प्रजापति बनेंगे अध्यक्ष लेकिन निर्विरोध नहीं , कमलनाथ को आया गुस्सा

अब तो विधानसभा उपाध्यक्ष का भी उम्मीदवार उतारेगी कांग्रेस

 

 

विशेष संपादकीय
विजय कुमार दास

मध्यप्रदेश में पिछले 5 दशकों से एक गौरवशाली परंपरा रही है कि जब भी विधानसभा अध्यक्ष चुने जाते हैं तो संख्या बल के आधार पर जिस दल का बहुमत होता है, उस दल के विधायक विधानसभा अध्यक्ष के पद पर गरिमामय ढंग से निर्विरोध चुने जाते रहे हैं। परंतु आज मध्यप्रदेश की विधानसभा में यह गौरवशाली परंपरा तार-तार हो गई और मर्यादाओं को लांघकर भारतीय जनता पार्टी ने मध्यप्रदेश के कांग्रेस विधायक दल के नेता और मुख्यमंत्री कमलनाथ को दबाव में रहने के लिए अपने दल के वरिष्ठ विधायक पूर्व मंत्री विजय शाह को विधानसभा अध्यक्ष पद के लिए घोषित कांग्रेस उम्मीदवार नर्मदा प्रसाद प्रजापति के सामने चुनाव के लिए मैदान में उतार दिया है। परंपरा नहीं टूटे, इसलिए मुख्यमंत्री कमलनाथ ने कांग्रेस विधायक दल के नेता होने के नाते वरिष्ठ मंत्री ठा. गोविन्द सिंह और लोक निर्माण मंत्री सज्जन वर्मा को तालमेल बिठाने के लिए पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और नेता प्रतिपक्ष बने भाजपा के वरिष्ठ विधायक गोपाल भार्गव जिस बैठक में थे, वहां भेजकर यह अनुरोध किया कि मध्यप्रदेश की गौरवशाली परंपरा ना टूटे इसलिए यह बेहतर होगा कि कांग्रेस उम्मीदवार नर्मदा प्रसाद प्रजापति निर्विरोध विधानसभा अध्यक्ष चुने जाए। जैसा कि छत्तीसगढ़ राज्य की विधानसभा में डॉ. चरणदास महंत को अध्यक्ष चुनने के लिए वहां की भारतीय जनता पार्टी विधायक दल ने सौहाद्र्रपूर्ण वातावरण में डॉ. चरणदास महंत का प्रस्तावक बनकर उन्हें निर्विरोध चुनने का इतिहास बनाया है। सूत्रों के अनुसार मुख्यमंत्री कमलनाथ के दोनों वरिष्ठ मंत्री ठा. गोविन्द सिंह और सज्जन वर्मा के संदेश को मानने के लिए पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने निर्णय आलाकमान पर छोड़ा, जहां भारतीय जनता पार्टी के महासचिव कैलाश विजयवर्गीय की हठ की वजह से पार्टी ने फैसला किया कि भाजपा विधायक दल को विधानसभा अध्यक्ष पद के लिए अपना उम्मीदवार घोषित करना चाहिए और इसी के चलते विजय शाह को मैदान में अंतत: उतार दिया गया। पांच दशकों की परंपरा टूटी और अब मध्यप्रदेश की विधानसभा, जिसे साढ़े सात करोड़ जनता की आवाज एवं अपेक्षाओं को पूरा करने के लिए लोकतंत्र का मंदिर कहा गया है, आज से अब यह कुरुक्षेत्र बन जाएगा। भाजपा की रणनीति विजय शाह के मैदान में उतरने के बाद उजागर हो गई है कि वह मुख्यमंत्री कमलनाथ को हमेशा तनाव में और दबाव में रखना चाहेगी। लेकिन इधर मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ ने भाजपा के इस फैसले पर अपने राजनीतिक जीवन का पहला गुस्सा या यूं कहा जा जाए कि जिस कमलनाथ को कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष राहुल गांधी भोले भंडारी, अनुभवी और संसदीय ज्ञान के विद्वान मानते हैं, उनका तीसरा नेत्र खुल गया है। अब मध्यप्रदेश विधानसभा के कुरुक्षेत्र में विधानसभा अध्यक्ष के पद को लेकर चुनाव होंगे और कांग्रेस के उम्मीदवार नर्मदा प्रसाद प्रजापति की 100 प्रतिशत विजय सुनिश्चित है। लेकिन कमलनाथ के गुस्से का भारतीय जनता पार्टी को क्या-क्या नुकसान हो सकता है, इसका ऑकलन न तो कैलाश विजयवर्गीय कर पाएंगे और न ही डॉ. नरोत्तम मिश्रा, जो चाहते थे, कि उन्हें नेता प्रतिपक्ष विधानसभा बनाया जाए और वे नहीं बन पाए तो चुनाव में उनकी जोड़-तोड़ वाली भूमिका फिर से उजागर होगी, परंतु नुकसान का उन्हें अंदाजा कम ही है। संपादक होने के नाते और पिछले 4 दशकों से अधिक कमलनाथ की राजनीति को नजदीक से समझने के बाद मेरा यह दावा है कि जोड़-तोड़ में महारथ होने वाले कमलनाथ ऐसी राजनीति कभी नहीं करेंगे कि वे भाजपा से विधायकों को तोड़ें। परंतु भाजपा के ही संजय पाठक यदि 6 विधायकों के समर्थन से कमलनाथ का साहस बढ़ा दें और महारानी यशोधरा राजे सिंधिया गुस्से में 7 दिन की छुट्टी में चले जाएं, तो आखिर घाटा किसको है, यह भारतीय जनता पार्टी के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, भाजपा विधायक दल के नेता तथा नेता प्रतिपक्ष बन चुके गोपाल भार्गव को समझना ही होगा। अपेक्षा तो यह करना गैरवाजिब नहीं है कि विजय शाह स्वयं कल अपनी उम्मीदवारी वापस लेकर मध्यप्रदेश की गौरवशाली परंपरा को स्थापित करने के लिए आत्मा की आवाज से कदम उठा सकते हैं और उनके इस कदम में यदि पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव ने परिपक्वता का परिचय दिया तो कमलनाथ का गुस्सा ठंडा हो जाएगा। लेकिन यदि ऐसा नहीं हो सका तो इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि मुख्यमंत्री कमलनाथ कांग्रेस विधायक दल से नेता होने के नाते अपने दल का हित जरूर साधेंगे और गुस्से में यदि उन्होंने वरिष्ठ विधायक पूर्व मंत्री बिसाहूलाल सिंह अथवा पूर्व मंत्री केपी सिंह जैसे अनुभवी विधायक को विधानसभा उपाध्यक्ष पद के लिए मैदान में उतार दिया तो कोई बहुत आश्चर्य वाली घटना नहीं होगी। समझा जाता है कि कमलनाथ जी ने अपने सलाहकारों से यह पूछा था कि व्यावहारिकता के आधार पर क्या विधानसभा उपाध्यक्ष का पद विपक्षी दल भाजपा को दिया जा सकता है, तो सिद्धांतत: यह बात तय हो गई थी कि ऐसा करने में कोई हर्ज नहीं है। लेकिन अब तो यह बात भी तय हो गई है कि मुख्यमंत्री कमलनाथ कांग्रेस विधायक दल के नेता होने के नाते मध्यप्रदेश विधानसभा में उपाध्यक्ष पद के लिए भी अपना उम्मीदवार उतारेंगे।