भारत में उच्च शिक्षा की वर्तमान स्थिति


डॉ. श्रीनाथ सहाय
उच्च शिक्षा और शोध किसी राष्ट्र के विकास और प्रगति की रीढ़ होते हैं। यह अनायास नहीं है कि दुनिया के सभी विकसित राष्ट्रों में उच्च शिक्षा को लेकर सरकारें और नियामक संस्थाएं अत्यंत सजग हैं। दुर्भाग्य से भारत में उच्च शिक्षा की नियामक एजेंसी विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) और विभिन्न सरकारों का रवैया उच्च शिक्षा को लेकर बहुत उत्साहजनक नहीं रहा है। वास्तव में भारत में उच्च शिक्षा प्रणाली की वर्तमान स्थिति जटिल और चुनौतीपूर्ण है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि स्वतंत्र भारत में उच्च शिक्षा का विस्तार व्यापक स्तर पर हुआ है लेकिन क्या यह हमारे देश की उच्च शिक्षा, छात्रों को जीवन दृष्टि देने में या उनकी भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति करने में सफल हुयी है। हमारी शिक्षा व्यवस्था की चतुर्दिक समस्याओं में से उच्च शिक्षा की समस्या की तह में जाना ज्यादा जरूरी है, क्योंकि उच्च शिक्षा किसी देश के आर्थिक विकास की आधारशिला होती है।
देश में विद्यालयी पढ़ाई करने वाले नौ छात्रों में से एक ही कॉलेज पहुंच पाता है। उच्च शिक्षा हेतु पंजीकरण कराने वालों का अनुपात हमारे यहां दुनिया में सबसे कम 11 प्रतिशत है, जबकि अमेरिका में यह 83 प्रतिशत है। संख्या की दृष्टि से देखा जाए तो भारत की उच्चतर शिक्षा व्यवस्था अमरीका और चीन के बाद तीसरे नंबर पर आती है लेकिन जहां तक गुणवत्ता की बात है दुनिया के शीर्ष विश्वविद्यालयों में भारतीय विश्वविद्यालयों की रैंकिग काफी नीचे है। आपको जानकार हैरानी होगी कि देश कई विश्वविद्यालयों में पिछले 30 सालों से पाठ्यक्रमों में कोई बदलाव नहीं किया गया है। पुराना पाठ्यक्रम और जमीनी हकीकतों से दूर शिक्षक उच्च शिक्षा को मारने के लिए काफी हैं। आज शिक्षा पर सकल घरेलू उत्पाद का जितना प्रतिशत खर्च होना चाहिए, वो नहीं हो पा रहा है। एक रपट के अनुसार, देश में शोध पर 0.8 फीसदी खर्च हो रहा है, जबकि कम-से-कम 2 फीसदी खर्च होना चाहिए। रक्षा और अन्य मंत्रालयों का बजट लम्बा-चौड़ा होता है, पर शिक्षा की अनदेखी होती है। 2019-20 के बजट में उच्च शिक्षा के लिए आवंटित राशि में 650 करोड़ की कटौती की गई है।
1956 में संसद द्वारा एक कानून पास कर यूजीसी का गठन किया गया जिसका प्रमुख कार्य उच्च शिक्षा का समन्वय करना, इसके स्तर को बनाए रखना, विकास की निगरानी और उच्च शिक्षा को सुधारने के लिए केंद्र और राच्य सरकारों को सलाह देना था। एक अर्थ में यूजीसी ने अपनी जिम्मेदारी को बखूबी निभाया। 1956 में करीब 30 विश्वविद्यालयों से बढ़कर आज देश में लगभग सात सौ विश्वविद्यालय हैं। उसी तरह कॉलेजों की संख्या में भी जबरदस्त बढ़ोतरी हुई है। आज देश में लगभग 40 हजार कॉलेज हैं।दुर्भाग्यवश इस संख्यात्मक विकास के साथ गुणात्मक विकास वैसा कदमताल नहीं कर पाया। चंद नामी विश्वविद्यालयों या इसी तरह कुछ नामी -गिरामी कॉलेजों को छोड़ दें तो गुणवत्ता के धरातल पर स्थिति निराशाजनक ही दिखाई पड़ती है। दुनिया के नक्शे में भारतीय उच्च शिक्षा संस्थान एक तरह से गायब ही हैं। वहीं देश में शिक्षण संस्थानों की कमी की वजह से अच्छे कॉलेजों में प्रवेश पाने के लिए कट ऑफ प्रतिशत असामान्य हद तक बढ़ जाता है। अध्ययन बताता है कि सेकेंड्री स्कूल में अच्छे अंक लाने के दबाव से छात्रों में आत्महत्या करने की प्रवृत्ति बहुत तेजी से बढ़ रही है। भारतीय छात्र विदेशी विश्वविद्यालयों में पढऩे के लिए हर साल सात अरब डॉलर यानी करीब 43 हजार करोड़ रुपए खर्च करते हैं क्योंकि भारतीय विश्वविद्यालयों में पढ़ाई का स्तर घटिया है।
सम्पूर्ण देश में छात्र-शिक्षक अनुपात इतना असंतुलित है कि सोचकर ही स्थिति भयावह लगती है। आई.आई.टी. जैसे संस्थानों में 15-20 फीसदी शिक्षकों की कमी है। विभिन्न कॉलेज, विश्वविद्यालयों में प्राध्यापकों की भारी कमी है, हजारों की तादाद में रिक्तियां सालों से लंबित हैं। शिक्षण कार्य जैसे-तैसे घसीटा जा रहा है। राज्यों में स्थिति तो बहुत ज्यादा ही खराब है। यथाशीघ्र इन रिक्तियों को भरने की आवश्यकता है। इसके साथ-साथ नवीनतम ज्ञान शोध और तकनीक आदि से शिक्षकों के सतत आधुनिकीकरण के लिए एक कारगर नीति बनाई जाने की आवश्यकता है। इसके अतिरिक्त गुणवत्ता युक्त शिक्षकों की कमी से निपटने के लिए विदेशों में कार्यरत भारतीयों को भी आमंत्रित किया जाना चाहिए।
दूसरी विकट स्थिति यह है कि देश के सभी प्रमुख विश्वविद्यालयों में तदर्थ व्यवस्था के तहत शिक्षकों की बहाली कर उनसे काम चलाया जा रहा है। कई राज्य-स्तरीय विश्वविद्यालय तो ऐसे हैं, जहां कई कॉलेजों में कई विभागों में एक भी शिक्षक नहीं है। अगर आंकड़ों की बात करें तो सन् 2030 तक महाविद्यालय जाने वाले विद्यार्थियों की संख्या भी लगभग 14 करोड़ से अधिक हो जायेगी तो इस क्षेत्र में ऐसी दूरगामी योजनाएं हों कि हम गुणवत्ता का स्तर बनाते हुए संसाधन जुटा सकें। विगत दशक में निजी व्यावसायिक और डिग्री महाविद्यालयों को जैसे ही विश्वविद्यालय का दर्जा मिला, उन्होंने अपनी क्षमताओं से कई गुणा विद्यार्थी ले लिए, वो भी सुविधाओं में बिना कोई सुधार किये, जिसका परिणाम है कि ज्यादातर विद्यार्थी कैंटीन में समय बिताते दिखते हैं। क्यों? क्योंकि कक्षाओं में उन्हें सिर्फ किताबी ज्ञान ही मिल रहा हैए जबकि आज व्यवहारिक ज्ञान की आवश्यकता अधिक महसूस की जा रही है। देश में उच्च शिक्षा ग्रहण करने आने वाले छात्रों की संख्या में भी कमी आई है जबकि चीन और जापान में इनकी संख्या बढ़ी है।
देश में उच्च शिक्षा में सुधार हेतु कोठारी आयोग, प्रोफेसर यशपाल कमेटी आदि का गठन हुआ, रिपोर्ट भी आयीं। वर्ष 1986 में रोजगारोन्मुखी नयी शिक्षा नीति भी लायी गयी, पर आज भी हम एक अदद मूल्यपरक शिक्षा-नीति की बाट जोह रहे हैं। नैसकॉम और मैकिन्से के एक शोध के मुताबिक मानविकी में 10 में एक और अभियंत्रण में डिग्री प्राप्त 4 में से एक भारतीय छात्र ही नौकरी पाने के योग्य हैं। राष्ट्रीय मूल्यांकन व प्रत्यायन परिषद् (नैक) का शोध बताता है कि इस देश के 90 फीसदी कॉलेजों एवं 70 फीसदी विश्वविद्यालयों का स्तर बेहद कमजोर है। शिक्षा के वैश्वीकरण के इस दौर में मंहगे कोचिंग संस्थान, पाठ्य पुस्तकों की बढ़ती कीमत, डीम्ड विश्वविद्यालयों और छात्रों में सिर्फ सरकारी नौकरी पाने की एक आम अवधारणा का पनपना आज की तारीख की अहम उच्च शैक्षिक चुनौतियां हैं।
उच्च शिक्षा की सर्वप्रमुख चुनौती है-सभी प्रदेशों में एक समान शिक्षा नीति का न होना। हालांकि शिक्षा को समवर्ती सूची के अंतर्गत रखा गया है और राज्यों पर कोई भी पाठ्यक्रम केंद्र द्वारा थोपा नहीं जा सकता। पर, परस्पर समन्वय स्थापित कर एक सम्यक, समावेशी, सुदृढ़, समग्र और संतुलित पाठ्यक्रम का ढांचा सामने रखा जा सकता है। कई विद्वानों का तर्क है कि जब इस संप्रभु देश का राष्ट्रगान एक है, राष्ट्रीय गीत एक है, राष्ट्रीय चिह्न एक है, एक राष्ट्रीय पक्षी है, तो एक शिक्षा-पद्धति क्यों नहीं!
एक अन्य समस्या है उच्च कोटि की पाठ्य सामग्री की। यह विदित है कुछ टॉप संस्थानों को छोड़ दें तो आर्थिक अभाव, उपलब्धता, अद्यतन जानकारी की कमी जैसे कारणों से अधिकांश शिक्षकों-विद्यार्थियों को पठन-पाठन के लिए दूसरे दर्जे की या पुरानी घिसी-पिटी सामग्री पर निर्भर रहना पड़ता है। अमेरिका में हार्वर्ड, एएमआइटी अथवा स्टेनफोर्ड जैसे विश्वस्तरीय संस्थान या अनेक यूरोपीय विश्वविद्यालय मुफ्त में ई. लर्निग मैटेरियल विद्यार्थियों को उपलब्ध करवा रहे हैं। वैसे वर्तमान में दिल्ली विश्वविद्यालय के इंस्टीट्यूट ऑफ लाइफलांग लर्निंग अथवा आइआइटी के द्वारा इस दिशा में कई गंभीर काम हुए हैं। इन प्रयासों में और तेजी से ठोस और व्यापक कदम उठाने होंगे। देश में उच्च शिक्षा में सुधार के बारे में व्यापक बहस चल रही है। शिक्षाविद्, बुद्धिजीवी और अन्य विशेषज्ञों ने शिक्षा के स्तर के बारे में चिंता व्यक्त की है और उसमें बदलाव की मांग की है। हमारे देश में शिक्षा प्रणाली में निश्चित रूप से बदलाव की आवश्यकता है और यह बदलाव केवल आईआईटी, आईआईएम या विश्वविद्यालयों में ही नहंी अपितु ग्रामीण और पिछड़े जिलों में स्थित उच्च शिक्षा संस्थानों में भी किया जाना चाहिए।
समस्या का एक पहलू शिक्षा के प्रारूप से जुड़ा है। हमारी उच्च शिक्षा अभी भी मैकाले सिंड्रोम से ग्रस्त है, जिसका उद्देश्य अंग्रेजी राज में गुलामी की मानसिकता को बनाए रखना था। एक सामान्य बीए, बीएससी, बीकॉम यहां तक कि एमए, एमएससी, एमकॉम पास युवा भी नहीं समझ पाता कि इस कोरी सैद्धांतिक शिक्षा का जीवन में क्या उपयोग है या उन्हें क्या रोजगार मिल सकेगा? यह किसी से छिपा नहीं है कि पीएचडी तक करने के बाद भी युवा प्राइमरी स्कूल के अध्यापक बनने तक के लिए जिद्दोजेहद कर रहे हैं। इस मैकाले प्रारूप ने देश और युवाओं का अमूल्य समय ऊर्जा और धन बहुत बहाया है।
विशेषज्ञों के अनुसार देश की उच्च शिक्षा को शिक्षा की मूलभूत संकल्पना के साथ आधुनिक आवश्यकताओं के अनुसार ढालना होगा। वहीं शिक्षा संबंधित नीति बनाने-लागू करने में भारतीय सभ्यता संस्कृति से कटे हुए अंग्रेजीदां लोगों की जगह जमीनी हकीकत से जुड़े हिंदी पट्टी या क्षेत्रीय बुद्धिजीवियों को भी तवज्जो दी जाए। इसके अलावा सरकार को उच्च शिक्षा के विस्तार के लिए अधिक धन राशि आवंटित करनी चाहिए ताकि हमारा देश तकनीकी ज्ञान के क्षेत्र में विशेषज्ञ सेवाएं उपलब्ध करा सके और अंतर्राष्ट्रीय जगत में अपनी पहचान बना सके। इस संबंध में प्रोफेसर यशपाल समिति द्वारा 2009 में की गयी सिफारिशें प्रासंगिक हैं जिसमें उन्होंने उच्च शिक्षा के लिए अधिक धन राशि आवंटित करने और निजी निकायों पर कड़ा विनियमन और निगरानी रखने की सिफारिश की थी। समय आ गया है कि इन सिफारिशों को जल्दी से जल्दी लागू किया जाए।
(लेखक उत्तर प्रदेश राज्य मुख्यालय पर मान्यता प्राप्त स्वतंत्र पत्रकार हैं। )