विवेक तन्खा-राकेश सिंह 50-50

जबलपुर में भाजपा-कांग्रेस में सीधा मुकाबला है तो, लेकिन जनता कनफ्यूज्ड है किसे चुने इसलिए

विशेष रिपोर्ट
विजय कुमार दास

जबलपुर, 31 मार्च। मध्यप्रदेश की संस्कारधानी जबलपुर को आज तक कोई ऐसा नेता नहीं मिला, जो पूर्व मुख्यमंत्री स्व. द्वारिका प्रसाद मिश्रा के बाद जबलपुर के विकास के बारे में ठोस विजन प्रस्तुत कर सके। इसी के चलते जिस जबलपुर को देश के पूर्व प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू ने मध्यप्रदेश की राजधानी बनाने का मन बनाया था, वह जबलपुर अब केवल संस्कारधानी है। 30 साल पहले का जबलपुर गुंडों के शहर के नाम से ख्याति प्राप्त कर लिया था, इसलिए जबलपुर का समुचित विकास करने वाला कोई ऐसा नेता तीन दशकों में पैदा नहीं हुआ जो जबलपुर का राजधानी के बराबर का विकास का आकार देने में सफल हो जाए। पहली बार जबलपुर में ऐसा हो रहा है कि 2019 को लोकसभा चुनाव राष्ट्रीय मुद्दों के बजाय जबलपुर लोकसभा क्षेत्र के विकास के मुद्दों पर लड़ा जाएगा। राष्ट्रीय हिन्दी मेल के इस प्रतिनिधि ने जबलपुर लोकसभा क्षेत्र के सभी विधानसभा क्षेत्रों में अपनी टीम के साथ दौरा किया और पाया कि भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष वर्तमान संसद सदस्य राकेश सिंह के सामने यदि कांग्रेस ने बुद्धिमान अधिवक्ता विवेक तन्खा को मैदान में उतार दिया, जिसकी संभावना 100 प्रतिशत है तो मुकाबला दिलचस्प हो जाएगा। शहरी क्षेत्रों में 50 प्रतिशत लोगों का मत है कि यदि विवेक तन्खा कांग्रेस के उम्मीदवार होते हैं तो उनके बारे में सकारात्मक राजनीति उभरकर सामने आएगी। ठीक इसी तरह ग्रामीण अंचलों में 50 प्रतिशत लोगों का मत है कि वर्तमान सांसद राकेश सिंह ने ग्रामीण अंचलों का जो विकास किया है, अच्छे परिणाम उन्हें मिल सकते हैं। राष्ट्रीय हिन्दी मेल की टीम ने कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के देश का चौकीदार चोर है, इस नारे को लेकर जब राय जाननी चाही तो अधिकतर शहरी इलाकों में ही इसका असर देखने को मिला। लेकिन दूसरी ओर मैं भी चौकीदार हूं, चौकीदार चौकन्ना है, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की गर्जना पर भी लोगों की प्रतिक्रिया विपरीत नहीं आई लेकिन खामोशी कुछ इस तरह है जैसे जबलपुर लोकसभा क्षेत्र में तूफान के आने का संकेत है। 100 महिला मतदाताओं से जबलपुर की राजनीति को लेकर हमारी टीम ने जब बात की तो महिला सशक्तिकरण के मामले में भाजपा के पक्ष में माहौल अभी भी कायम रहता दिखाई दिया है। मतदान के पहले तक महिलाओं की यह अवधारणा कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी के दौरे के बाद कितनी बदलेगी, यह खोज का विषय है। शहरी क्षेत्रों में और विशेषकर जबलपुर में 75 प्रतिशत लोगों का मानना है कि जबलपुर में आज तक किसी ने कुछ नहीं किया, किसी के अच्छे नेता के अभाव में जबलपुर अब एक ‘बड़ा गांवÓ से बढ़कर कुछ नहीं रह गया। इसलिए विवेक तन्खा की दस्तक कांग्रेस की उम्मीदों के लिए एक बड़ी उपलब्धि हो सकती है लेकिन भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष राकेश सिंह संघ के बूथ स्तर पर व्यवहारिक कब्जे से बड़े आत्मविश्वास के साथ चुनाव जीतने का दम भर रहे हैं। राष्ट्रीय हिन्दी मेल की टीम ने यह भी पाया कि जबलपुर लोकसभा क्षेत्र में नरेंद्र मोदी बनाम राहुल गांधी का मुद्दा चुनावी बहस से गायब है। यहां पर मुद्दा शिवराज सरकार का व्यापमं, दिग्विजय सिंह सरकार का बंटाधार और कमलनाथ सरकार के ठोस फैसलों के बीच में गर्म चर्चाओं का आधार बना हुआ है। इस विशेष रिपोर्ट का लब्बेलुआब यह है कि चाहे राकेश सिंह हों या विवेक तन्खा हों, जो जबलपुर के लिए ठोस उपलब्धि और दूर दृष्टि भरे इरादों के साथ मैदान में उतरेगा उसे ही सफलता मिलेगी। कुछ मतदाताओं ने जबलपुर को उपराजधानी का दर्जा दिलाने की मांग करते हुए कहा कि यह काम विवेक तन्खा के बस में है लेकिन वे कह सकें, दमखम से तभी बात बनेगी वरना जबलपुर लोकसभा क्षेत्र की यह सर्वे रिपोर्ट आज किसी के पक्ष में अपना निष्कर्ष नहीं निकालती। यदि विकास के मुद्दे सामने नहीं आए तो फिर देश का चौकीदार चोर और मैं भी हूं चौकीदार केबीच में जबलपुर के मतदाता उलझ कर रह जाएंगे तो किसी को आश्चर्य नहीं होगा। इसलिए जरूरत है चाहे राकेश सिंह हो या विवेक तन्खा, अपने चुनावी समर में चुनाव की पतवार संभल-संभलकर चलानी होगी, वरना खामोश बैठा यह जबलपुर लोकसभा क्षेत्र क्या कर जाए, किसके पक्ष में चला जाए, कुछ कहा नहीं जा सकता।