोता अब सहानुभति का पात्र नही रहा। सवाल यह उठता है कि सीबीआई के दो अफसरों के बीच के इस विवाद ने संस्था की प्रतिष्ठा को पूरी तरह धूमिल किया उसकी भरपाई निकट भविष्य में हो पाएगी। गौरतलब है कि अभी तक सीबीआई पर सरकार के दबाव में ही काम करने के आरोप लगते रहे है किन्तु इससे अब संस्था की पवित्रता को ही खतरे में डाल दिया है। इसका दुखद पहलू यह भी है कि ज्यो ज्यो मामले की परते खुलती जा रही है त्यों-त्यों देश मे आश्चर्य बढ़ रहा है, उससे निकट भविष्य में इसके पटापेक्ष के आसार नही लग रहे है।
दरअसल इस विवाद की शुरुआत तो उसी समय हो गई थी जब गुजरात कैडर के आईपीएस अधिकारी राकेश अस्थाना को संस्था का अंतरिम निदेशक नियुक्त कर दिया गया था। राकेश अस्थाना को इस पद पर बिठाने के लिए उस समय के नम्बर दो अधिकारी आर के दत्ता का तबादला ग्रह मंत्रालय में करने का फैसला संस्था के निदेशक आलोक वर्मा को रास नही आया था। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि आर के दत्ता संस्था में दूसरे नम्बर के अधिकारी थे, जिन्हें आलोक वर्मा के रिटायर होने के बाद संस्था का मुखिया बनना था। अब सवाल यही उठ रहा है कि राकेश अस्थाना को अंतरिम निदेशक बनाने का फैसला सरकार ने इसी मंशा से लिया था कि आगे चलकर उन्हें सीबीआई का निदेशक बनाने का मार्ग प्रशस्त हो सके। चूंकि सरकार ने यह नियुक्ति आलोक वर्मा की नापसंदगी की परवाह न करते हुए की थी इसलिए उन्होंने इसे प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया था। इससे दोनो के बीच टकराव की शुरुआत हो गई जिसने आज इतना अप्रिय मोड़ ले लिया है कि सरकार ही असहज दिखाई दे रही है। अब ऐसा प्रतीत होता है कि संस्था में आमूल चूल परिवर्तन किए बिना इसकी प्रतिष्ठा लौटाना मुश्किल है। यहां इस बात का भी उल्लेख कर देना भी गलत नही होगा कि राकेश अस्थाना को सीबीआई का अंतरिम निदेशक बानाने के फैसले को नामी वकील प्रशांत भूषण ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। इसी कारण सरकार अस्थाना को उस समय संस्था का विशेष निदेशक बनाने की मंशा पूरी नही कर पाई थी।
सीबीआई के निदेशक आलोक वर्मा को छुट्टी पर भेजने के फैसले पर विपक्षी कांग्रेस ने कई सवाल उठाए है। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने आरोप लगाया है कि आलोक वर्मा फ्रांस के साथ हुए राफेल डील के कागजात एकत्र करने में दिलचस्पी ले रहे थे इसलिए सरकार को उन्हें हटाने का बहाना चाहिए था। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने भी इसी तरह का संदेह व्यक्त किया है। इधर छुट्टी पर भेजे गए आलोक वर्मा इस फैसले पर सवाल खड़े करते हुए इसे इस आधार पर गैरकानूनी बताया है कि सीबीआई के निदेशक का पद दो साल के लिए सुरक्षित होता है। वर्मा ने सरकार पर सीबीआई की स्वतंत्रता पर हसक्षेप का आरोप लगाते हुए यह भी कहा कि जरूरी नही है कि हर जांच सरकार की मंशा के अनुसार ही चले। आलोक वर्मा अब सुप्रीम कोर्ट पहुच चुके है। गौरतलब है कि निदेशक के रूप में आलोक वर्मा के अभी दो वर्ष शेष रह गए थे। यद्यपि सीबीआई के द्वारा यह स्पष्टीकरण दिया गया है कि आलोक वर्मा अभी भी संस्था के निदेशक है और राकेश अस्थाना पूर्ववत विशेष निदेशक ही है और एम नागेश्वर राव को अंतरिम निदेशक बनाया गया है। अब आगे चलकर किसकी क्या हैसियत होगी, इसकी उत्सुकता से प्रतीक्षा की जा रही है। जहाँ तक राफेल डील की बात है तो सीबीआई का कहना है कि आलोक वर्मा राफेल डील की जांच नही कर रहे थे। इधर इस सौदे में कथित गड़बड़ी को चुनावी मुद्दा बनाने पर आमादा राहुल गांधी अब भी इस बयान पर कायम है कि राफेल डील की जांच से घबराकर प्रधानमंत्री ने आलोक वर्मा को छुट्टी पर भेजा है। मामला अब इतना पेचीदा हो गया है कि सरकार को अब दूध का दुध ओर पानी का पानी करने के लिए कोई भी कदम उठाने से पीछे नही हटना चाहिए नही तो सीबीआई की विश्वनीयता कभी भी नही हो पाएगी।
छुट्टी पर भेजे गए सीबीआई के निदेशक आलोक वर्मा एवं विशेष निदेशक राकेश अस्थाना ने एक दूसरे पर रिश्वतखोरी के जो आरोप लगाए है वो काफी गंभीर है। संस्था के 55 साल के इतिहास में यह पहली बार हुआ है कि सरकार को इसके दो सर्वोच्च अधिकारियों को छुट्टी पर भेजना पड़ा है। इसके बाद भी दोनो अपने आरोपो पर कायम है। सीबीआई ने मामले में अपने ही एक डीएसपी को गिरफ्तार कार लिया है। इसमे कुछ बिचौलियों के नाम भी सामने आए है। वही मामले की एसआई जांच भी शुरू हो गई है। नागेश्वर राव ने पदभार संभालते ही आनन फानन में 12 अफसरों के तबादले कर दिए है। कुल मिलाकर परत दर परत भ्रष्टाचार उजागर होता जा रहा है। कब क्या हुआ? किसने किसके ऊपर क्या आरोप लगाए?, अफसरों के बीच विवादों का यह सिलसिला कहा से प्रारंभ हुआ। इन सभी के बारे में यदि विस्तार से लिखा जाए तो न जाने कितने पृष्ठ भर जाएंगे। एक छोटे से लेख में सारी बातों को लिखना नामुमकिन लेकिन जांच तो विस्तृत होना ही चाहिए।
मामले को अगर आनन फानन में निपटाने की कोशिश होती है तो सारे रहस्य विकृत अवस्था मे उजागर होंगे। यह स्थिति सरकार एवं सीबीआई दोनो के लिए दुखद होगी। आखिर यह कैसे संभव हुआ कि जब प्रधानमंत्री ने यह संकल्प ले लिया है कि न खाऊंगा न खाने दूंगा। तब उनकी नाक के नीचे यह कारनामा हुआ है। जिस एजेंसी पर बड़े बड़े घोटालों की निष्पक्ष जांच पर विपक्ष ने भी हमेशा भरोसा किया हो अब उसी सर्वोच्च जांच एजेंसी पर ही रिश्वतखोरी के आरोप लग रहे है। अत: अब दूध का दूध और पानी का पानी करने की घड़ी आ गई है। अब देखना यह है कि इसमें सरकार कितनी दिलचस्पी लेती है। जो सरकार गर्व के साथ कहती है कि उसके राज में एक भी घोटाला नही हुआ अब उसी की सर्वोच्च जांच एजेंसी की जांच करने की नौबत आ गई है। सचमुच यह तो बेहद दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है जिसने संस्था को ही नही सरकार को शर्मसार कर दिया है।
(लेखक राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और डिजिय़ाना मीडिया समूह के राजनैतिक संपादक है)