भाजपा छोड़ो, कमलनाथ का दरवाजा खुला, कांग्रेस छोड़ो, शिवराज का दरवाजा…

मध्यप्रदेश में लोकसभा चुनाव को लेकर आयाराम-गयाराम की संख्या बढऩे लगी और दोनों पार्टी के बड़े नेता लगे पाला बदलवाने में, इसलिए कहा जा रहा है

विशेष संपादकीय
विजय कुमार दास

मध्यप्रदेश की राजनीति में पहली बार दल बदलने की प्रक्रिया चुनाव के समय हो रही है, ऐसी बात नहीं है यह तो भाजपा-कांग्रेस की संस्कृति और परंपराओं का ही एक हिस्सा है। जिसमें जिसको मौका मिलता है वह अपनी विरोधी पार्टी के पूर्ण अवसरवादी नेताओं को अपने पास बुला लेता है, जिससे सामने वाले को बड़ा झटका लगे। इसी का परिणाम है कि मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री कमलनाथ जो वर्तमान में मप्र कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष भी हैं, उन्होंने फैसला कर लिया है कि भाजपा को छोड़कर और नरेंद्र मोदी तथा अमित शाह की खिलाफत करके कांग्रेस में आएगा, उसका स्वागत वे खुद करेंगे। प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष बनने के साथ ही कमलनाथ ने इस सिलसिले की रफ्तार इतनी तेज कर दी कि पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के सगे साले संजय मसानी को कांग्रेस में मिला लिया, आनन-फानन में विधानसभा की टिकट भी दे दी लेकिन आयाराम-गयाराम का नतीजा सबने देख लिया, संजय मसानी की जमानत जब्त हो गई और पुराना कांग्रेस का कार्यकर्ता प्रदीप जायसवाल भारी मतों से निर्दलीय चुनाव जीतकर कमलनाथ के मंत्रिमंडल में ही मंत्री बन गया। दूसरा बड़ा उदाहरण शिवराज मंत्रिमंडल में कृषि मंत्री रहे रामकृष्ण कुसमरिया का है, कांग्रेस का मन है कि टिकट कुसमरिया को दे दी जाए लेकिन संजय मसानी की हालत देखकर पार्टी आलाकमान संकोच में है। दल-बदलने या बदलवाने की प्रक्रिया में अवसरवादी नेताओं का कोई मुकबला नहीं होता और जब विशेष रूप से भारतीय जनता पार्टी का महत्वपूर्ण नेता कमलनाथ की कांग्रेस में दरवाजा खटखटा दे तो समझ लो कि उसके भाग्य खुल गए। बहुजन समाज पार्टी, समाजवादी पार्टी, जयेश और न जाने कितने ऐसे लोगों ने जिन्हें कहीं महत्व नहीं मिला हो, वे सब कमलनाथ जी के शरण में आ गए और फूल-मालाएं पहनकर भाजपा के शिवराज को कोसा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी नहीं बख्शा। इसी कड़ी में आज शिवराज मंत्रिमंडल के भारी-भरकम मंत्री रह चुके रीवा के राजेंद्र शुक्ला के भाई विनोद शुक्ला ने भी आज अंतत: मुख्यमंत्री कमलनाथ को पाने के लिए कांग्रेस का दामन थाम उनके सामने थाम लिया। यह तो कांग्रेस में सिलसिला लोकसभा चुनाव के नामांकन की अंतिम तारीख तक चलने वाला है। लेकिन कांग्रेस के कमलनाथ को परंपरागत पुराने कांग्रेसी यह कहकर कुरेद रहे हैं हमें भी मौका दो सर, हम तो आपके अपने हैं, ये तो अभी आए हैं और कल चले जाएंगे। यह बात सबसे पहले ङ्क्षवध्य में ही उठी है, जहां श्रीनिवास तिवारी के खानदान का दबदबा आज भी कायम है, वहां के सभी ब्राम्हणों का कहना है कि स्व. सुंदरलाल तिवारी के बेटे को उम्मीदवार बना दो तो कांग्रेस का जीतना तय है, वरना रीवा और विंध्य में भाजपा ने शिवराज के संबल योजना के सहारे जिस तरह अजय सिंह और राजेंद्र सिंह जैसे नेताओं को पराजय का रास्ता दिखाया, वह किसी से छिपी नहीं है। इन सभी उदाहरणों के बावजूद भी यह लिखने में संकोच नहीं है कि भाजपा छोड़ो कमलनाथ का दरवाजा खुला है। यूं कहा जाए बड़ा भी है तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। रहा सवाल भारतीय जनता पार्टी के त्रिगुट नेताओं का जिसमें शिवराज सिंह चौहान, नरेंद्र तोमर और राकेश सिंह की रोज जुगलबंदी होती है, इस बात पर कि कांग्रेस से आने वाला कौन है, इसका पता लगाया जाए। भाजपा के इन तीनों नेताओं की रणनीति ऐसी होती है कि ये तीनों मिलकर ‘जयचंदÓ की तलाश करते हैं, इसलिए पिछली लोकसभा में ऐसा उदाहरण देखने को मिला। भागीरथ प्रसाद को सुबह कांग्रेस का टिकट और शाम को भाजपा का टिकट लेकर मैदान मार गए। शायद यही कारण है कि 2019 के लोकसभा चुनाव में शिवराज, नरेंद्र तोमर और राकेश सिंह ने फूंक-फूंककर कदम रखने का फैसला किया है। कांग्रेस छोड़कर आने वाले राकेश चतुर्वेदी 5 साल तक लटके रहे, कुछ नहीं मिला और आगे भी यदि इस चुनाव में कांग्रेस छोड़कर कोई भाजपा में आता है तो वह यह मानकर बिलकुल भी न चले कि उसे टिकट मिलने वाला है।
सूत्र बताते हैं अमित शाह और नरेंद्र मोदी ने भाजपा के इन तीनों महारथियों को हिदायत दी है कि कांग्रेस छोड़कर कोई आए तो स्वागत करो, लेकिन गले में मत लटकाओ। इसलिए यह लिखने और कहने में संकोच नहीं है कि कांग्रेस छोड़कर भाजपा में आने की कोशिशों से किसी को फायदा टिकट का होगा, यह शायद संभव ही नहीं है। लेकिन यह बात जरूर संभव है कि कांग्रेस के बड़े नेताओं को जिसमें राहुल गांधी प्रियंका गांधी तथा पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह की आलोचना करने के लिए इनका उपयोग किया जाएगा। कांग्रेस छोड़कर भाजपा में जाने वाले नेता अनुपम खेर तो नहीं बन सकते, क्योंकि अनुपम खेर में वह माद्दा है कि खुले मंच में वह राहुल गांधी की आलोचना कर सकते हैं, लेकिन यदि आप आशुतोष राणा की बात करें तो हिंदी साहित्य के प्रकांड विद्वान के पास राहुल गांधी के पक्ष में बोलने के लिए ‘मौन और मुस्कानÓ की किताब के अलावा और कुछ भी नहीं है। इस संपादकीय का लब्बेलुआब यह है कि भाजपा को छोड़कर कमलनाथ का दामन थामने वाले नेताओं को अभिनेता अनुपम खेर का भाषण जो कल टेलीग्राफ के मंच पर कोलकाता में हुआ था, वह जरूर सुनना चाहिए। और कांग्रेस छोड़कर जाने वाले लोगों को उत्तरप्रदेश में प्रियंका गांधी के प्रति आकर्षण और उनकी भाषण शैली को समझने की जरूरत है।

विशेष संपादकीय के लेखक इस पत्र समूह के प्रधान संपादक हैं।