सवर्णों को 10% आरक्षण

अब नरेंद्र मोदी ने जेपी की मांग को किया पूरा

नई दिल्ली/भोपाल, 7 जनवरी। आम चुनावों से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक बड़ा गेम चेंजर निर्णय लेते हुए अपने आप को जयप्रकाश नारायण की विचारधारा से जोड़ दिया। सामान्य वर्ग के आर्थिक तौर पर कमजोर तबके को आरक्षण देने की सबसे पहले आवाज लोक नायक जयप्रकाश जी ने सम्पूर्ण क्रांति के माध्यम से की थी। दरअसल आर्थिक आधार पर आरक्षण का दांव संघ की भी पुरानी सोच रही है।
कई मौकों पर इस बारे में संघ ने मजबूती से वकालत की है। मोदी सरकार ने इसी पुरानी मांग को सावधानीपूर्वक लागू करने की बड़ी पहल की। सरकार की कोशिश है कि इससे यह कतई संदेश नहीं जाए कि वह बाकी के आरक्षणों में छेड़छाड़ करेगी। अभी गुजरात में भी इसे लागू किया गया था। वहां गरीब सवर्णों को 10 फीसदी आरक्षण है। राज्य में पाटीदारों के आरक्षण की मांग को लेकर हुए आंदोलन के बाद राज्य सरकार ने 2016 में गरीबों के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण की घोषणा की थी। पूरे देश में लगभग 13 फीसदी सवर्ण हैं और वे लगभग 50 लोकसभा सीटों को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं। इसके अलावा सरकार आरक्षण के इस दांव से देश के अलग-अलग हिस्सों में चल रहे आरक्षण आंदोलन को भी काउंटर करना चाह रही है। इस आरक्षण के दायरे में मराठा सहित तमाम समुदाय के गरीब लोग आ सकेंगे। मोदी सरकार का यह दांव सवर्णों की ओर से आम चुनाव में नोटा को वोट देने की अभियान को समाप्त करने को लेकर है। सुप्रीम कोर्ट के एससी-एसटी कानून में बदलाव को आर्डिनेंस से निरस्त करने के बाद से ही पूरे देश में सवर्ण मोदी सरकार और बीजेपी से नाराज चल रहे थे। मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव में मिली हार के पीछे एक कारण सवर्णों की नाराजगी को भी माना गया। अब सरकार और बीजेपी को उम्मीद है कि यह नाराजगी आम चुनाव तक दूर हो जाएगी। मोदी सरकार ने लोकसभा चुनाव से पहले बड़ा दांव चलते हुए सामान्य वर्ग के गरीबों के लिए सरकारी नौकरी और शिक्षा में 10 फीसदी आरक्षण के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। सोमवार को केंद्रीय कैबिनेट की बैठक में इस प्रस्ताव को पास किया गया। केंद्र सरकार आरक्षण के इस नए फॉर्मूले को लागू करने के लिए आरक्षण का कोटा बढ़ाएगी। बता दें कि भारतीय संविधान में आर्थिक आधार पर आरक्षण की कोई व्यवस्था नहीं है। ऐसे में सरकार के पास गेमचेंजर माने जा रहे मूव को अमलीजामा पहनाने के लिए संविधान संशोधन ही एकमात्र रास्ता है। सूत्रों के मुताबिक आरक्षण का कोटा मौजूदा 49.5 प्रतिशत से बढ़ाकर 59.5 प्रतिशत किया जाएगा। इसमें से 10 फीसदी कोटा आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों के लिए होगा। बता दें कि लंबे समय से आर्थिक रूप से पिछड़े सामान्य वर्ग के लिए आरक्षण की मांग की जा रही थी। मीडिया रिपोर्ट की मानें तो जिन लोगों की पारिवारिक आय 8 लाख रुपए सालाना से कम है, उन्हें ही इसका फायदा मिलेगा। इसके साथ ही इसके लिए शहर में 1000 स्क्वेयर फीट से छोटे मकान और 5 एकड़ से कम की कृषि भूमि की शर्त भी रखे जाने की खबरें हैं।
अभी कई बाधाएं सामने आएंगी
केंद्र सरकार ने सामान्य वर्ग के आर्थिक तौर पर कमजोर तबके को 10 फीसदी आरक्षण देने की घोषणा की है। कैबिनेट ने यह फैसला लिया है। लेकिन कानूनी जानकार बताते हैं कि सुप्रीम कोर्ट ने रिजर्वेशन के लिए 50 फीसदी की सीमा तय कर रखी है और अगर रिजर्वेशन का आंकड़ा 50 फीसदी को पार करता है तो निश्चित तौर पर मामला जूडिशल स्क्रूटनी के लिए सुप्रीम कोर्ट के सामने आएगा और फिर स्क्रूटनी में ऐसे फैसले का टिकना मुश्किल है। कानूनी जानकार और सुप्रीम कोर्ट के एडवोकेट एम.एल. लाहोटी बताते हैं कि सबसे पहले देखना होगा कि सुप्रीम कोर्ट ने 1992 में इंदिरा साहनी जजमेंट जिसे मंडल जजमेंट कहा जाता है उसमें क्या व्यवस्था दे रखी है। जजमेंट के मुताबिक सरकार 50 फीसदी से ज्यादा रिजर्वेशन नहीं दे सकती। सुप्रीम कोर्ट के 9 जजों की बेंच ने ऐतिहासिक फैसले में कहा था कि रिजर्वेशन की लिमिट 50 फीसदी की सीमा क्रॉस नहीं कर सकती। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि संविधान के अनुच्छेद-16 (4) कहता है कि पिछड़ेपन का मतलब सामाजिक पिछड़ेपन से है। शैक्षणिक और आर्थिक पिछड़ेपन, सामाजिक पिछड़ेपन के कारण हो सकते हैं, लेकिन अनुच्छेद-16 (4) में सामाजिक पिछड़ेपन एक विषय है।
अगर रिजर्वेशन में कोई सरकार 50 फीसदी की सीमा को पार करती है तो वह जूडिशल स्क्रूटनी के दायरे में होगा और जो मौजूदा संवैधानिक व्यवस्था है उसमें टिक पाना मुश्किल है। एम.एल. लाहोटी का कहना है कि पहले भी कई बार राज्य सरकारों ने रिजर्वेशन के मसले पर 50 फीसदी की सीमा को पार किया था। राजस्थान सरकार ने भी स्पेशल बैकवर्क क्लास को रिजर्वेशन देते हुए 50 फीसदी की सीमा को पार किया था। तब मामला सुप्रीम कोर्ट के सामने आया था और सुप्रीम कोर्ट ने रिजर्वेशन को खारिज कर दिया था। वहीं दिसंबर 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्बे हाई कोर्ट के उस आदेश में दखल देने से इनकार कर दिया था जिसमें हाई कोर्ट ने मराठाओं को नौकरी और शैक्षणिक संस्थाओं में 16 फीसदी रिजर्वेशन देने के महाराष्ट्र सरकार के फैसले पर रोक लगा दी थी। रिजर्वेशन कोटे को 73 फीसदी कर दिया था। हाई कोर्ट ने कहा था कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के मुताबिक रिजर्वेशन कुल सीट में से 50 फीसदी से ज्यादा नहीं हो सकता। वहीं संवैधानिक मामलों के जानकार व लोकसभा के रिटायर सेक्रेटरी जनरल पी.डी.टी. अचारी बताते हैं कि संविधान में अनुच्छेद-16 के तहत समानता की बात करते हुए सबको समान अवसर देने की बात है।
यह संविधान के बेसिक स्ट्रक्चर का पार्ट है। अगर 50 फीसदी सीमा पार करते हुए रिजर्वेशन दिया जाता है और इसके लिए संविधान में संशोधन किया जाता है या फिर मामले को 9वीं अनुसूची में रखा जाता है कि उसे जूडिशल स्क्रूटनी के दायरे से बाहर किया जाए तो भी मामला जूडिशल स्क्रूटनी के दायरे में होगा। दरअसल 9वीं अनुसूची में रखकर ऐसा कोई कानूनी या कानूनी संशोधन नहीं किया जा सकता, जो संविधान के बेसिक स्ट्रक्चर को डैमेज करता हो। केशवानंद भारती से संबंधित वाद में सुप्रीम कोर्ट के 13 जजों की संवैधानिक बेंच ने कहा था कि संविधान के बेसिक स्ट्रक्चर के साथ छेड़छाड़ नहीं किया जा सकता। अगर 50 फीसदी से ज्यादा रिजर्वेशन दिया जाता है तो जाहिर तौर पर संविधान के अनुच्छेद में दी गई व्यवस्था के विपरीत होगा, क्योंकि इसमें प्रावधान है कि समान अवसर दिए जाएं और इस तरह से देखा जाए तो मौलिक अधिकार के प्रावधान प्रभावित होंगे और वह बेसिक स्ट्रक्चर का पार्ट है। तमिलनाडु सरकार ने 69 फीसदी आरक्षण दिया था जिसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी और मामला अब भी सुप्रीम कोर्ट में पेंडिंग है।
चुनावी जुमला न साबित हो जाए?
सुप्रीम कोर्ट के सीनियर एडवोकेट के.टी.एस. तुलसी बताते हैं कि अदालत ने व्यवस्था दे रखी है कि 9वीं अनुसूची का सहारा लेकर अवैध कानून को प्रोटेक्ट नहीं किया जा सकता। अगर कोई कानून संवैधानिक दायरे से बाहर होगा तो उसे 9वीं अनुसूची के दायरे में रखकर प्रोटेक्ट नहीं किया जा सकता। साथ ही ऐसा कोई संवैधानिक संशोधन नहीं टिक पाएगा, जो बेसिक स्ट्रक्चर को छेड़छाड़ करता हो क्योंकि सुप्रीम कोर्ट केशवानंद भारती के केस में पहले ही व्यवस्था दे चुकी है कि बेसिक स्ट्रक्चर के साथ छेड़छाड़ नहीं किया जा सकता। ऐसे में सरकार ने जो फैसला लिया है और बिल अगर पास भी हो जाता है तो भी उसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जा सकेगी और मौजूदा कानूनी व्यवस्था में उसका टिकना मुश्किल है और इस तरह यह सिर्फ चुनावी जुमला साबित न हो जाए।
सियासी राह भी बेहद कठिन
कैबिनेट से मंजूरी मिलने के बाद संसद में सरकार को कई सवालों का सामना करना पड़ सकता है। हालांकि यह ऐसा मसला है जिस पर कोई राजनीतिक दल खुलकर विरोध नहीं करेगा बल्कि सपोर्ट ही करेगा। तमाम राजनीतिक दल और नेता पहले से ही आर्थिक रूप से आरक्षण कोटे की मांग उठाते भी रहे हैं। लेकिन सरकार के लिए चुनौती अब इसे लागू करने की होगी। सरकार ने इसका दांव खेलकर बड़ा जोखिम भी ले लिया है। विपक्ष ने शुरू से ही इसे जुमला कहना शुरू कर दिया। ऐसे में बाकी बचे दो महीने में आरक्षण के इस कदम को जमीन पर उतारने की चुनौती रहेगी