इलेक्शन डायरी: गोदरेज और भारत का पहला चुनाव


नई दिल्ली, 13 मार्च।
भारत में विपक्षी पार्टियां कुछ सालों से मांग कर रही हैं कि चुनावों में ईवीएम के स्थान पर बैलट पेपर का इस्तेमाल किया जाए। आज विपक्षी पार्टियों को प्लास्टिक की ईवीएम की बजाय स्टील से बने बैलट बॉक्स यानी मतपेटी में अपना भविष्य ज़्यादा सुरक्षित लग रहा है। आज से सत्तर साल पहले भी इसी तरह की ज़रुरत महसूस हुई। 1951 से होने जा रहे पहले चुनाव में ऐसी मतपेटी की ज़रुरत महसूस हुई जो मजबूत और भरोसेमंद हो और जिसमे मतपत्र सुरक्षित रखे जा सकें । उस समय देश में एक ही कंपनी थी जो स्टील की मजबूत मतपेटी बनाने का दावा कर सकती थी। वो थी गोदरेज कंपनी।
पहला लोकसभा चुनाव 25 अक्टूबर 1951 से 21 फरवरी 1952 तक चला। चुनाव आयोग के गठन को अभी दो साल ही हुए थे। चुनाव आयोग के आगे कई मुश्किलें थीं और समय कम। सबसे बड़ी दिक्कत थी कि मतपेटी और उसमें रखे मतपत्रों की सुरक्षा कैसे होगी? चार महीने तक चलने वाले कार्यक्रम में आयोग को भारत के हर कोने में चुनाव का आयोजन कराना था। यातायात की सुविधा न के बराबर थी। मतपेटी को दुर्गम पहाडिय़ों से लेकर रेतीले रेगिस्तान में बसे एक-एक वोटर तक पहुंचना था। तय किया गया कि मतपेटी स्टील से बनी हो जो किसी भी ऊबड़ खाबड़ स्थान में ले जाते समय मतपत्रों को सुरक्षित रख सके।बाजार में एक ही भरोसेमंद नाम था – गोदरेज। 1897 से तिजोरी के कारोबार से जुड़े गोदरेज एंड बॉयस कंपनी को चुनाव आयोग ने स्टील की मतपेटी बनाने की जि़म्मेदारी सौंपी।
जुलाई 1951 से गोदरेज ने मुंबई स्थित विखरोली कारखाने से मतपेटी के निर्माण का कार्य शुरू किया। 17 लाख मतपेटियों का टारगेट कंपनी को चार महीनों में पूरा करना था।