राफेल को मोदी सरकार के खिलाफ हथियार बनाएगी कांग्रेस

शकील सिद्दीकी
राफेल विमान सौदे को कांग्रेस ने मोदी सरकार के खिलाफ अब सियासी हथियार बनाने की रणनीति तय कर ली है। कांग्रेस अब राफेल के मुद्दे को सियासी उड़ान देने के लिए संसद के शीतकालीन सत्र में मोदी सरकार के खिलाफ विपक्ष को एकजुट करने की कोशिश में है। जिस तरह से कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी राफेल डील पर मोदी सरकार पर हमलावर है उससे तो इसी बात के संकेत मिल रहे हैं कि यह मुद्दा शांत होने वाला नहीं है। पांच राÓयों के विधानसभा चुनाव के भंाति लोकसभा चुनाव में राफेल का सियासी जहाज खूब उड़ान भरेगा। लेकिन इन सबके बीच पहले फ्रांस सरकार ने खंडन किया। अब राफेल विमान बनाने वाली कंपनी ‘दसॉल्ट एविएशनÓ के सीईओ एरिक ट्रैपियर ने राहुल गांधी और कांग्रेस के तमाम झूठे आरोपों की कलई खोल दी है। न तो फ्रांस के राष्ट्रपति ने राहुल के कान में कोई रहस्य फुसफुसाया और न ही अनिल अंबानी की रिलायंस डिफेंस कंपनी की जेब में &0,000 करोड़ रुपए गए। राफेल के सीईओ ने एएनआई की संपादक स्मिता प्रकाश के साथ साक्षात्कार के जरिए यह भी खुलासा किया है कि भारत में ऑफसेट पार्टनर के लिए 72 कंपनियां चुनी गई थीं। उनमें से &0 के साथ साझेदारी की गई है। रिलायंस उनमें से एक है। हिंदुस्तान एयरोनोटिक्स लिमिटेड (एचएएल) इस सौदे में ऑफसेट पार्टनर बनना ही नहीं चाहती थी। दसॉल्ट कंपनी को भारत में संयुक्त उपक्रम खोलना था, लिहाजा रिलायंस को चुना गया। उसमें प्रधानमंत्री मोदी की कोई भूमिका नहीं थी।
करीब 800 करोड़ रुपए के संयुक्त उपक्रम में 49 फीसदी दसॉल्ट और 51 फीसदी रिलायंस की हिस्सेदारी है। सीईओ ने यह भी खुलासा किया है कि राफेल विमान यूपीए सरकार के दौरान प्रस्तावित सौदे से 9 फीसदी सस्ते भारत को मिलेंगे। ऐसा ही भारतीय वायुसेना के प्रमुख और उप प्रमुख का भी मानना है। यदि दसॉल्ट के सीईओ के खुलासों में कोई झूठ है या वह मोदी सरकार का बेजा बचाव कर रहे हैं, तो राहुल गांधी झूठ और गलत तथ्यों की राजनीति छोड़ दें और सीधा सर्वो’च न्यायालय में चुनौती दें। ऐसा करना ही राष्ट्रहित में होगा। राहुल कांग्रेस आरोप दर आरोप लगाती रही है। राफेल विमान की कीमत और रिलायंस के साथ पार्टनरशिप पर उसके कई सवाल हैं। उनके मद्देनजर उसने प्रधानमंत्री को ‘चोरÓ तक कह दिया है। आजकल देश की नवरत्न कंपनी एचएएल की चिंता भी कांग्रेस को Óयादा ही सता रही है, तो इन स्थितियों में कांग्रेस यूपीए सरकार के दौरान की गई डील के दस्तावेज सार्वजनिक करे। समझौते भी सार्वजनिक किए जाएं। यह भी बताया जाए कि जो डील 2007 में शुरू की गई, वह 201& तक भी संभव क्यों नहीं हो पाई?
आखिर रक्षा मंत्री एके एंटनी ने डील पर दस्तखत करने से इनकार क्यों किया? उस अधूरी डील पर प्रधानमंत्री मोदी या उनके रक्षा मंत्री हस्ताक्षर क्यों करते? लिहाजा 2015 में नए सिरे से सौदेबाजी शुरू की गई। इन सभी खुलासों से यह साफ हो जाएगा कि सच क्या है? दसॉल्ट एविएशन के सीईओ के खुलासों को झूठ करार देना बेबुनियाद, अतार्किक होगा। सीईओ झूठ बयां क्यों करेंगे? भारत और फ्रांस सरकारों के बीच &6 राफेल विमानों का सौदा लागू हो चुका है। विमान निर्माणाधीन स्थिति में होंगे! सितंबर, 2019 से उनकी सप्लाई भी शुरू हो जाएगी। समझौते के दस्तावेज कभी के फाइनल हो चुके हैं। यदि फिर भी राहुल गांधी और कांग्रेस को कोई आशंका है, तो उसे सार्वजनिक करें अथवा सुप्रीम कोर्ट में जाएं।
अब कौन-सी पिक्चर बाकी है? चूंकि मोदी सरकार ने बंद लिफाफे में राफेल विमान सौदे का ब्यौरा सुप्रीम कोर्ट को सौंप दिया है, लेकिन राहुल कांग्रेस ने देश के प्रधानमंत्री को ‘चोरÓ करार देते हुए जो दुष्प्रचार छेड़ा था और प्रधानमंत्री पद की राष्ट्रीय गरिमा को लांछित किया था, सरकार को उसे भी शीर्ष अदालत तक ले जाना चाहिए, ताकि गालीबाजों का दंड तय किया जा सके। यह राष्ट्रीय सुरक्षा का मामला है। शीर्ष अदालत को दिए ब्यौरे में सरकार ने उन परिस्थितियों का भी उल्लेख किया है, जिनके मद्देनजर पड़ोसी देशों की वायुसेना शक्ति लगातार मजबूत हुई है। शत्रु ने लड़ाकू बेड़ा बढ़ाया है। मिसाइल रडार की क्षमता बढ़ाई है। करीब 400 लड़ाकू विमान हासिल किए हैं। लिहाजा चुनौती लगातार सामने है। राफेल एशिया में चीन और पाकिस्तान को अपने लड़ाकू विमान मुहैया नहीं कराती, लिहाजा यह सैन्य शक्ति भारत के पास ही है। राफेल में परमाणु अस्त्र भी जुड़े होंगे। दसॉल्ट के सीईओ के इस साक्षात्कार के बाद इस मुद्दे पर खुली सियासत का पटाक्षेप हो जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट में भी दसॉल्ट सीईओ के ऐसे ही खुलासे कारगर रहेंगे। यदि राहुल कांग्रेस राफेल को ‘बोफोर्सÓ बनाने पर आमादा है, तो धूल में ल_ मारती रहे, हासिल शून्य ही होगा।
एक झूठ के हजार बार दोहराए जाने से उसके सच हो जाने की बात सूचना क्रांति के इस युग में अप्रासंगिक हो चली है क्योंकि सार्वजनिक विमर्श का विषय बनने वाली किसी भी बात का तथ्यात्मक विश्लेषण लोग अपने स्तर पर करने लग जाते हैं। भौगोलिक दूरी भी इस बारे में बाधा नहीं बन पाती। यही वजह है कि रॉफेल को लेकर जो भारत में कहा जा रहा है उसका संज्ञान तत्काल फ्रांस में लिया जाता है। इसी तरह जो कुछ वहां कहा जाता है उसकी जानकारी भी अविलंब भारत आ जाती है। गत दिवस श्री गांधी ने रॉफेल के सीईओ पर भी असत्य बयान देने आरोप लगाते हुए कह दिया कि वे श्री मोदी का बचाव कर रहे हैं। और भी बहुत कुछ कांग्रेसाध्यक्ष ने कहते हुए उपस्थित संवाददाताओं को ये उलाहना भी दिया कि आप ये सब प्रकाशित या प्रसारित नहीं करोगे। हालांकि देश की मुख्य विपक्षी पार्टी द्वारा लगाए आरोप को समाचार माध्यमों ने गम्भीरता से लेते हुए उसे पर्याप्त महत्व दिया लेकिन उनके तमाम आरोप यदि तथ्यों पर आधारित हैं तब उन्हें सर्वो’च न्यायालय में विचाराधीन याचिका में हस्तक्षेपकर्ता बनकर श्री मोदी को घेरना चाहिए।
पंच राÓयों के विधानसभा चुनाव के मद्देनजर भाजपा और प्रधानमंत्री को घेरने की उनकी सोच गलत नहीं है लेकिन गम्भीर आरोपों के साथ यदि पर्याप्त तथ्य न दिये जाएं तो व्यक्ति की विश्वसनीयता समाप्त हो जाती है। श्री गांधी रोजाना प्रधानमंत्री पर तंज कसते हैं कि यदि उनके आरोप गलत हैं तो श्री मोदी उनका प्रतिवाद क्यों नहीं करते। दरअसल कांग्रेसाध्यक्ष खुद को प्रधानमंत्री के समकक्ष स्थापित करना चाह रहे हैं किंतु लगभग डेढ़ दशक से ऐसे ही हमलों को झेलते आ रहे श्री मोदी कहीं अधिक बड़े और अनुभवी खिलाड़ी हैं। इसलिए वे उपयुक्त अवसर की तलाश में होंगे। उनकी रणनीति राहुल की सारे तीर चलने देने तक रुकने की भी हो सकती है।
वहीं मुद्दा यह भी है कि राहुल गांधी जो प्रमाण वे सार्वजनिक सभाओं और पत्रकारों के समक्ष रख रहे हैं यदि वे उनकी प्रामाणिकता को लेकर आश्वस्त हैं तो उन्हें अविलंब सर्वो’च न्यायालय चले जाना चाहिए। यदि वे ऐसा नहीं करते तब उनके बयान एक आम राजनीतिक आरोप तक सिमटकर रह जाएंगे। यूँ भी राÓयों के विधानसभा चुनाव में स्थानीय मसले Óयादा प्रासंगिक होते हैं और रही बात लोकसभा चुनाव हेतु माहौल बनाने की तो उसमें अभी देर है। क्या पता तब तक देश की राजनीति में कौन सा बड़ा मोड़ आ जाए?
राफेल डील का मुद्दा पिछले कुछ समय से भारतीय राजनीति में काफी चर्चित है। विपक्ष का काम सरकार के गलत कामों की आलोचना करना होता है जो एक समाज की बेहतरी के लिए बहुत सही है। लेकिन विपक्ष द्वारा प्रधानमंत्री मोदी पर बिना तथ्यों के दोषारोपण करना, अभद्र भाषा का प्रयोग करना कहां तक उचित ठहराया जा सकता है। सुप्रीमकोर्ट को सरकार ने राफेल की सही जानकारी और कीमत का ब्योरा दे दिया है और इससे विपक्ष का आरोप विफल साबित होता है। अब उन नेताओं को अपने असभ्य, अभद्र शब्दों और भाषा के प्रति माफी मांगनी चाहिए? लेकिन जिस तरह से कांग्रेस आगामी शीतकालीन सत्र में इस मुद्दे पर सरकार को घेरने की रणनीति बना रही है, उससे लगता है संसद से लेकर सड़क तक राफेल डील का शोर-शराबा कम होने वाला नहीं है।