मध्यप्रदेश की जनता भोलीभाली है, प्लीज हैंडल विथ केयर

विशेष संपादकीय
विजय कुमार दास
मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ और पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान दोनों कहते हैं कि उनकी राजनैतिक जिन्दगी का मतलब है मध्यप्रदेश की जनता की भरपूर सेवा और मध्यप्रदेश का ऐसा विकास जिससे मध्यप्रदेश नंबर-1 राज्य बने। दोनों नेताओं का मध्यप्रदेश की सेवा का अलग-अलग अंदाज है और उसमे राजनीति भी अलग-अलग है। शिवराज कहते हैं जनता ही भगवान् है, मैं उनकी सेवा में सब कुछ न्योछावर करने के लिए तैयार हूँ तो दूसरी ओर कमलनाथ कहते हैं, मध्यप्रदेश की जनता भोली-भाली है वह सब कुछ बर्दाश्त कर सकती है लेकिन उसे ठगा जाए, यह वह कभी बर्दाश्त नहीं करेगी। विचारधाराओं से ये दोनों नेता अलग-अलग दलों में हैं, लेकिन सच तो यह है कि दोनों के मन में धर्मनिरपेक्षता के साथ-साथ उदारता की राजनीति की झलक भी है। इसलिए, बहुत कुछ बड़ी घटनाओं का असर भी इनको तनाव से दूर रखता है। हमने अपने इस सम्पादकीय में केवल कमलनाथ और शिवराज सिंह चौहान का ही जिक्र करना इसलिए उचित समझा है, क्योंकि लोकसभा का चुनाव भले केंद्र की नीतियों और राष्ट्रीय मुद्दों पर केंद्रित होता है लेकिन यहाँ पर तू डाल डाल-मैं पात पात के मुहावरे में केवल कमलनाथ और शिवराज सिंह चौहान ही हैं, दोनों प्रमुख दलों के मुख्य किरदार हैं। 45 वर्षों की पत्रकारिता के अनुभवों को साझा करते हुए मैं यह लिखने में गुरेज नहीं करूँगा कि चुनावों के दरम्यान निर्वाचन आयोग की सीमाओं से बाहर जाकर उम्मीदवारों द्वारा जितनी भी राशि चाहे वह लाखों में हो या करोड़ों में खर्च किये जाते हैं, यह रूपया बाकायदा जनता के जेब का वसूला हुआ होता है। गरीब आदमी को तो चुनाव में होने वाले करोड़ों अरबों के खर्चों से कोई लेना-देना नहीं होता, लेकिन लोकतंत्र का वह भी जिम्मेदार मतदाता है इसलिए इस उत्सव में बंटती हुई मिठाइयों में राजनितिक दलों के कार्यकर्ताओं के साथ-साथ हाथ कुछ इस तरह फैला देता है जैसे उसे लोकतंत्र के महायज्ञ में प्रसादी पाने का मौलिक अधिकार है। इस प्रसादी का मतलब कमलनाथ और शिवराज सिंह चौहान दोनों बखूबी समझते हैं। दोनों के नाम पर यदि करोड़ों अरबों रुपये चुनाव में खर्च होंगे तो निर्वाचन आयोग में हिसाब पूछने वाला भी थक जाता है और उसे जब हिसाब मिलता है तो सीमा के अंदर निर्धारित केवल 70 लाख रुपये। अब आप ही बताइए आज की तारीख में लोक सभा का चुनाव जिसमें 8 विधानसभाएं होती हैं, 1600 से अधिक मतदान केंद्र होते हैं वह क्या मात्र 70 लाख रूपए में लड़ा जायेगा? उत्तर होगा कदापि नहीं। लेकिन ,जब आयकर छापों में भाजपा के पुराने समर्थक अश्वनी शर्मा के यहाँ करोड़ों मिल जाएँ तो फिर वह कमलनाथ का करीबी होने का कलंक क्यों पाल रहा है? हम तो केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली के इस वाक्य से सहमत हैं कि शीशे के घरों में रहने वाले लोग पत्थर नहीं फेंका करते। जेटली जी से एक कदम आगे बढ़कर मैं यह लिखने का साहस करता हूँ कि मध्यपरदेश की जनता का दिल भी शीशे की तरह साफ है। शिवराज जी और कमलनाथ जी आप दोनों से मैं यह कहना चाहता हूँ, दो-चार सौ रूपये की क्रॉकरी के डिब्बे में तक लिखा होता है हैंडल विथ केयर। लेकिन, मध्यप्रदेश में जब नेता एक-दूसरे पर बरसते हैं तब वे भूल जाते हैं कि तबादले उद्योग, अवैध रेत खनन, होर्डिंग से लेकर बोर्डिंग तक का पैसा जो भी पिछले दरवाजे से आया, पहले शिवराज मुख्य मंत्री हैं तो उनके नाम पर आया, आज कमलनाथ मुख्यमंत्री हैं तो उनके नाम पर आया होगा तो चुनाव में तो इस्तेमाल होगा ही यह एक कड़वा सच है। मोदी सरकार ने संवैधानिक संस्थाओं का उपयोग करके माना कि कमलनाथ के करीबी ओएसडी या अश्वनी शर्मा के घर में छापे डलवा दिए लेकिन जो बरामद हुआ उस पर शिवराज ने कह दिया लूट का माल था। यही बात शिवराज के करीबियों पर हो जाती तो शायद कमलनाथ भी यही कहते। हमारा मतलब है कि आप यहाँ से लाएं या वहां से लाएं लोकसभा का चुनाव करोड़ों अरबों का है, इसलिए यदि अश्वनी शर्मा शिवराज सरकार में मंत्री गोपाल भार्गव के गलबहियां थे तो कमलनाथ के करीबी कैसे हुए? इस सवाल के तह में मत जाइए। रहा सवाल आरके मिगलानी का तो इस शख्स ने तो 40 सालों से कमलनाथ के साथ सगे भाई से भी बढ़ाकर रिश्ता निभाया है तो स्वाभाविक है व्यापारिक हिस्सेदारी का हिसाब किताब तो उन्हीं के पास होगा। हो सकता है सरकार बनने के बाद अवसरवादियों के पूजा-पाठ में अच्छी-खासी बढ़ोत्तरी हो गयी हो, जिसे आप राजनैतिक मुद्दा बनाकर अपने सामने वाले शीशे के मकान को तोडऩे के लिए इस्तेमाल नहीं कर सकते। इसलिए, मैं विनम्रता से आप दोनों से कहता हूँ मध्य प्रदेश की जनता का दिल भी शीशे की तरह साफ है, प्लीज हैंडल विथ केयर।