विधायिका से साढ़े सात करोड़ लोगों की जनअपेक्षा

विशेष टिप्पणी
सुनील दत्त तिवारी

आज से मध्यप्रदेश की साढ़े सात करोड़ जनता की महापंचायत नए कलेवर और नए तेवर के साथ आहूत होगी। पंद्रहवीं विधानसभा का यह पहला सत्र वैसे तो कहने को औपचारिक है, क्योंकि इसमें अन्य सत्रों की तरह प्रश्काल, शून्यकाल, ध्यानाकर्षण जैसे संसदीय व्यवस्थाएं नहीं होंगी। माननीय विधायकों का शपथ ग्रहण, विधानसभा अध्यक्ष का चयन, महामहिम का अभिभाषण और सभवतया अनुपूरक बजट ही पेश किया जाना प्रस्तावित है। हाल ही में संपन्न हुए विधानसभा चुनाव के बाद इस बार विधानसभा के अंदर बदलाव दिखेगा ही, जो कभी सत्ता पक्ष में बैठकर नीति संचालन और निर्धारण करते थे, उन्हें कमोबेश विपक्ष में बैठने का जनादेश मिला है। जो पिछले तीन बार से विपक्ष में बैठे थे, उन्हें बहुमत तो नहीं पर महामहिम के आदेश से सरकार चलाने का मौका मिला है। एक लम्बे अंतराल के बाद मध्यप्रदेश में सत्ता पक्ष और विपक्ष में संख्या बल के आधार पर बड़ी बारीक रेखा दिखाई देती है और यही शायद लोकतंत्र की खूबसूरती भी है कि .1 फीसदी ज्यादा वोट पाकर भी भारतीय जनता पार्टी सीटों की गिनती में पिछड़ गई। बस, सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच इसी संख्या बल को आधार मानते हुए इस बार प्रदेश में बेहतर सत्ता संचालन की आस बंध रही है। प्रचंड बहुमत की सरकारें किस प्रकार निरंकुश होकर और विपक्ष को रौंदते हुए मनमर्जी से अपने एजेंडे को जनहित के नाम पर थोपती हैं, इसकी बानगी कई बार आजाद हिन्दुस्तान में कई राज्यों में देखने को मिली है। लेकिन मध्यप्रदेश के समझदार मतदाताओं को 2018 के विधानसभा चुनाव में दिए जनादेश के लिए इस्तकबाल करने को दिल करता है। प्रदेश की जनता ने अपना शासक भी चुन लिया और उस पर अंकुश लगाने के लिए मजबूत पहरेदार भी खड़ा कर दिया। अब जरूरत है तो प्रदेश में सत्ता पक्ष और विपक्ष को अपनी अपनी भूमिका को रेखांकित करते हुए प्रदेश की बेहतरी के लिए काम करने की। यदि हम बात करें तो पिछले डेढ़ दशक में प्रदेश की गौरवशाली और सम्पन्न संसदीय कार्रवाई में गिरावट आई है। 14वीं विधानसभा में कुल 135 बैठकें ही हो पाई जो कि 27 दिन प्रतिवर्ष का औसत है। वहीं 13वीं विधानसभा में 167 बैठकों के साथ यह आंकड़ा 34 बैठक प्रतिवर्ष है। यह उस प्रदेश के लिए अत्यंत ही दुर्भाग्यजनक है जहाँ की गौरवशाली संसदीय व्यवस्था रही है और बताया जाता है कि एक दौर वो भी था, जब आधी रात तक सदन की कार्यवाही चलती रहती थी और सदस्य पूरे मनोयोग से चर्चा में हिस्सा लेते थे। लेकिन पिछले कुछ समय से यह परिपाटी टूटती दिख रही है। अब माननीय गण चर्चा में कम और बहिर्गमन में ज्यादा भरोसा रखते हैं तभी तो 2018 में केवल 30 प्रतिशत ही प्रश्नों पर मौखिक चर्चा संभव हुई। वैसे प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ ने कांग्रेस के वचन पत्र में शामिल महत्वपूर्ण वायदों को जनभावनाओं के अनुरूप पूर्ण करना शुरू कर चुके हैं, यह स्वागत योग्य कदम है कम से कम दो लाख रुपये तक के कर्जमाफी की घोषणा को सरकार ने किसानों की मांग पर कट ऑफ डेट बढ़ाकर 12 दिसंबर 18 कर दिया। बालिका विवाह के लिए दी जाने वाली राशि भी बढ़ा दी, ग्वालियर व्यापार मेले के पुराने गौरव को वापस लाने रोड टैक्स में 50 प्रतिशत की छूट जैसी अनेक उपलब्धि इस अल्पावधि में सरकार ने करते हुए अपने इरादे तो स्पष्ट कर दिए लेकिन 15 सालों तक सत्ता से दूर रहने वाली पार्टी के कुछ मंत्री और विधायक उत्साह के अतिरेक में ऐसी बयानबाजी कर रहे हैं, जिससे कम से कम शुरूआती दौर में बचा जा सकता है। जनता की अपेक्षा पूर्ण करने की बजाय अनर्गल और उद्देश्यरहित आक्षेप लक्ष्य में भटकाव पैदा करेंगे और जिसका प्रतिबिम्ब विधानसभा सत्रों के दौरान दिखाई भी पड़ेगा। वैसे भी 14 वीं विधानसभा की कड़वी यादें अभी तक जीवित हैं, जब आपसी मनमुटाव इस हद तक बढ़े कि अंतिम सत्र की अंतिम बैठक में समूह फोटो की रस्म अदायगी भी नहीं हुई। अपने मताधिकार का प्रयोग करने वाला हर व्यक्ति इस कद्र व्यग्र है कि वह सरकार से अपेक्षा करता है कि उसके दु:ख-दर्द दूर हों और वह बेहतर जीवन जीने के स्वप्न को साकार कर पाए। जनादेश जन के विश्वास पर टिका होता है। उसे जन शिकायतों के निवारण व विकास में रूपांतरित करना चुने हुए जनप्रतिनिधियों का कर्त्तव्य है और इसके निर्वहन की अपेक्षा स्वाभाविक है। पांच साल तक सत्ता सुख भोगने के बाद जब हमारे विधायक, मंत्री और मुख्यमंत्री तक अपने वादों, घोषणा पत्र और लोगों की अपेक्षाओं पर खरा उतरने की बजाय फेल हो जाते हैं, तो जनता बदलाव चाहती है। भ्रष्टाचार में लिप्त, निकम्मे व कामचोर जनप्रतिनिधियों को लोग सत्ता से बाहर का रास्ता दिखाने की भूल नहीं करते। प्रत्येक मतदाता को नई सरकार से यह अपेक्षा है कि जनप्रतिनिधि लोगों के प्रति संवेदनशील हों और उनका अपने-अपने हलके में लगातार जनसंपर्क बना रहे और वे समस्याओं को हल करने के लिये कटिबद्ध रहें। सबसे बड़ी अपेक्षा बेरोजगारी दूर करने की है। दस लाख युवाओं को कैसे रोजगार मिले। नई सरकार के सामने एक बड़ी चुनौती है। सरकार लोगों को स्वरोजगार के लिए प्रेरित करे और उसके लिए आधारभूत ढांचा तैयार करे। युवा सरकारी नौकरियों के पीछे न दौड़ें। संभव है और इस मामले में अति आशावादी हूँ मुझे लगता है परिपक्व होते लोकतंत्र के साथ प्रदेश के राजनेता भी अब जनता की नब्ज को भांपने में पारंगत हो गए हैं और जो तुमको हो पसंद वही बात कहेंगे की तर्ज पर इस बार मध्यप्रदेश की सबसे बड़ी चौपाल में हंगामा भी होगा, बहिर्गमन भी होगा, नारे बाजी भी होगी, मत विभाजन भी होगा और आरोप-प्रत्यारोप भी लगाए जाएंगे, लेकिन इस सभी के मूल में प्रदेश की जनता ही होगी। सार्थक पहल और बहस से जनआवाज के पालन-पोषण में हमारी विधानसभा अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत करेगी। इन्हीं भाव के साथ आज अपने जनसेवा का शपथ लेने वाले सभी माननीयों को शुभकामनाएं।