पंजाब के दरवाजे पर आतंकवाद की दस्तक

राजेश माहेश्वरी

पंजाब के दरवाजे पर फिर एक बार आंतकवाद ने दस्तक दी है। अभी पंजाब के लोग आतंकवाद के पिछले दौर के सदमों और जख्मों से उभर नहीं पाये हैं। ताजा घटनाक्रम में अमृतसर के समीप एक गांव में निरंकारी भवन पर हुए आतंकी हमले ने पंजाब में आतंक की वापसी का खतरा उत्पन्न कर दिया है। ये सन्देह व्यक्त किया जा रहा है कि कश्मीर घाटी में आतंकवाद के पैर उखड़ते देख पाकिस्तान एक बार फिर खालिस्तान के नाम पर पंजाब को आतंक की आग में धकेलने का षडयंत्र रच रहा है।
स्मरणीय है नब्बे के दशक में जब पंजाब में पाकिस्तान प्रवर्तित खालिस्तानी आतंकवाद की कमर टूटने लगी तब उसने कश्मीर में आतंकवाद को दाना-पानी देकर भारत के लिए ऐसी समस्या खड़ी कर दी जिसकी वजह से पूरे देश की आंतरिक सुरक्षा खतरे में पड़ी हुई है। हालांकि पंजाब में सैन्य ठिकानों पर भले आतंकवादी हमले होते रहे किन्तु निरंकारी भवन पर हुआ ताजा हमला किसी दूसरी रणनीति की तरफ इशारा कर रहा है। पंजाब के मुख्यमंत्री ने इस बात का खुलासा किया है कि पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई ने स्थानीय सेल की मदद से हमला किया है। एनआईए ने जांच शुरू कर दी है लेकिन चौंकाने वाली बात ये है कि खुफिया एजेंसियों द्वारा आगाह किए जाने के बाद भी आतंकवादी कामयाब हो गए।
वास्तव में घुसपैठ और आतंकवादी गतिविधियों के विरुद्ध सुरक्षा बलों की सुनियोजित और आक्रामक रणनीति की वजह से आतंकवादी संगठन बौखलाए हुए हैं। हाल के कुछ दिनों में उन्होंने स्थानीय पुलिस वालों की हत्या करने के अलावा नौजवानों का अपहरण कर उनकी नृशंस हत्या करने का तरीका अख्तियार कर रखा है। कश्मीर घाटी की जनता भी अब आतंकवादियों की गतिविधियों से त्रस्त होकर उनको पहले जैसा सहयोग नहीं दे रही। पत्थरबाजी की घटनाओं में भी कमी आई है। सुरक्षा बलों द्वारा सघन तलाशी अभियान चलाकर छिपे हुए आतंकवादियों के सफाये का जो अभियान चलाया गया उसके अनुकूल परिणाम निकले जिसकी वजह से पाकिस्तान भी अपनी रणनीति बदलकर पंजाब में नया मोर्चा खोलने का दांव चल सकता है।
पंजाब में नशे के कारोबार को भी आतंकवादी गतिविधियों से जोड़कर देखा जाता रहा है। यूूं भी आतंकवादियों के लिए कश्मीर के बाद पंजाब ही सबसे मुफीद जगह है क्योंकि वहां से सीमा पार करना आसान है। लेकिन देखने वाली बात ये होगी कि मुस्लिम आतंकवादी संगठनों का खालिस्तान समर्थक तत्वों से गठबंधन किस तरह आकार लेगा क्योंकि बिना पाकिस्तान के सक्रिय सहयोग के ये सम्भव नहीं होगा। नब्बे के दशक में भी पंजाब के आतंकवाद को पूरी तरह से पाकिस्तान का समर्थन था। जानकार सूत्र कहते हैं कि 1971 में बांग्ला देश के निर्माण का बदला लेने हेतु पाकिस्तान के तत्कालीन फौजी तानाशाह जियाउल हक ने पंजाब में अलगाववाद के बीज बोए और बड़ी संख्या में सिख युवकों को लालच देते हुए सीमा पार बुलाकर वैसे ही आतंकवाद का प्रशिक्षण दिया जैसे वह कश्मीरी युवकों के साथ करता है।
खालिस्तान की उस मांग को कुछ पश्चिमी ताकतों का भी अंदरूनी समर्थन हासिल था जो भारत को अस्थिर करने के लिए हमेशा पाकिस्तान को प्रेरित और प्रोत्साहित करते रहे। ये कहना पूरी तरह से सत्य है कि यदि अमेरिका और ब्रिटेन जैसे देश पाकिस्तान को दूध पिलाकर नहीं पालते तो वह अपने अंतद्र्वंद में उलझकर कभी का टूट चुका होता। यहां उल्लेखनीय है कि भारत का विभाजन करते समय अंग्रेजों ने सिख होमलैंड बनवाने का कुचक्र भी रचा था। लेकिन पाकिस्तान बनने की हलचल शुरू होते ही पश्चिमी हिस्से सहित सीमांत क्षेत्रों में मुसलमानों ने जिस तरह से सिखों और हिंदुओं का कत्लेआम शुरू किया उससे अलग देश का ख्वाब देखने वाले सिख नेता चौकन्ने हो गए और भारत के साथ रहने को राजी हो गए किन्तु ये भी सही है कि अलग देश का जहरीला बीज पंजाब की मिट्टी में दबा रहा जो रह-रहकर अंकुरित होने की कोशिश करता रहा और कालान्तर में भिंडरावाला के रूप में सामने आ गया।
हमें सतर्क होना पड़ेगा, क्योंकि पंजाब में जो हालात चल रहे हैं, उन्हें देखकर आंखें बंद नहीं की जा सकतीं। इसके अलावा, खुफिया एजेंसी आईबी ने भी पंजाब सरकार को ‘लीडÓ भेजी थी कि आतंकी पंजाब की ओर बढ़ रहे हैं। अलकायदा कमांडर जाकिर मूसा और जैश-ए-मुहम्मद के 6-7 आतंकी भी पंजाब में सक्रिय हैं। आईएसआई ने नई रणनीति के साथ आतंकवाद का नया मोर्चा भी पंजाब में ही खोला है। ऐसी खुफिया लीड के बाद चौकसी बढ़ाई गई, जाकिर मूसा के पोस्टर पंजाब के प्रमुख शहरों, कस्बों में चिपकाए गए। यदि आगाह करने वाली सूचनाओं के बावजूद इतने संवेदनशील स्थान पर ‘आसान आतंकी हमला हो जाए, तो बेशक आंतरिक सुरक्षा की भयंकर चूक है और बुनियादी जवाबदेही पंजाब सरकार की बनती है। दरअसल पंजाब में खालिस्तानी उग्रवाद का दौर भूलना नहीं चाहिए, जब खून से सनी लाशें सामान्य थीं, पंजाब की गलियों में एके-47 और नंगी तलवारें लेकर भागते हुए खाड़कुओं को देखा था, हर वर्ग-हर उम्र के आदमी की हत्या की गई थी, क्या आज भी उस दौर को दोबारा जिंदा देखना चाहेंगे?
यह भी याद रखना चाहिए कि अब केपीएस गिल ‘दिवंगत हो चुके हैं, लिहाजा बार-बार सोचना चाहिए कि खालिस्तान की वापसी निजी या राष्ट्रहित में है या नहीं? खालिस्तान पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री बेअंत सिंह समेत कई नेताओं की कुर्बानी ले चुका है। बेशक खालिस्तान समर्थक ताकतें पाकिस्तान, कनाडा, ब्रिटेन और जर्मनी आदि देशों में सक्रिय हैं, लेकिन वे पंजाब को आसान निशाना बनाते हुए लौटना चाहती हैं, ताकि पंजाब के जरिए देश के राजधानी क्षेत्र में भी आतंकवाद फैलाया जा सके। पंजाब में हाईअलर्ट पहले से ही था और इस हमले के बाद उसे दिल्ली, नोएडा तक बढ़ा दिया गया है। सीमाएं सील कर दी गई हैं। राष्ट्रीय जांच दल अमृतसर पहुंच चुका है। हमले से जुड़े पहलुओं की जांच वही करेगा। पंजाब में स्वात कमांडो समेत सभी बलों को सचेत कर दिया गया है। बुनियादी चिंता यह है कि क्या आतंकवाद कश्मीर के बाद पंजाब को भी अपनी गिरफ्त में ले लेगा? हमें पठानकोट, गुरदासपुर, जालंधर, बठिंडा में किए गए आतंकी हमलों को नहीं भूलना चाहिए। सबसे बड़े दुश्मन की सीमाएं हमसे चिपकी हैं, यह भी याद रखना चाहिए। पंजाब के अमन-चौन, सौहाद्र्र को यूं ही बर्बाद नहीं होने दिया जा सकता। पिछले दिनों ब्रिटेन समेत कई देशों में अलग राज्य की मांग के समर्थन में 2020 में जनमत संग्रह कराने के लिये मुहिम चलाने वालों के खतरनाक मंसूबों को वक्त रहते समझने की जरूरत थी। मगर दुर्भाग्य से ऐसा नहीं हुआ। चार दशक पूर्व पंजाब जिस काले दौर से गुजरा है, उसके जख्म बामुश्किल भरे हैं। चिंता की बात यह है कि वर्ष 1978 में निरंकारियों पर हमले के बाद जो आतंक की लहर उठी थी, उसकी पुनरावृत्ति एक बार फिर करने की साजिश हुई है। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि पंजाब में कुछ राजनीतिक दल अपनी कमजोरियों को ढकने के लिये अतिवादियों को शह दे रहे हैं। पिछले आम चुनाव में? इससे जुड़े चौंकाने वाले खुलासे हुए थे। सत्ता से बाहर बैठे राजनेताओं और सत्तापक्ष के लोगों पर राजनीतिक कारणों से गर्म मिजाज लोगों को शह देने के आरोप लगते रहे हैं। आतंक के दौर में पंजाब ने बड़ी कीमत चुकाई है। पंजाब उस काले दौर के झंझावातों से ही प्रगति की दौड़ में बहुत पीछे रह गया है। ऐसे में सरकार और समाज का दायित्व बनता है कि फिर चरमपंथियों को सिर उठाने से रोकने के लिये भरपूर सहयोग करें। ऐसा न हो कि हमारी उदासीनता की राज्य को बड़ी कीमत चुकानी पड़े। अमृतसर के पास निरंकारी भवन में हुआ हादसा नये खतरे का इशारा है। इसके दूरगामी उद्देश्य को समझकर तत्काल उचित कदम उठाये जाने की जरूरत है। विशेष ध्यान रखने वाली बात ये है कि उक्त घटना को राजनीति का चश्मा उतारकर राष्ट्रीय सुरक्षा और उससे जुड़ी चिंताओं के संदर्भ में देखना चाहिए।

(लेखक राज्य मुख्यालय पर मान्यता प्राप्त स्वतंत्र पत्रकार हैं।)