मध्यप्रदेश में कमलनाथ हों या ज्योतिरादित्य सिंधिया मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित कीजिए, वरना एक बार फिर से गई कांग्रेस

 

शिवराज सिंह चौहान के पक्षधर मालवा में अभी भी 45 प्रतिशत लोग, बावजूद जनता कहती है राहुल गांधी

इंदौर से विशेष रिपोर्ट
विजय कुमार दास

मध्यप्रदेश में सत्ता का संग्राम पूरे शबाब पर है। हार और जीत के लिए तरकश से वो सभी तीर निकाले जा रहे हैं, जिससे विरोधी दल को नेस्तनाबूद किया जा सके। एक ओर सुसंगठित, आधुनिक चुनावी रणनीति से लैस भारतीय जनता पार्टी है, जो प्रदेश में सत्ता की हैट्रिक लगा चुकी है तो वहीं दूसरी तरफ अपना सब कुछ दांव पर लगाकर भी सरकार में आने को छटपटा रही कांग्रेस पार्टी है। दोनों दलों में जो सबसे बड़ा अंतर निकलकर सामने आ रहा है, वह इस चुनावी महाभारत में सेनापति का चयन है। एक तरफ जहां भारतीय जनता पार्टी के पोस्टर ब्वॉय और आम आदमी के मुख्यमंत्री की छवि पेशकर साढ़े तेरह सालों से अपनी लोकप्रियता का ग्राफ लगातार बढ़ाते जा रहे और अब आम लोगों के डीएनए में शामिल हो चुके शिवराज सिंह चौहान सामने हैं तो वहीं कांग्रेस नेतृत्व के कृत्रिम संकट में खुद को फंसाते चली जा रही है। यही एक बड़ी खाईं दोनों दलों के बीच उभरकर सामने आ रही है। ऐसा नहीं कि कांग्रेस के पास विकल्प नहीं है, लेकिन पता नहीं किन मान्यताओं और परंपरा के निर्वहन की लक्षमण रेखा ने कांग्रेस के नेतृत्व को चेहरा घोषित करने से रोक रखा है। राष्ट्रीय हिंदी मेल की टीम ने जो सर्वे मालवा और निमाड़ में किया है, उसमें साफ निकलकर आ रहा है कि 40 प्रतिशत जनता बदलाव चाहती है, लेकिन उसकी बड़ी दिलचस्पी कांग्रेस के सीएम कैंडिडेट को लेकर भी है।
हालांकि इस मैदानी रिपोर्ट में यह भी आया है कि बतौर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान अभी भी 45 प्रतिशत लोगों की उम्मीदों पर खरे उतरे हैं, लेकिन बड़ा विरोधाभास भाजपा के चयनित जनप्रतिनिधियों से आमजन का टूटता विश्वास है। इस जनाक्रोश को कांग्रेस वोटों में तब्दील तभी कर सकती है, जब वह प्रदेश के बारे में अपना नेतृत्व स्पष्ट कर दे। मध्यप्रदेश की राजनीति में अहम माने जाने वाले मालवा-निमाड़ इलाके में विधानसभा की 66 सीटें हैं। वर्तमान में इनमें से भाजपा के पास 56 सीटें और कांग्रेस के पास नौ सीटें हैं जबकि एक सीट निर्दलीय विधायक के कब्जे में है। इस लिहाज से सत्ता तक पहुंचाने में संघ के इस मजबूत गढ़ में कांग्रेस को सेंध लगाने का बेहतरीन अवसर मिला है, लेकिन पार्टी को एक ही शर्त पर बढ़त मिलने की संभावना दिख रही है, जब वह चेहरा घोषित कर दे। ऐसा भी नहीं है मुख्यमंत्री का उम्मीदवार घोषित नहीं करने के पीछे पार्टी को कोई मान्य परंपरा को तोडऩे की जरूरत है। अभी उत्तरप्रदेश के चुनाव में गठबंधन होने के पहले शीला दीक्षित को भावी सीएम के रूप में पार्टी ने प्रोजेक्ट कर दिया था, हालांकि गठबंधन के बाद ऐसा न कर पाने की सूरत में भारी हार भी हुई। वहीं कैप्टन अमरिंदर के नाम का फायदा पंजाब में मिला और सरकार बनीं। लिहाजा यह कोई स्थापित मान्यता नहीं है कांग्रेस बिना चेहरे के ही चुनाव लड़ती रही है। हमारी ग्राउंड रिपोर्ट में एक बात जो प्रमुखता से निकल कर आई, वह इस सबसे पुरानी राजनैतिक दल के सत्ता के वनवास को खत्म करने में सहायक होगी। निमाड़-मालवा की 40 प्रतिशत वयस्क आबादी चाहती है कि शिवराज सिंह चौहान के सामने कांग्रेस उन्हें विकल्प प्रस्तुत करे। चाहे वो कमलनाथ हों या सिंधिया या कोई और लेकिन जनमत है कि एक आम आदमी की भूमिका में शासन करने वाले के सामने पार्टी महाराज या उद्योगपति (जैसा शिवराज सम्बोधित करते हैं) में से किसी को तय कर दे। दरअसल जहां तक कमलनाथ की बात है तो वो बार-बार कह चुके हैं कि उनकी प्राथमिकता मध्यप्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनाना है जिसके लिए वो अपना सब कुछ दांव पर लगा रहे हैं। वहीं मध्य प्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया एकमात्र ऐसे नेता हैं, जो निर्विवाद होने के साथ ही हर वर्ग के चहेते हैं। युवाओं की पहली पसंद बने हुए हैं। आम जनता की नजरों में वो तात्कालिक निर्णय लेने वाले सोशल मीडिया पर छाए हुए और जनता से सीधे जुड़ाव रखने वाले नेता हैं, जिन्होंने मुंगावली और कोलारस उपचुनाव में अपने कुशल नेतृत्व का प्रमाण भी दे दिया है। खैर, मुख्यमंत्री के उम्मीदवार के नाम का चयन करना और घोषित कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी का विवेकाधिकार है, लेकिन अब आम कांग्रेस कार्यकर्ता की छोडि़ए, आपके कार्यकारी प्रदेश अध्यक्ष भी नेतृत्व के अभाव में कहने लगे कि आप तो मुझे देखो, पार्टी गई तेल लेने तो साधारण कार्यकर्ता के मन की पीड़ा तो समझी ही जा सकती है। इस चुनाव में कांग्रेस ने नारा दिया है वक्त है बदलाव का, लेकिन किसके लिए? यह मालवा निमाड़ की जनता जानना चाहती है। आज राहुल गांधी ने मालवा निमाड़ में कांग्रेस का धुआंधार प्रचार किया, अपने हर भाषण में उन्होंने कहा यदि कांग्रेस सत्ता में आती है तो मध्यप्रदेश में 10 दिनों के अंदर किसानों का कर्जा माफ हो जाएगा। यदि माफ नहीं किया गया तो 11वें दिन मुख्यमंत्री को बदल देंगे। वहीं ज्योतिरादित्य सिंधिया ने अपने भाषण में कहा कि यदि कांग्रेस की सरकार आएगी तो हर परिवार से किसी न किसी एक व्यक्ति को रोजगार जरूर मिलेगा, इन दोनों भाषणों का क्या असर हुआ इस जिज्ञासा को लेकर जब राष्ट्रीय हिंदी मेल की टीम ने खरगोन, धार, उज्जैन और इंदौर में आम मतदाताओं से बात की तो सबने एक स्वर में कहा कि राहुल गांधी से कहिए कि ज्योतिरादित्य सिंधिया को मुख्यमंत्री का चेहरा बना ले तो सरकार बन जाएगी। वैसे जीतू पटवारी के इस बात में दम है- आप तो मुझे देखो पार्टी गई तेल लेने। मतलब इस रिपोर्ट का लब्बोलुआब यह भी है कि यदि मध्य प्रदेश में चुनाव से पहले मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित नहीं किया गया तो फिर इस बार भी कांग्रेस का सत्ता में आना मुश्किल ही है। राजनैतिक जिंदगी का आखरी दांव लगाने वाले कमलनाथ के लिए अस्तित्व के खतरे का सवाल बन जाए और ज्योतिरादित्य सिंधिया के हाथ में आया पहला मौका रेत के महल की तरह ढह जाए।