यस चीफ मिनिस्टर मध्यप्रदेश में लागू होगा पुलिस आयुक्त प्रणाली…?

प्रदेश में बढ़ते अपराधों को नियंत्रित करने के लिए दिल्ली, मद्रास, मुंबई, कलकत्ता की तर्ज पर जरूरी है पुलिस आयुक्त प्रणाली इसलिए

विशेष रिपोर्ट
विजय कुमार दास

हमारी अधिकांश प्रशासनिक और राजनीतिक संरचनाओं का निर्माण उस दौर में हुआ जब ब्रिटिश साम्राज्यवाद का सूर्य अपने प्रताप पर था। वैचारिक और शारीरिक दोनों ही स्तरों पर कोई उन्हें चुनौती देने की स्थिति में न था। लॉर्ड कजऱ्न, किचनर, मॉड डाइवर, फ्लोरा एनी स्टील, साराह डंकन जैसे तमाम नौकरशाह इस जमात का हिस्सा थे जो दिन रात ब्रिटिश साम्राज्यवादी मंसूबों को जायज और न्यायोचित ठहराते थे। कमोबेश वही स्थिति मध्यप्रदेश में पुलिस आयुक्त प्रणाली को लागू करने में भी दिखी। तभी तो सूबे का मुखिया 27 मार्च 2012 को राज्यपाल के अभिभाषण पर जबाब देते हुए प्रदेश में पुलिस आयुक्त प्रणाली लागू कर देने की घोषणा तो कर देता है लेकिन मध्यप्रदेश की नौकरशाही ने सत्ता जाते तक अपने मुख्यमंत्री के लोकतंत्र के सर्वोच्च मंदिर में की गयी घोषणा को केवल अहम् और अधिकारों में संभावित विभाजन के कारण लागू नहीं होने दिया। अब बढ़ते महिला अपराध और कानून व्यवस्था के मुद्दे पर जीरो टालरेन्स की नीति का पुरजोर हिमायत करने वाले मुख्यमंत्री कमलनाथ मध्यप्रदेश में पुलिस आयुक्त प्रणाली लागू करने की अपनी मंशा जाहिर कर चुके हैं और बताया जा रहा है कि इसका ड्राफ्ट अंतिम स्थिति में है। हालांकि इसके पहले पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान कई बार इस प्रणाली की हिमायत कर इसे अमली जामा पहनाने की कोशिश कर चुके हैं लेकिन प्रदेश में अमरबेल की तरह फ़ैल चुकी नौकरशाही वो भी वरिष्ठ नौकरशाह महेश नीलकंठ बुच को अपना आदर्श मानने वाले वर्तमान अति मुख्य सचिव मनोज श्रीवास्तव ने हर मौके पर पुलिस आयुक्त प्रणाली पर विरोध दर्ज कराते हुए इसे बेमानी करार दिया। अब प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ ने दूसरे राज्यों से फीडबैक लेकर इस प्रणाली को लागू करने पर गंभीरता से विचार कर रही है। पिछले 35 सालों से समय-समय पर दोनों पार्टियों की सरकारों ने ऐसी घोषणाएं की हैं। संक्षेप में कहें तो इस प्रणाली में बड़े शहरों में पुलिस को कार्य पालिक मजिस्ट्रेट के अधिकार प्राप्त हो जाते हैं। कानून व्यवस्था से निपटने के लिए अधिकार, प्रतिबंधात्मक कार्यवाही तथा आर्म्स एक्ट के अधिकार उन्हें आ जाते हैं। दूसरे शब्दों में पुलिस जिन कामों के लिए उत्तरदायी है उन्हें पूरा करने के अधिकार उसे मिल जाते है। गम्भीर दंगों की स्थिति में पुलिस त्वरित कार्यवाही कर सकती है। 19 वीं शताब्दी के मध्य में अंग्रेज़ों ने भारत में जो पुलिस व्यवस्था कायम की वह आज भी ज्यों की त्यों है। उस समय अधिकांश अंग्रेज जनसंख्या केवल 3 प्रेसिडेंसी महानगर कलकत्ता, मद्रास और बंबई में रहती थी और उन्होंने अपने प्रोविंस में ही लागू की थी। बाद में यह दक्षिण के कुछ और शहरों में लागू हुई। राष्ट्रीय पुलिस आयोग की अनुशंसा के मुताबिक इस प्रणाली को 5 लाख से अधिक आबादी वाले सभी शहरों में लागूकरने की थी। पिछले एक डेढ़ दशक में इसका बहुत विस्तार हुआ है।अभी देश के साठ से अधिक प्रमुख शहरों में यह प्रणाली लागू है।मध्यप्रदेश समेत अधिकांश हिंदी भाषी राज्य इस मामले में पीछे नजर आते हैं।यह प्रणाली लागू करने के लिए पहले भी कई बार प्रयास हुए, लेकिन कथित तौर पर प्रशासनिक अधिकारियों के विरोध के कारण यह प्रणाली अभी तक इस राज्य में लागू नहीं हो पाई। यह प्रणाली लागू होने से वरिष्ठ पुलिस अधिकारी के पास ही दंडाधिकारीय शक्तियां आ जाएंगी, जिससे अपराधों पर नियंत्रण लगाने तथा अपराधियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने में पुलिस प्रशासन को मदद मिलेगी।यहाँ यह भी लिखना जरूरी है कि पुलिस सुधारों की दिशा में 1861 का पुलिस एक्ट एक बहुत बड़ी बाधा रहा है। इस एक्ट को बदलने और इसके स्थान पर नई लोकतांत्रिक आकांक्षाओं को व्यक्त करने वाले प्रणाली की मांग समय समय पर होती रही है। 1977 से 1981 के मध्य राष्ट्रीय पुलिस आयोग ने पुलिस को अधिक जबाबदेह बनाने और उसे अधिक कार्यकारी शक्तियां प्रदान करने के लिए सिफारिशें प्रस्तुत कीं। उसके बाद कई आयोग और कमेटियां गठित हुईं। 1998 में रिबेरो कमेटी, 2000 में पद्मनभैया कमेटी, 2003 में मलिमथ कमेटी, 2005 में पूर्व अटॉर्नी जनरल सोली सोराबजी की अध्यक्षता में गठित मॉडल पुलिस एक्ट ड्राफ्टिंग कमेटी, 2007 में गठित द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग। इन सभी आयोगों और कमेटियों ने सामान्य रूप से इस बात पर सहमति जताई है कि पुलिस की संरचना में खासतौर से बड़ी आबादी वाले शहरी क्षेत्रों में बुनियादी बदलाव की जरूरत है। 2006 में सोली सोराबजी की अध्यक्षता में गठित कमेटी ने 1861 के पुलिस एक्ट को प्रतिस्थापित करने के उद्देश्य से एक मॉडल पुलिस एक्ट प्रस्तावित किया। इस नए एक्ट के आधार पर देश के 17 राज्यों ने 1861 के पुलिस एक्ट को छोड़कर नए पुलिस रेगुलेशन बनाये हैं। इस कमेटी ने यह सुझाव भी दिया है कि 10 लाख से अधिक जनसंख्या वाले शहरी क्षेत्रों में पुलिस आयुक्त प्रणाली को स्थापित करने पर विचार किया जाए।अब चूँकि प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ ने लगभग यह मंशा व्यक्त कर दी है तो जाहिर है कि पुलिस महकमे के आला अफसरों में स्फूर्ति आ गयी है। सच की साख पुलिस की साख से जुड़ी है। इसे गिरने से रोकना पुलिस की सबसे बड़ी चुनौती है यही वजह है कि अब सारे पुराने अनुभवों को सामने लाते हुए कमलनाथ नौकरशाही को संतुष्ट करते हुए वर्षों पूर्व की पुलिस की अभिलाषा को पंख लगाएंगे।जहाँ तक सवाल हैआईपीएस एसोसिएशन का और वरिष्ठ पुलिस अधिकारी पुलिस महानिदेशक ऋषिकांत शुक्ल , विशेष पुलिस महानिदेशकशैलेन्द्र श्रीवास्तव ,विशेष पुलिस महानिदेशक महान भारत सागर,अति पुलिस महानिदेशक राजीव टंडन तो इन सभी का मानना है कि मध्यप्रदेश में पुलिस आयुक्त प्रणाली लागू करने में हमारा राज्य 38 साल पीछे हो गया है और अब जरूरत है कि मुख्यमंत्री के निर्देश का जब नौकरशाही कहे ‘यस चीफ मिनिस्टर हम प्रदेश में पुलिस आयुक्त प्रणाली लागू करेंगे।Ó संपादक होने के नाते मेरा यह विश्वास है कि मुख्यमंत्री कमलनाथ ने यदि पुलिस के चेहरे को ज्यादा से ज्यादा जनउपयोगी बनाने का फैसला कर लिया तो फिर मुख्य सचिव सुधि रंजन मोहंती भी यही कहेंगे यस चीफ मिनिस्टर पुलिस आयुक्त प्रणाली मध्यप्रदेश में लागू होगा।