न्यू ईयर सबको मुबारक

न्यू ईयर तो सब बनाते ही हैं खैर आजकल इसका मनाने का तरीका भी लोगो ने बदल दिया हैं देखकर ऐसा लगता हैं जैसे की न्यू ईयर भी क्लास थ्योरी का पालन कर रहा हो उच्च वर्ग वाले लोग विदेशो में हॉलिडे मनाते हैं मध्यम वर्ग वाले देश में पार्टी और वंचित वर्ग वाले इन्हें देखकर अपना न्यू ईयर सेलिब्रेट करते हैंऔर अगर लोगो की निजी जि़ंदगियों में न्यू ईयर मनाने के तरीके को देखा जाए तो उसके तरीके भी अलग हैं कुछ लोग सड़कों , चौराहों पर लिख कर मानते हैं , कुछ पार्टिया करकर , कुछ घूमने निकल जाते हैं , और कुछ फैमिली के साथ समय बिताकर पर क्या ये लोग जो भी इसे सेलिब्रेट करते हैं वे एक दो बार और भी साल में ऐसा करते हैं क्योंकि उनकी जि़न्दगी को देख कर तो ऐसा लगता हैं जैसे उनकी जो इसे मनाने की खुशी हैं वो केवल इसलिए हैं की ये न्यू ईयर हैं और इसे तसस्ली के लिए मनालो वरना इससे ज्यादा कुछ नहीं और फिर साल भर वहीं सब कुछ जो पहले से करते आए हैं क्योंकि अगर ये लोग वाकई खुश हैैं तो तमाम तरह की रिपोर्ट जो साल भर बड़ी मेहनत के बाद प्रिंट होती है वो न हो जिनमे भुखमरी से लेकर आत्महत्या तक की रिपोर्ट होती हैं कयोकि खुशी के समक्ष ये सब चीजे नही होती फिर भी कुछ आशावादी इसे दुनिया का दस्तुर कहेंगे की लोगो की अगर जरूरतें अलग हैं तो ये सब तो स्वाभाविक ही हैं।पर जैसे भी हो ये हम पर निर्भर करता हैं कि पिछले सालो के किये गए कामों को हम नए साल में किस तरीके से लेते हैंक्या हम अपनी आदतों को बदल देते हैं , क्या हम अपने रिश्ते बदल लेते हैं , क्या अपनी छोटी सोच बदल लेते हैं। वैसे हैं क्या जो हम न्यू ईयर में बदलते हैं देखा जाय तो कुछ नहीं क्योंकि जो हम बदलते हैं वह बस एक चीज़ हैं। “कैलेंडर” क्योंकि उसकी तारीके ही हैं जो हमें बताती हैं की न्यू ईयर आ गया हालाँकि वो बात अलग हैं की हम नए कैलेंडर पर निशान भी पुराने कैलेंडर की तरह लगाते हैं जिस से साफ जाहिर होता हैं की नया साल हमारे लिए सिर्फ एक ख्याल है न की हमारे मन में, आदतों में या फिर हमारे वयव्हार में बसी कोई अवधारणा जो हमें इसका सही मतलब बताए और वैसे भी हम इसें ख्याल की तरह ही तो मनाते है और खयाल तो गुजरते हुए समय मे सिर्फ थोडी देर की ही दस्तक होता है जिसकी आवाज बस हमारे कानों तक जाती है मन तक नहीं ।मुद्दे की बात तो ये हैं की हमें हमेशा याद रखना चाहिए कि हमारा आने वाला कल हमारे बीते हुए कल का ही परिणाम हैं यदि हमें उसे नया रूप देना हैं तो हमें पहले पिछले कल को नया बनाना होगा। यानि कि आज को नया बनाना होगा तब कही जा कर आने वाला कल नया बनेगा हम भले ही थोड़ी देर के लिए हर्षोउल्लास में अपनी पिछली कमियों ,बुराईओं को भूल जाये पर सवाल तो ये हैं की क्या हकीकत से इंकार करना हमें बेहतर इंशान बना देता हैं सोचे तो नहीं बनाता क्योंकि हम वो ही कल होंगे जो कल थे इसलिए नए शब्द का सही मतलब जानकर और उसे साल के साथ जोड़कर सही ढंग से मनाना ही हमें मानव होने का प्रमाण देगा और हमारे नए साल को बेहतर बनाएगा