आस्था के साथ आकर्षण का केन्द्र बना प्रयागराज कुंभ सुविधा और सुरक्षा को देख खुश हैं देश-विदेश के श्रद्धालु


प्रयागराज से विशेष रिपोर्ट, विजय कुमार दास
कुंभ मेला परिसर प्रयागराज सुविधा और सुरक्षा के साथ श्रद्धालुओं के आकर्षण का केन्द्र बना हुआ है। कुंभ को विश्व का सबसे बड़ा धार्मिक आयोजन माना जाता है। कुंभ मेला को लोगों को जोडऩे वाला शक्तिशाली माध्यम भी माना जाता है। गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती के संगम में डुबकी लगाने के लिए दुनिया भर से श्रद्धालु प्रयागराज पहुंच रहे हैं। मेला क्षेत्र में पूरी दुनिया से पहुंचे साधु-संन्यासियों ने भी डेरा जमा रखा है, जो लोगों के आकर्षण का केन्द्र बने हुए हैं। वेद, पुराण, तप और साधना की दुनिया तेजी से आधुनिकता की दौड़ में कदमताल कर रही है। संगम पर पुण्य डुबकी लगाने के बाद लोग अजब-गजब साधुओं के बारे जानकारी हासिल करने के साथ ही उनका आशीर्वाद भी ले रहे हैं। इसके साथ ही मेला क्षेत्र में तमाम अन्य तरह की गतिविधियां भी चल रही हैं।
डेढ़ फ ीट के बावन बाबा आस्था का केन्द्र
कुंभ मेले में डेढ़ फ ीट के बावन बाबा भक्तों के लिए आस्था का केन्द्र बने हुए हैं। इन्हें देखकर बड़े ही भावुकता के साथ इनके दर्शन और आशीर्वाद ले रहे हैं। बाबा इन पर हाथ फेर बड़े ही भाव के साथ अपनी कृपा बरसा रहे हैं। कुंभ के सेक्टर 15 जूना अखाड़ा में बसे डेढ़ फ ीट यानि 18 इंच के बावन बाबा उर्फ संत कुमार पाठक मूल रूप से झांसी के रहने वाले हैं। ये जिले के आश्रम मनियर परशुराम के संत गंगानंद गिरी के सानिध्य में आए। यहीं से इनके संन्यास जीवन की शुरुआत हुई। वे हरिद्वार में पूर्ण गृहस्थ जीवन से विरत हो गए और यहीं जूना अखाड़ों के बाबाओं के साथ आए। बावन बाबा कहना है कि माता-पिता के देहावसान हो जाने के बाद गृहस्थ जीवन का त्याग कर दिया। हालांकि परिवार में चार भाई हैं। इनमें सबसे छोटा मैं हूं। दूसरी बार कुंभ स्नान के लिए आया हूं। इसके बाद अखाड़ों के बाबाओं के साथ अन्य मेले में जाऊंगा। बावन बाबा की सेवा और देखरेख का जिम्मा बलिया के उमेश का है। वह करीब पांच वर्षों से इनकी सेवा कर रहा है। इसका कहना है कि लंबाई कम होने के कारण बाबा उठते नहीं है। इस कारण इनकी ऊंचाई मात्र 18 इंच की नापी जाती है। लंबाई अत्यधिक छोटी होने के चलते श्रद्धालु बावन भगवान का रूप देखकर दर्शन करने आते हैं और इच्छानुसार दान-दक्षिणा, चढ़ावा अर्पित करते हैं।
सोशल मीडिया पर सक्रिय साधु-संन्यासी: प्रयागराज में पहुंचे विभिन्न अखाड़ों के नागा संन्यासी सोशल मीडिया पर भी काफ ी सक्रिय दिखाई दिए। संन्यासी व्हाट्स एप ग्रुप और यूट्यूब चैनल को सक्रियता से चला रहे हैं। पूछने पर उनका कहना है कि उनके शिष्य ऑनलाइन भी हो गए हैं। देश-विदेश में होने के कारण फेसबुक, यूट्यूब, व्हाट्स एप चलाना पड़ता है, जिससे वह अपने भक्तों और शिष्यों तथा नागा संन्यासियों से जुड़े रहते हैं। अखाड़ों में आ रही आधुनिकता और टेक्नोलाजी को जानने के लिए जब पंचायती अखाड़ा बड़ा उदासीन का रुख किया तो कई अजब-गजब पहलू दिखाई दिए। वेद, पुराण, तप और साधना की दुनिया तेजी से आधुनिकता की दौड़ में कदमताल कर रही है। यह सब युवा संन्यासियों के अखाड़ों से जुडऩे के कारण तेजी से हो रहा है। अधिकतर आम लोगों से दूर रहने वाले नागा साधु संन्यासी कठोर तप और साधना में लीन रहते हैं, लेकिन सोशल मीडिया पर भी उतने ही सक्रिय रहते हैं। उदाहरण के तौर पर वेदांत नगर काशी के डॉ. कमल दास वेदांती छह माह विदेश में रहते हैं तो छह माह अपने देश में। इस समय कुंभ में उनके पंडाल में डिजिटल की झलक देखने को मिल रही है।
देव भाषा संस्कृ त को बचाने का प्रयास: संस्कृत को देवभाषा माना जाता है। हिन्दू धर्म से जुड़े वेद, पुराण, उपनिषद सभी संस्कृत में हैं। कुंभ स्थल पर देव भाषा कही जाने वाली संस्कृत भाषा को संरक्षित करने के लिए 100 नन्हें मुन्नों की टोली प्रयागराज के भक्ति वेदांत नगर स्थित काशी पंडाल में नियमित रूप से संस्कृत का ज्ञान ले रही है। मध्य प्रदेश के एक गांव सिरोंज में जन्मी 16 वर्षीय ऋ तंभरा कुमारी कहती हैं कि मुझे किसी ने बताया था कि अगर किसी देश को खत्म करना हो तो उसकी भाषा को खत्म कर दो। संस्कृत हमारे देश की भाषा है और उसका लगातार पतन हो रहा है। तभी मुझे ऐसा लगा कि अगर संस्कृत भाषा ही खत्म हो गई तो देश का गौरव क्या होगा। बस तभी तय कर लिया कि संस्कृत का संरक्षण और विकास करना है। गुरु जी के नेतृत्व में दीक्षा ली और तबसे लगातार यही कर रही हूं। मुझे पता है कि देश की सामाजिक विरासत को कायम रखना है तो संस्कृत को सुरक्षित रखना होगा।