टिकट काटने में तोमर आगे, बांटने में रहा शिवराज का जलवा

अबकी बार 200 पार के लिए पार्टी का तय एजेंडा शुरू

विशेष रिपोर्ट
विजय कुमार दास

मध्यप्रदेश में चौथी बार सत्ता में आने के लिए अमित शाह के मूल मंत्र अबकी बार दो सौ पार को प्रदेश और केंद्रीय नेतृत्व कितनी गंभीरता से ले रहा है, 177 लोगों की जारी सूची इस बात का प्रमाण है। भारतीय जनता पार्टी हर हाल में जीत को लेकर कई महीनों पहले से ही कवायद शुरू कर चुकी थी। कई स्तर के सर्वे कराए गए थे। नॉन परफॉर्मर के टिकट को काटने में पार्टी नेतृत्व ने कोई परहेज नहीं किया है। इस बार टिकट वितरण में मोदी-अमित शाह और शिवराज सिंह चौहान-नरेन्द्र सिंह तोमर का ही सर्वाधिक हस्तक्षेप रहा है। जो सूची प्रत्याशियों की जारी हुई है, उसे देख कर कोई भी राजनैतिक पंडित कह सकता है कि संबंधों, अनुभव, समर्पण और राजनैतिक स्वार्थ से परे सिर्फ जीतने वाले को ही मैदान में उतारा गया है। तभी तो राजनैतिक गलियारों में मामीजी के नाम से पहचानी जाने वाली शिवराज मंत्रिमंडल की कद्दावर नेता माया सिंह का टिकट भी काट दिया गया।
जनसंघ के जमाने से पार्टी के स्तम्भ माने जाने वाले कैलाश चावला के जीतने और अनुभव के बाद फिर से चुनाव नहीं लड़ाने का फैसला कोई भी नहीं ले सकता था, लेकिन यह भाजपा और उसका नेतृत्व ही है, जिसने अब तक के अपने सबसे कामयाब रिकॉर्डधारी पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल गौर की प्रतिष्ठित गोविंदपुरा विधानसभा सीट पर ना गौर साहब का और ना ही पुत्रवधू के नाम की घोषणा की। पार्टी ने यह साफ संकेत दिया है, पार्टी सर्वोपरि है कोई नेता कितना भी बड़ा क्यों न हो, यदि वह अपनी मातृ संस्था पर ही सार्वजनिक आरोप लगाएगा तो अब उसे पुरस्कृत तो नहीं ही किया जाएगा। दरअसल, इस बार नेतृत्व ने शिवराज सिंह चौहान और नरेंद्र सिंह तोमर की पुरानी जोड़ी को फिर से लयबद्ध कर दिया और उसी का परिणाम है कि सिर्फ और सिर्फ जीतने वाले उम्मीदवार पर ही पार्टी ने मुहर लगाई है। इस बार टिकट काटने और जिताऊ प्रत्याशी को सामने लाने में महत्वपूर्ण भूमिका नरेंद्र सिंह तोमर की रही है। उन्होंने ही स्थापित हो चुके लेकिन स्थानीय जनता में अपना प्रभाव खो चुके कई ऐसे विधायकों के टिकट काटने का दबाव बनाया, जो वैसे तो पिछले चुनाव में भारी मतों से जीते थे, लेकिन उनके खिलाफ जबरदस्त एंटी इंकम्बैंसी थी। साथ ही कुछ ऐसे लोगों को भी टिकट दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जो पिछले चुनाव में कम मतों से हारने के बावजूद अपने क्षेत्र में सक्रिय रहे हैं। इधर शिवराज सिंह चौहान टिकट बांटने के मामले में उदार दिखते रहे हैं। यही वजह है कि अपने मंत्रिमंडलीय सहयोगियों में से अधिकांश को वे अगली पारी के लिए साथ लेकर चलने को तैयार को राजी हुए। हालांकि शुरुआत में कयास लगाए जा रहे थे कि मंत्रियों के विधानसभा क्षेत्र बदले जाएंगे, लेकिन सूत्र बताते हैं कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और नरेंद्र सिंह तोमर ने नेतृत्व को आश्वस्त कराया कि ये सभी अपनी सीटों से ही जीत कर आएंगे। लिहाजा खुरई से भूपेन्द्र सिंह, दतिया से नरोत्तम मिश्रा, शिवपुरी से यशोधरा राजे सिंधिया, रहली से गोपाल भार्गव, रीवा से राजेन्द्र शुक्ल, विजयराघवगढ़ से संजय पाठक, नरेला से विश्वास सारंग, भोपाल दक्षिण पश्चिम से उमाशंकर गुप्ता, बालाघाट से गौरीशंकर बिसेन, उज्जैन उत्तर से पारस जैन, भोजपुर से सुरेंद्र पटवा, सिलवानी से रामपाल सिंह, ग्वालियर से जयभान सिंह पवैया, मुरैना से रुस्तम सिंह, गोहद से लाल सिंह आर्य को एक बार फिर अपनी ही सीट से जनता के बीच जाने का मौका मिला है।
हालांकि इस सूची में केवल 16 महिलाओं को जगह मिली है और इस बात की आलोचना की जा सकती है कि हमेशा महिला सशक्तिकरण की बात करने वाली पार्टी में पहली सूची में केवल 9 प्रतिशत ही उम्मीदवारों के नाम हैं, लेकिन आलोचना के पूर्व यह भी ध्यान रखना होगा कि राजनीति में रणनीति भी अहम होती है और जब बात जीत और केवल जीत की ही हो तो संवेदनाओं को दरकिनार तो करना ही पड़ता है। लिहाजा भाजपा की पहली सूची में शिवराज सिंह और नरेंद्र सिंह तोमर के प्रयासों, संकल्पों और मेहनत की पूरी झलक दिखाई दे रही है और आने वाली सूची में भी लगभग कुछ ऐसा ही रहेगा।