मोदी के बाद अब सबसे बड़े नेता होंगे शिवराज

एनडीए की सरकार बनी तो उदार छवि और अनुभव के कारण

विजय कुमार दास
भोपाल, 11 जनवरी। मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को संघ की अनुशंसा पर राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया गया है। सामान्य तौर पर तो यह किसी भी राजनैतिक दल में होने वाली कार्य विभाजन की ही खबर हो सकती है, लेकिन शिवराज सिंह चौहान को राष्ट्रीय राजनीति में प्रतिस्थापित करने पीछे संघ की एक दूरदर्शी नीति बताई जा रही है। 2019 में देश में आम चुनाव प्रस्तावित हैं। जिस प्रकार के संकेत इन दिनों विभिन्न माध्यमों से मिल रहे हैं, वह यह बात पुष्ट करने को पर्याप्त हैं कि चुनावों में भारतीय जनता पार्टी की नहीं, एनडीए की सरकार बनने की ही संभावना ज्यादा है। यह बात खुद पार्टी के वरिष्ठ नेता भी स्वीकार कर रहे हैं कि इस बार के चुनावों में भाजपा को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलेगा। मतलब साफ है कि जब गठबंधन की मजबूरी की सरकार बनेगी, उस दौर में प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार को लेकर चलने वाली रस्साकशी से बचने और वैकल्पिक चेहरा प्रस्तुत करने के लिए ही शिवराज सिंह चौहान को केंद्र में बड़ी जिम्मेदारी सौंपी गई है।
हालांकि शिवराज के साथ रमन और वसुंधरा राजे को भी राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया गया है, लेकिन यदि बात अनुभव और स्वीकार्यता की करें तो तब जब कि गठबंधन दल नरेंद्र मोदी को स्वीकार नहीं करेंगे, ऐसी स्थिति में शिवराज सिंह चौहान प्रधानमंत्री पद के लिए उपयुक्त विकल्प होंगे। शिवराज सिंह की वजह से ही राज्य में नेक टू नेक मुकाबला हुआ और बेहद मामूली अंतर से पार्टी को हार का सामना करना पड़ा है, तो उसकी वजह सिर्फ यही है कि 13 साल मुख्यमंत्री रहते हुए भी उन्होंने अहंकार नहीं दिखाया। एक नेता के तौर पर वह लोगों से जुड़े रहे, पूरे प्रदेश में घूमते रहे और अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं को नाराज नहीं किया। इस बार की हार में राज्य के मुद्दे कम, केंद्र की नीतियों का ज्यादा अहम रोल है लेकिन फिर भी उन्होंने हाथ जोडक़र जनता के फैसले का सम्मान किया है और उनसे गलतियों की क्षमा मांगी और हार की जिम्मेदारी खुद पर ली। उनका यही गुण उन्हें पीएम नरेंद्र मोदी और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह से भी ज्यादा बड़ा नेता बनाता है। मध्यप्रदेश में 13 साल 13 दिन शासन करने वाले शिवराज सिंह चौहान इस बार भले ही जीत का चौका ना लगा पाए हों, लेकिन उन्होंने अब तक के सबसे सफलतम मुख्यमंत्री के रूप में जरूर अपनी पहचान स्थापित की है। वे इस चुनाव में सरकार बनाने की बाजी भले ही हार गए हों लेकिन वे ‘दिल’ जीतने में सफल रहे और यही कारण है कि हार के बावजूद शिवराज सिंह चौहान आज भारतीय जनता पार्टी के प्राइम मिनिस्टर मटेरियल तो बन ही चुके हैं। प्रधानमंत्री बनने से पहले नरेंद्र मोदी और शिवराज सिंह व डॉ. रमन सिंह भाजपा के अपराजेय क्षत्रप थे। लालकृष्ण आडवाणी ने हमेशा शिवराज की पीठ थपथपा कर उन्हें नरेंद्र मोदी का प्रतिद्वंद्वी या विकल्प के रूप में पेश करने की कोशिश की। वे पिछड़े समुदाय के भी हैं, विकास पुरुष भी हैं और सहज, विनम्र भी। आडवाणी शिवराज के काम की मुक्त कंठ से प्रशंसा करते रहे। एक तरह से वे उन्हें अघोषित रूप से प्रधानमंत्री पद के लिए प्रस्तुत कर रहे थे। हद तो तब हो गयी, जब आडवाणी ने मोदी के गृह राज्य गुजरात की गांधीनगर सीट छोड़ शिवराज के गृह राज्य मध्यप्रदेश की भोपाल सीट से लडऩे की इच्छा जता दी। हर आदमी की तरह शिवराज सिंह में भी कुछ खूबियां तो कुछ खामियां हैं। वे जितना हैं, उतना दिखते नहीं हैं, यह उनकी खामी है और वे जो हैं, वे दिखते नहीं, यह उनकी खूबी है।
राजनाथ सिंह का पिछला कार्यकाल समाप्त होने के बाद संघ परिवार भाजपा के अगले अध्यक्ष की तत्परता से तलाश कर रहा था, तब शिवराज सिंह चौहान का नाम प्रमुख रूप से विचार किया गया था। पर, शिवराज उस समय राज्य को छोड़ भाजपा अध्यक्ष बनना नहीं चाहते थे। उसके कारण भी थे। भाजपा की उस समय की स्थिति आज के कांग्रेस जैसी ही बहुत हद तक थी। 2009 लोकसभा में हार के बाद पार्टी में कलह चरम पर था। एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी था। ऐसे में शिवराज नहीं चाहते थे कि वे एक बड़े राज्य के मजबूत जननेता व मजबूत सीएम की हैसियत छोड़ गृह कलह में फंसी पार्टी का प्रमुख बनें। राजनीतिक प्रेक्षकों का मानना है कि शायद उन्होंने उस समय इसलिए अपनी राष्ट्रीय स्वीकार्यता को कम करने और उस पर खुद ही अंकुश लगाने के लिए बिहारियों के खिलाफ एक टिप्पणी की थी, ताकि उन्हें संघ परिवार द्वारा अध्यक्ष नहीं बनाया जाए। जानकार तो यह भी कहते हैं कि उस समय शिवराज की यह रणनीति काम कर गयी थी और वे अध्यक्ष के रूप में कांटों का ताज पहनने से बच गए थे। शिवराज सिंह राष्ट्रीय व घरेलू दोनों मोर्चों पर मुश्किलों का सामना करते रहे हैं और बड़ी कुशलता से उससे बच कर निकलते रहे हैं। अब जब व्यापमं घोटाले मामले में उनके खिलाफ पीएम नरेंद्र मोदी से कांग्रेस ने शिकायत कर दी है, तो फिर वह अपनी आगामी रणनीति तय करने में एक कुशल राजनेता व रणनीतिकार की तरह लग गए हैं। उन्होंने पीएम मोदी को खुद का रोल मॉडल बता दिया है। वे कहते हैं कि उनसे उन्हें मध्यप्रदेश का विकास करने की प्रेरणा मिलती है। वे मोदी के खास रणनीतिकार अमित शाह के तारीफों का भी पुल बांधते हैं। वे साफ कहते हैं कि उन्हें राष्ट्रीय राजनीति की महत्वाकांक्षा नहीं है। लेकिन शिवराज का अब तक का बैकग्राउंड तो यही कहता है कि वे संगठन और सरकार दोनों जगह शानदार परफॉर्मर साबित हो सकते हैं।