लोकसभा चुनाव में आमने-सामने होंगे नरेंद्र मोदी-कमलनाथ


संघ के समर्पण और कांग्रेस कार्यकर्ताओं के हठ योग की वजह से ही
सुनील दत्त तिवारी
भोपाल, 26 मार्च।
लोकसभा चुनाव को लेकर मध्यप्रदेश में मुख्य रूप से मुकाबला भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस पार्टी में ही होना है, यह लगभग तय है। वैसे मध्यप्रदेश पिछले डेढ़ दशक से भाजपा के लिए स्वाभाविक पहचान बन गया था, लेकिन हाल ही में संपन्न हुए विधानसभा चुनाव में कमलनाथ के नेतृत्व में कांग्रेस ने बड़े कश्मकश की लड़ाई में भारतीय जनता पार्टी के इस अभेद्य किले को ढहा दिया। हार के कारणों पर भाजपा में कितना मंथन हुआ और उसका परिणाम क्या निकला, यह तो शायद ही किसी को पता हो। लेकिन, लोकसभा चुनाव की घोषणा होते ही जिस तरह से कांग्रेस ने आक्रामक रुख अख्तियार कर लिया, उससे इस बार लोकसभा चुनाव में भाजपा के लिए रास्ते आसान होते दिख नहीं रहे हैं। मुख्यमंत्री कमलनाथ ने अपने राजनैतिक कौशल का इस्तेमाल करते हुए दिग्विजय सिंह को भोपाल सीट से लडऩे को राजी कर लिया, अब इसका जवाब तब से लेकर अब तक भाजपा उत्तर ढूंढ रही है। वैसे मध्यप्रदेश में लोकसभा चुनाव मुख्य रूप से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री कमलनाथ के इर्द-गिर्द ही रहेगा, यह लगभग तय हो चुका है। यही वजह है कि दोनों ही पार्टियां बहुत फूंक-फूंककर अपने पत्ते खोल रही हैं। मध्यप्रदेश की जिन 6 सीटों पर जबलपुर, बालाघाट, मंडला, छिंदवाड़ा, सीधी, शहडोल में 29 अप्रैल को मतदान होना है। इन सीटों पर चुनावी रणनीति को इसी बात से समझा जा सकता है कि जबलपुर में भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष राकेश सिंह के खिलाफ सबसे मजबूत प्रत्याशी खड़ा करने की कोशिश में कांग्रेस ने अभी तक उम्मीदवार तय नहीं किया है, तो छिंदवाड़ा में कांग्रेस के संभावित उम्मीदवार नकुलनाथ के सामने भाजपा अभी तक प्रत्याशी नहीं तलाश पाई। वैसे 2014 में मोदी लहर की एक बार फिर उम्मीद भाजपा को भी नहीं है, जब पार्टी ने 29 में से 27 जगहों पर विजय पताका फहराई थी। लेकिन अब मुख्यमंत्री कमलनाथ ने बूथ स्तर तक कार्यकर्ताओं को तैयार कर कम से कम 20 सीट जीतने का लक्ष्य निर्धारित कर दिया है। कांग्रेस को भरोसा है कि जय किसान ऋण मुक्ति योजना और राहुल गांधी के न्यूनतम आय गारंटी की योजना एक बड़ा गेम चेंजर साबित होगी। विधानसभा चुनावों के ठीक पहले ऐसी ही सम्बल योजना ने शिवराज सिंह चौहान को एन्टीइन्कम्बैन्सी के बावजूद 109 सीटों पर जीत दिलाकर मुकाबले में लाकर खड़ा कर दिया था। हालांकि भाजपा ने प्रदेश के लिए अपनी पहली सूची में कई लोगों को विरोध के बावजूद टिकट दिया और कई लोगों के टिकट भी काटे, जिसका असर अब दिखाई भी देने लगा है। शहडोल से ज्ञान सिंह अब पार्टी लाइन से हटकर बयान देने लगे हैं तो इंदौर से ताई सुमित्रा महाजन की उम्मीदवारी पर संकट के बादल देखते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चुनाव लडऩे का प्रस्ताव भेज दिया। मध्यप्रदेश की स्थिति को भांपते हुए संघ अपनी पूरी भूमिका में आ चुका है। संघ के सर कार्यवाहक भैयाजी जोशी पूरी स्थिति पर प्रदेश के शीर्ष नेताओं से फीडबैक ले रहे हैं। बची हुई 14 लोकसभा सीटों पर जिताऊ प्रत्याशियों की खोज भोपाल से चलकर दिल्ली दरबार पहुँच गयी है, अब अंतिम फैसला वहीं लिया जाना है। वहीं दूसरी ओर प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ ने होली मिलन समारोह में पत्रकारों से यह कहते हुए कि कांग्रेस की लिस्ट तो मेरी जेब में है, आश्वस्त कर दिया कि उनकी तैयारी पूरी है और वे तो केवल भाजपा के उम्मीदवार चयन की प्रतीक्षा कर रहे हैं। बहरहाल, मध्यप्रदेश को लेकर एक बात तो तय है कि भले ही पॉलिटिकल कैनवास पर बहुत सारे किरदार दिखाई दे रहे हों, लेकिन मुख्य मुकाबला तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री कमलनाथ के ही बीच होगा। हां, इतना जरूर है कि मोदी के पीछे संघ का संगठित नेटवर्क है तो कमलनाथ को राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के चमत्कार के अलावा अपने 80 दिनों के कार्यकाल का भी पूरा भरोसा है। अभी तो पिक्चर की पूरी स्क्रिप्ट लिखी ही नहीं गयी है। अभी तो पूरे 29 किरदार भी दोनों तरफ से तय नहीं हैं, इसी ऊहापोह में कार्यकर्ता भी हैं और मतदाता भी। लेकिन इतना जरूर है कि इस बार प्रदेश में होने वाले लोकसभा चुनाव में परिपक्व और राजनैतिक चातुर्यता का अनूठा मिश्रण देखने को मिलेगा, कौन कितनी सीटें जीतेगा, यह तो मतदाता तय करेंगे मगर चुनावी पिच पर राजनीति के दो धुरंधर (नरेंद्र मोदी, कमलनाथ) सिद्धहस्त खिलाडिय़ों के बीच मुकाबला रोचक होगा।