ताकि सिर्फ डिग्रीधारी न बनें बच्चे

विश्वजीत राहा
वोट बैंक के जरिये सत्ता हासिल करने की सियासत ने इन दिनों इतना शोर मचा रखा है कि सरकार के अच्छे कार्यों की चर्चा अब कम ही हो पाती है। बीते संसद सत्र में लोक कल्याण से जुड़े कई महत्त्वपूर्ण विधेयक पारित हुआ, पर चर्चा वोट बैंक को प्रभावित करनेवाली सवर्ण आरक्षण की ही सिर्फ हो रही है। जबकि इसी दौरान देश का शैक्षणिक भविष्य तय करने वाला विधेयक प्रारंभिक कक्षाओं में ‘नो डिटेंशन पॉलिसीÓ में संशोधन विधेयक भी पारित हुआ, जिसकी कहीं कोई चर्चा भी नहीं है।
दरअसल यूपीए के शासकनकाल में राइट टू एजुकेशन बिल 2009 लाया गया जिसके तहत देश के सभी बच्चों को लिए शिक्षा का अधिकार दिया गया है। लेकिन इसी आरटीए एक्ट के सेक्शन 16 की ‘नो डिटेंशन पॉलिसी यानि फेल न करने की नीति वर्ष 2010 से देश के सभी प्रारंभिक स्कूलों में लागू की गई थी। इस पॉलिसी के तहत बच्चा पढऩे में चाहे जितना भी कमजोर हो उसे आठवीं तक बिना फेल किये प्रमोट करते जाने की व्यवस्था की गई थी। हालांकि कमजोर बच्चों में सुधार के लिए सतत् एवं समग्र मूल्यांकन की व्यवस्था तो अपनाई गई थी। लेकिन शिक्षकों की कमी सहित अन्य कारणों से इसका सही क्रियान्वयन शायद ही किसी स्कूल में हो पाया। नतीजतन देश के प्रारंभिक स्कूलों में शिक्षा का स्तर चौपट हो गया। यह पॉलिसी मुख्य रूप से बच्चों में पढ़ाई के डर को कम करने के लिए शुरू की गई थी। पढ़ाई के प्रेशर के कारण ड्रॉप आउट होने वाले बच्चों पर से पढ़ाई का प्रेशर खत्म करने के लिए यह पॉलिसी एजुकेशन सिस्टम में लाई गई थी। इस पॉलिसी के चलते आज भले ही 98 फीसदी बच्चे स्कूल में हैं, लेकिन नतीजा यह रहा कि बड़ी संख्या में बच्चे बिना अक्षर ज्ञान के ही नौवीं कक्षा में प्रमोट कर दिये जाने लगे। यह भी शिकायत मिलने लगी कि परीक्षा में पास हुए बिना अगली कक्षा जाने के नियम से छात्र जानबूझकर पढ़ाई नहीं करते हैं। कई बार बच्चों के खराब परफॉर्मेंस के बावजूद इस पॉलिस के कारण अभिभावकों अपने बच्चे को क्लास में रिपीट करने को राजी नहीं होते थे। इसके परिणामस्वरूप नौवीं व दसवीं के परिणाम में अप्रत्याशित गिरावट दर्ज किया जाने लगा क्योंकि इस पॉलिसी के कारण बच्चों में पढ़ाई को लेकर गंभीरता काफी कम हो गई है। इतना ही नहीं इस पॉलिसी का बच्चों की करियर पर भी नकारात्मक प्रभाव देखने को मिलने की संभावना बढ़ती गई। ‘नो डिनेंशन पॉलिसीÓ से देश में शिक्षा का स्तर कितना गिरा है, इसे 2018 के एनुवल स्टेटस ऑफ एजुकेशन रिपोर्ट यानि असर के आलोक में समझा जा सकता है। असर 2018 के अनुसार कक्षा 5 में नामांकित औसतन 49.7 फीसदी बच्चे कक्षा 2 के स्तर का पाठ नहीं पढ़ सकते जबकि कक्षा आठ में कक्षा 2 का पाठ पढऩे वाले लगभग 73 फीसदी ही हैं। अंग्रेजी की स्थिति तो बहुत ही भयावह है। वहीं गणित में कक्षा आठ के 56 फीसदी तीन अंकों के भाग का सही-सही हल नहीं कर पाते हैं जबकि कक्षा पांच में भाग का सवाल का हल न करने वाले लगभग 72 फीसदी हैं। 14 साल तक के 76 फीसदी बच्चे में पैसे गिन पाने की भी क्षमता नहीं पाई गई। इस रिपोर्ट के सांख्यिकीय आकलन के निष्कर्ष के अनुसार कहा जा सकता है कि इस पॉलिसी से सबसे अधिक हानि झारखंड सरीखे छोटे व कम विकसित राज्यों के बच्चों को हुआ है। बहरहाल मोदी सरकार ने बच्चों के भविष्य को चौपट करनेवाली इस पॉलिसी में संशोधन कर दिया है। पिछले संसद सत्र में राज्यसभा ने आठवीं तक फेल नहीं करने की नीति में संशोधन वाले विधेयक को पारित कर दिया। लोकसभा में इस पॉलिसी को खत्म करने के लिए राइट ऑफ चिल्ड्रन टू फ्री एंड कंप्लसरी एजुकेशन (दूसरा संशोधन) बिल 2017 पहले ही पारित हो चुका है। इस प्रकार मोदी सरकार ने निशुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार (संशोधन) विधेयक 2018 को दोनों सदनों से पारित करवा लिया है। हालांकि इसके बाद भी गेंद राज्य सरकारों के कोर्ट में होगी कि वे संशोधन लागू कर इस पॉलिसी को खत्म करती हैं या नहीं। दरअसल 22 राज्यों ने इस पॉलिसी के कारण शिक्षा का स्तर गिरने की बात कहते हुए इसके खात्मे की मांग केंद्र सरकार से की थी। मानव संसाधन विकास मंत्रालय के निर्देश पर इस संबंध में सुझाव लेने के लिए सभी राज्यों में सेंट्रल एडवाइजरी बोर्ड ऑफ एजुकेशन (कैब) की सब कमेटियां गठित हुई थीं। हरियाणा में शिक्षा मंत्री रामविलास शर्मा की अगुवाई में बनी सब कमेटी ने भी नो डिटेंशन पॉलिसी में बदलाव की सिफारिश की थी। इसके बाद संशोधन का फैसला लिया गया था। संशोधित बिल के तहत अब कक्षा पांच और आठ की वार्षिक परीक्षा में अच्छा प्रदर्शन नहीं करने वाले छात्रों को एक और मौका दिया जाएगा। इस परीक्षा में भी अगर छात्र स्तरीय प्रदर्शन नहीं कर पाते हैं तो उन्हें फेल घोषित कर दोबारा उसी कक्षा में प्रवेश दिया जाएगा। बिल पास होने से आनेवाले शैक्षणिक सत्र से कक्षा पांच और आठ की परीक्षाएं भी अनिवार्य हो जाएंगी। हालांकि स्कूलों में अनुत्तीर्ण होने की स्थिति में बच्चों को उसी कक्षा में रोकने या नहीं रोकने का अधिकार राज्यों के पास होगा। इस बिल के पास होने पर शिक्षाविदों, शिक्षकों व अभिभावाकों ने उम्मीद जताई कि अब प्राथमिक शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार होगा। स्कूली शिक्षा के स्तर को सुधारने की दिशा में मोदी सरकार का यह कदम सराहनीय है। बच्चों में ड्रॉप आउट बढऩे की संभावना को यदि दरकिनार कर दें तो ‘नो डिटेंशन पॉलिसीÓ में यह संशोधन एक शुरूआती कदम है जिसका प्रारंभिक शिक्षा के क्षेत्र में व्यापक सकारात्मक असर पडऩे की संभावना है। जरूरी है कि सरकार राज्यों को इस पॉलिसी को पूरी तरह से लागू करने पर बल दे ताकि देश में शिक्षा का नीचे आये ग्राफ को सुधारा जा सके। उम्मीद की जानी चाहिए कि देर सवेर ही सही वर्ग एक व दो को छोड़कर प्रारंभिक कक्षाओं के सभी कक्षाओं में ‘नो डिटेंशन पॉलिसी को फेल कर वार्षिक परीक्षा की नीति पुन: अपनाई जायेगी ताकि बच्चे सही मायने में शिक्षित बनें, सिर्फ डिग्रीधारी नहीं।े