चुनाव, चयन की प्रक्रिया है, रणभूमि नहीं

मनोज कुमार

ग्राम पंचायत के चुनाव से लेकर लोकसभा के चुनाव के लिए एक पंक्ति का ऐलान किया जाता है कि फलां, फलां से चुनाव लड़ेगा अथवा कि अब रणभूमि में होगा फैसला. ऐलान ऐसा किया जाता है कि मानो चुनाव चयन की प्रक्रिया ना होकर युद्ध का मैदान है और युद्ध का थंब रूल है विजय और सिर्फ विजय. कहा गया है कि प्रेम और युद्ध में सबकुछ जायज है तो क्या लोकतंत्र के इस जनपर्व को भी हमने रणभूमि बना दिया है? क्या हम बेदाग छवि वाले जनप्रतिनिधियों के स्थान पर धन-बल को प्राथमिकता दे रहे हैं? क्या अब हमें सर्वमान्य सरकार की आवश्यकता नहीं रह गई है? दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का जो ताज भारत के सिर पर सजा हुआ है, वह कहीं जख्मी तो नहीं हो रहा है? ये सवाल जवाब मांगते हैं कि आखिर हम चुनाव को लोकतंत्र का महायज्ञ क्यों कहते हैं? ऐसे अनेक सवाल हैं जो मन को बार बार बेधते हैं।
सवाल अपनी जगह खड़े हैं और कदाचित स्थितियों के चलते सवाल जख्मी भी हो रहे हैं। सवाल की कोई बिसात तब नहीं रह जाती है जब हम कमजोर आवाज में कहते हैं कि बुलेट पर बैलेट भारी पड़ता है। एक दौर था जब ईवीएम मशीनों का आगमन नहीं हुआ था और तब बाहुबलियों का शोर भी वैसा नहीं था लेकिन जितना था और जैसा था, उसे जवाब देने के लिए बैलेट हमारे पास था। बैलेट महज सरकार चयन का आधार नहीं था बल्कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का विश्वास था. बैलेट के सहारे बुलेट को पराजित कर देने का हमारा माद्दा कहीं गुम हो गया है। चुनाव प्रक्रिया देखते ही देखते ना जाने कब रणभूमि में बदल गया। प्रतिस्पर्धा के स्थान में लड़ाई का भाव आ गया और आ गया इसी के साथ लोकतंत्र में नकरात्मकता का भाव। सुलह सौदे की परिपाटी नई नहीं है। शराब और पैसा बांटने के आरोप राजनीतिक दलों पर लगते रहे हैं। लेकिन आज जो बदसूरत चेहरा देखने को मिल रहा है, उसकी जड़ में चुनाव के जरिए चयन के स्थान पर पराक्रम का प्रदर्शन करना है। कौन कितना धन खर्च कर सकता है और कौन कितना बाहुबली है, इस पर चयन आश्रित है। अब यह कहना मुश्किल है कि चयनित सरकारें विश्वास के सहारे आयी हैं या विश्वास को रौंद कर?
अब सवाल उठता है कि चुनाव लड़ेंगे या चुनाव लड़ा जा रहा है, यह उपजा कहां से? बिलाशक यह शब्दावली मीडिया की उपज है। दर्शकों और पाठकों में रोमांच जगाने के लिए जब तब वह ऐसे शब्द गढ़ता रहता है। खासतौर पर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया-प्रिंट मीडिया के पास बंदिश है समय और स्थान की लेकिन इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के पास अथाह समय और स्थान है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का चुनावी कव्हरेज देखकर आप उद्धेलित हो सकते हैं. निराशा और कुंठा से भी भर सकते हैं और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया दर्शकों की इस कमजोरी को जानता है, इसलिए दिमाग में बार बार हथौड़े की तरह वार करता है। वह चुनाव, चयन और बेदाग सरकार की बातें करेंगे तो जो थ्रिल वह चाहता है, नहीं मिलेगा और ऐसे में उसकी टीआरपी पर असर होगा। टीआरपी गिरेगी तो हर तीसवें सेकंड में दिखाए जाने वाले विज्ञापन भी बंद हो जाएंगे। जरूरी है कि वह चुनाव को चयन के स्थान पर युद्ध में बदल दे, उसे रणभूमि बना दे, प्रिंट मीडिया भी इसमें पीछे नहीं है। सनसनी फैलाने वाली चुनावी खबरें उसका खास हिस्सा होती है। आखिरकार उसके हित भी तो बाजार से जुड़े हैं। बाजार तय करता है कि चुनाव को चयन बताना है या चुनाव को पराक्रम साबित कर रणभूमि में तब्दील करना है।
यह माना गया है कि जब आप नकरात्मक सोचते हैं तो पूरी सोच नकरात्मक हो जाती है। चुनाव लड़ाई या युद्ध बन गया है तो इसका पूरा चरित्र भी वैसा ही होता जा रहा है। पूर्व चुनाव आयुक्त टीएन शेषन को हम इसलिए बार बार याद करते हैं कि उन्होंने चुनाव बनाम युद्ध के खतरे को भांप कर चुनाव सुधार की प्रक्रिया आरंभ कर दी थी। चुनाव प्रचार से लेकर हर चीज की खर्च की सीमा बांधने की पहल के साथ कुछ और उपाय किए गए थे। बाद के और वर्तमान चुनाव आयुक्त ओपी रावत भी इस दिशा में बेहद सजग हैं। कहते हैं कि ज्यों-ज्यों दवा की, मर्ज बढ़ता गया तो देखेंगे कि एक रास्ता बंद हुआ तो दूसरा खोल दिया। गुजरे डेढ़ दशक में पेडन्यूज नाम की बीमारी ने इसे जकड़ लिया है। खुद को महिमामंडित करने के लिए नेतागण अपने पक्ष में खबर पैसे देकर प्रकाशित करवाते हैं। इसे एक तरह से आप नेताओं की इमेज बिल्डिंग का प्रोसेस कह सकते हैं. चुनाव आयोग इस मामले को लेकर सख्त है लेकिन इस दाग से बचने की कई संकरी गलियां हैं जिससे नेतागण तो निकल आते हैं, चुनाव आयोग को उन्हें दबोच पाना थोड़ा मुश्किल होता है। धन के साथ ही बल प्रयोग के लिए एक जमाने में देश के कुछ राज्य बदनाम हुआ करते थे। अब सब एक मंच पर खड़े हैं। सबका लक्ष्य चुनाव में श्रेष्ठ चयन का आधार नहीं बल्कि बल के सहारे चयनित होने का आधार बन चुका है। धन और बल से तैयार सरकारों के चरित्र का अंदाजा आप लगा सकते हैं।
नकरात्मकता का आलम इस स्तर पर पहुंच गया है कि विरोधी दल और नेता को मतदाताओं के समक्ष नीचा दिखाने के लिए बदजुबानी का सहारा लेना पड़ता है। सामाजिक मर्यादा तो खत्म हो गई हैं, वर्जनाएं भी टूट रही है। निजता का खुलेआम उल्लंघन किया जा रहा है। तेरी कमीज, मेरी कमीज से सफेद कैसे, वाली शब्दावली धूल चाट रही है। अच्छे और लच्छेदार शब्दों से नारे गढऩे वाले फणीश्वरनाथ रेणु, श्रीकांत वर्मा और बालकवि बैरागी जैसे लोग अब रहे नहीं। सोच, समझ और दृष्टिहीन अब नारे गढ़ रहे हैं। स्वाभाविक है कि नकरात्मक सोच के साथ जब नारे गढ़े जाएंगे तो लड़ाई का आपको भान होगा ही।
हालात यह हो गए हैं कि सभी दलों के नेताओं को यह बताने में पसीना छूट रहा है कि उन्होंने सत्तासीन होते हुए विकास के कौन से पैमाने तय किए तो वे अपने विरोधी को कटघरे में खड़ा कर रहे हैं। यह स्थिति चुनाव से चयन नहीं, लड़ाई के मनोभाव की परिणीति है। रही-सही कसर सोशल मीडिया ने पूरा कर दिया है। अनर्गल और बेबुनियाद खबरें और वीडियो ने तो भ्रम का ऐसा जाल बुना है कि अब बस भी करो यार, कहने का मन होता है। चुनाव को चयन के स्थान पर लड़ाई बना देने से लोकतांत्रिक व्यवस्था पर आघात पहुंचा है। दुखद और दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि किसी भी मंच पर इस शब्द को लेकर चर्चा नहीं हो रही है। ऐसा लगता है कि हम सबने मान लिया है कि चुनाव, चयन के लिए नहीं, रण के लिए हो रहा है और जब मनोवृत्ति ऐसी है तो इसी तरह के समाज का निर्माण होगा।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और रिसर्च जर्नल ‘समागम के सम्पादक हैं)