जल्द भरी जाएंगी वर्षो से खाली पड़ी अल्पसंख्यक कमेटियां

हज कमेटी, मसाजिद कमेटी, वक्फ बोर्ड से उर्दू अकादमी तक सभी का हाल एक जैसा

साकिब कबीर

भोपाल। प्रदेश में नई सरकार का गठन चुका है अब अल्पसंख्यकों के अपने ओहदेदारों के इंतजार में है। दरअसल लंबे वक्त से खाली पड़े होने से यहां होने वाली कारगुजारीयों पर असर पड़ रहा है जिसकी वजह से यहां काम सही तरीके नहीं हो पा रहा है। मसलन हज कमेटी जो कि प्रदेश की सबसे बड़ी धार्मिक यात्रा को करने वाली महत्वपूर्ण संस्था है, जिसमें कई सालों से चेयरमैन की कुर्सी खाली है। इधर मसाजिद कमेटी में अध्यक्ष नहीं है, वहीं मप्र उर्दू अकादमी पूरी तरह से खाली है। ऐसे में अल्पसंख्यकों के लिए सरकार की कल्याणकारी योजनाएं और उनकी उन्नति से जुड़े मामले को लेकर अल्पसंख्यक परेशान हो रहे हैं।लेकिन अब प्रदेश में नई सरकार के गठन के बाद इस बात की उम्मीद बढ़ी है कि इन संस्थानों में जल्द नियुक्तियां करदी जाएंगी।
हज कमेटी, न चेयरमैन, न ही मेंबर
हज कमेटी में तो न तो चेयरमैन है और न ही मेंबर। आलाम यह है कि यहां पर लगभग आठ माह से पूरी हज कमेटी ही खाली है। वो भी उस वक्त पर जब कमेटी का हज ऑपरेशन शुरू हो चुका है। कमेटी में मेंबर और चेयरमैन की नियुक्तियां नहीं होने के वजह से यहां के अधिकारी और कर्मचारी अपने मन मुताबिक काम करते हैं, जिसकी वजह से लोगों को काफी परेशानी का सामना करना पड़ता है।
चार साल से खाली है मसाजिद कमेटी
मसाजिद कमेटी भोपाल, सीहोर, रायसेन की मस्जिदों की देखभाल, इमाम, मोज्जिमों की तन्खाह आदि तय किए जाते है, लेकिन यहां के हालत ऐसे है कि पिछले चार सालों से यहां न तो अध्यक्ष की नियुक्ति हुई और न ही सचिव की। साथ ही यहां पर तीन मेंबर के पद भी खाली है। लेकिन कमेटी का इन ओर कोई ध्यान ही नहीं है।
पूरी तरह खाली उर्दू अकादमी
यहां के हालात भी बद से बदतर है क्योंकि उर्दू अकादमी पहले अल्पसंख्यक विभाग के अंतर्गत संचालित की जाती थी, लेकिन अब यह संस्कृति विभाग के मध्य कार्यरत हो रही है। फिर भी यहां पर ढाई साल से अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और मेंबर्स के पदों पर नियुक्ति नहीं हो पाई है। जबकि यहां तो पिछले ढाई साल से कोई भी नियुक्ति ही नहीं हुई है।
वक्फ बोर्ड और अल्पसंख्यक कल्याण समितियां
वक्फ बोर्ड में तो अध्यक्ष के अलाव मेम्बरों की नियुक्तियां आज तक नहीं हुईं हैं, गौर करने वाली बात तो यह है कि अध्यक्ष की नियुक्ति भी हाई कोर्ट के आदेश के बाद की गई थी। वहीं दूसरी तरफ अल्पसंख्यक कल्याण समितियां जो जिला एवं राज स्तरीय होती हैं, यह भी पूरी तरह से उदासीनता का शिकार हैं।
अधिकारियों की हो रही मौज
जहां-जहां भी अल्पसंख्यक कमेटियों में नियुक्तियां नहीं हो रही हैं, वहां पर पूरा काम ही अधिकारी देख रहे हैं या यूं कहें कि अधिकारियों की इन दिनों मौज हो रही हैं। वह हर काम मनचाहे अंदाज से करते हैं, क्योंकि न तो इन पर कोई निगरानी रखने वाला है और न ही इनका कोई सर्वेसरवाह है।

इनका कहना है
विधानसभा सत्र समाप्त होने के बाद समीक्षा की जाएगी। उसके बाद पॉलिसी बनाकर नियुक्तियां की जाएगी।
आरिफ अकील,
अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री, मध्यप्रदेश