छत्तीसगढ़ में समझिए अजीत जोगी-अमित जोगी होने के मायने…

विशेष संपादकीय
विजय कुमार दास

छत्तीसगढ़ नए राज्य के रुप में जब मध्यप्रदेश के विभाजित टूटे हुए अंग के रुप में आकार लिया था, तब किसी ने यह नहीं सोचा था कि मध्यप्रदेश का यह टूटा हुआ अधूरा-सा अंग एशिया का सबसे महत्वपूर्ण और विकास करने में अव्वल आने वाला नया राज्य बन जाएगा। बिलासपुर जिले के जोगीसार गांव में जन्मे पेण्ड्रारोड तहसील के ठेठ छत्तीसगढ़ी अजीत जोगी के बारे में आज यह लिखा जाए कि वह कोई साधारण व्यक्ति नहीं, जिसने छत्तीसगढ़ की माटी में जन्म लेकर भोपाल के मौलाना आजाद इंजीनियरिंग महाविद्यालय में टॉपर बना हो और फिर भारतीय पुलिस सेवा और उसके बाद भारतीय प्रशासनिक सेवा के अव्वल दर्जे के नौकरशाह में शुमार होने के बावजूद रातों-रात अर्जुन सिंह के जमाने में राजनीति को अपना कैरियर चुन लिया हो। छत्तीसगढ़ राज्य ने 1 नवम्बर, 2000 को अपनी विकास यात्रा अजीत जोगी की अगुवाई में शुरु की थी। यह कहने में अथवा लिखने में न तो संशय है और न ही संकोच कि चाहे नया रायपुर हो या फिर पूरे छत्तीसगढ़ के गली-गली का विकास हो, इसकी परिकल्पना का ब्लू प्रिंट अजीत जोगी ने ही तैयार किया। भाग्य ने पलटा खाया और तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी अपने मंत्रिमंडल के विश्वसनीय सहयोगी राज्य मंत्री डॉ. रमन सिंह को नए राज्य के मुख्यमंत्री के रुप में 2003 में अवतरित कर दिया। डॉ. रमन सिंह ने 15 वर्ष की निर्बाध पारी पूरी कर ली है, बिना दाग के राजनीति में किसी का कैरियर निकल जाए ऐसा तो होता नहीं, इसलिए सब कुछ अच्छा करते हुए डॉ. रमन सिंह के पीछे एक पुछल्ला पनामा लीक पेपर का चल पड़ा, जो 15 वर्ष की भाजपा सरकार के मंत्रियों के खिलाफ उपजे एंटी-इनकमबैंसी के रुप में इस 2018 विधानसभा चुनाव के महाभारत में सामने आया। एंटी-इनकमबैंसी के 2 महत्वपूर्ण और कारण भी थे जिसमें सबसे बड़ा कारण छत्तीसगढिय़ों की उपेक्षा का सवाल और दूसरा मंत्रियों एवं नौकरशाही के एक चाटुकार वर्ग में व्यापक भ्रष्टाचार जिसकी वजह से भाजपा को इस चुनाव में हुआ डैमेज का कंट्रोल डॉ. रमन सिंह चाह कर भी नहीं कर पाए। लेकिन प्रो-इनकमबैंसी डॉ. रमन सिंह के लिए अभी भी जीत का संदेश उनके कानों में कभी रात-कभी दिन में सुनाते रहता है जिसे वे गाहे-बगाहे मीडिया वालों से शेयर करते हैं। लेकिन छत्तीसगढ़ के इस बीते महाभारत में अजीत जोगी और उनके पुत्र अमित जोगी के मायने क्या है, यह एक ऐसा सवाल खड़ा है जो छत्तीसगढ़ के लिए सबसे बड़ा है। अजीत जोगी ने उम्र के इस पड़ाव पर जब उनकी शारीरिक क्षमता क्षीण होती गई और राजनीति का दिमाग तंदुरुस्त होता गया तो उनके पुत्र अमित जोगी ने छत्तीसगढिय़ों के साथ 15 वर्षों से हुए उपेक्षा को चुनाव का शस्त्र बना लिया। राजनैतिक विश्लेषक आज छत्तीसगढ़ में किसकी सरकार बनेगी यह डंके की चोट में दावा नहीं कर सकते, लेकिन डॉ. रमन सिंह और अजीत जोगी के बाद तीसरे नम्बर पर कांग्रेस के राहुल गांधी यह दावा करते हैं कि सरकार उनकी ही बनेगी। राष्ट्रीय हिन्दी मेल की यह संपादकीय न तो डॉ. रमन सिंह के खिलाफ और न ही राहुल गांधी के खिलाफ है, यह संपादकीय तो केवल इस बात का एहसास छत्तीसगढ़ की उस जनता को कराने के लिए है कि छत्तीसगढ़ में अजीत जोगी और अमित जोगी के मायने क्या है, इसे समझने की जरुरत है। आप ही बताइए जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ क्यों और किसलिए अजीत जोगी ने बनाया। सवाल का उत्तर आपके पास भी नहीं है लेकिन अजीत-अमित जोगी के पास जरुर है। ये दोनों पिता-पुत्र राजनीति में पारंगत हों या न हों लेकिन इनका समर्पण छत्तीसगढिय़ों के लिए जितना सामने आया भले माध्यम 2018 का विधानसभा का चुनाव ही क्यों न हो, वह किसी नेता में खुलकर नहीं दिखा। डॉ. रमन सिंह ने गरीबों के लिए, किसानों के लिए, जवानों के लिए क्या कुछ नहीं किया, फिर भी एंटी-इनकमबैंसी क्यों? सवाल के जवाब में संपादकीय यह कहती है कि आज की तारीख में डॉ. रमन सिंह भले ही लगभग 42 सीटों पर, राहुल गांधी 40 सीटों पर और अजीत-अमित 5 तथा बहुजन समाज पार्टी 3 को मिलाकर 8 पर खड़े होने का संकेत देते हैं तो फिर अजीत जोगी और अमित जोगी के मायने महत्वपूर्ण क्यों नहीं होंगे। अजीत जोगी की पत्नी रेणु जोगी चुनाव जीते अथवा हारे, लेकिन सोनिया गांधी, राहुल गांधी से उनके तार कितने गहरे हैं, इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता। अमित जोगी भले चुनाव न लड़े हों, लेकिन अपनी पत्नी ऋचा जोगी को लड़ाकर वहां की सीट सुरक्षित नहीं की होगी, ऐसा हो नहीं सकता। सतनामी समाज, गरीब समाज, युवा बेरोजगार पूरे चुनाव में यदि किसी की बात अच्छी तरह से समझते थे तो उसमें केवल दो ही नाम था, पहला नाम अजीत जोगी का और दूसरा नाम अमित जोगी का। हम तो यह भी लिखने को तैयार हैं कि 2018 के विधानसभा चुनाव में अजीत जोगी किंग बने या किंगमेकर, या कुछ भी न बने, तो भी राहुल गांधी और डॉ. रमन सिंह को यह समझ लेना चाहिए कि छत्तीसगढ़ की 11 लोकसभा सीटों पर अजीत जोगी-अमित जोगी प्रभाव छोड़े बिना रह नहीं पाएंगे। यह तो वक्त बताएगा कि जोगी किसके साथ जाएंगे। कुरान और गीता की कसम खाने से राजनीति बदल जाती है ऐसा नहीं है, राजनीति तो छत्तीसगढ़ में अब वही चलेगी जो ‘छत्तीसगढिय़ों की बात करेगा, वहीं यहां पर राज करेगाÓ इसलिए छत्तीसगढ़ में जोगीसार गांव का जोगी परिवार भले ही ‘घर का जोगी जोगड़ा-आन गांव का सिद्धÓ के मुहावरों से नवाजा जाए, लेकिन असलियत यह है कि इनके होने के मायने को समझना ही होगा।