मध्यप्रदेश न मोदी के साथ, न राहुल के साथ


लोकसभा चुनाव 2019: मतदाताओं की समस्याएं हुईं ज्यादा अहम इसलिए 14 सीटों में शिवराज को उम्मीद और 14 पर कमलनाथ को भरोसा

विशेष रिपोर्ट
विजय कुमार दास

मध्यप्रदेश के साथ-साथ पूरे देश में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बकौल भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह, यह दावा करने से कोई नहीं रोक सकता कि 2019 का लोकसभा चुनाव फिर एक बार मोदी सरकार के नारों के साथ 2014 से अधिक सीटें भाजपा को मोदी के नाम पर ही मिल जाएंगी। वहीं दूसरी ओर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की आक्रामक प्रचार शैली ने कांग्रेस का जितना ग्राफ बढ़ाया है, उससे उनकी पार्टी के बड़े नेता जिसमें मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ और कांग्रेस के महासचिव गुना के सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया शामिल हैं, यह दावा करने से नहीं चूक रहे हैं कि इस बार केन्द्र में यूपीए की सरकार बनेगी और राहुल गांधी देश के अगले प्रधानमंत्री होंगे। लेकिन उत्तरप्रदेश में चुनाव का माहौल मोदीमय होने का दावा करने वाले अमित शाह को दक्षिण भाषी राज्यों में राहुल गांधी के समर्थन में क्षेत्रीय पार्टियां ऐसी चुनौती दे रही हैं, जिससे यह कहना गलत नहीं होगा कि इस बार दक्षिण में मोदी का जादू नहीं चलेगा। जहां तक सवाल है मध्यप्रदेश की 29 लोकसभा सीटों में जनता के रूझान का, तो भोपाल से लेकर झाबुआ तक और इंदौर से लेकर जबलपुर तक और रीवा से लेकर सागर तक अर्थात मध्यभारत, महाकौशल, विंध्य और बुंदेलखंड कहीं पर भी न मामला मोदीमय है और न ही मामला एकतरफा राहुल गांधी के साथ है। मध्यप्रदेश के लोकसभा चुनाव फिर एक बार शिवराज सरकार के 14 वर्षों के एन्टीइंकमबेन्सी तथा प्रो-इंकमबेन्सी को मुद्दा बनाकर जनता स्वयं लड़ रही है, जिसमें उनके दलगत फैसलों को भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवारों के चयन में बड़ा कारण माना जा रहा है।
कहने का मतलब है कि हिन्दुत्व के साथ-साथ पुलवामा और हिन्दू आतंकवाद के मुद्दे भोपाल जैसी लोकसभा सीट पर भी उतनी महत्वपूर्ण नहीं है, जितनी यहां की जनसमस्याएं। राष्ट्रीय हिन्दी मेल की टीम की शहरी क्षेत्रों में जनता के नब्ज टटोलने पर रिपोर्ट कहती है कि मध्यप्रदेश न तो मोदीमय है और न ही राहुल गांधी के साथ एकतरफा चलने को तैयार है। महाकौशल क्षेत्र में छिंदवाड़ा, जबलपुर, सिवनी, बालाघाट, बैतूल, मण्डला, शहडोल, मध्यभारत में गुना, शिवपुरी, ग्वालियर, भिण्ड, मालवा में खण्डवा, उज्जैन, इंदौर, धार और मंदसौर और विंध्य में रीवा, सतना, सीधी ऐसे क्षेत्र हैं जिसमें छिंदवाड़ा, गुना और शिवपुरी को छोड़कर सभी लोकसभा क्षेत्र बराबरी पर रणभूमि में हैं। जहां तक सवाल है मुरैना, उज्जैन, भोपाल, विदिशा और खरगौन इन सीटों पर या तो भारतीय जनता पार्टी एकतरफा कमाल करेगी या फिर कांग्रेस को कड़ी मेहनत के बाद भोपाल में सफल होने का अनुमान है। वैसे तो खजुराहो, दमोह और होशंगाबाद भी भाजपा की परंपरागत सीटों में शुमार है, लेकिन यह चुनाव मुख्यमंत्री कमलनाथ की सरकार के 100 दिन के फैसलों और जनता की समस्याओं को लेकर उनके सरोकारों का भी विश्लेषण कर रहा है। यह लिखने में संकोच नहीं है कि 14 सीटों पर भाजपा और 14 सीटों पर कांग्रेस का पराक्रम मध्यप्रदेश से एकमात्र सीधी की सीट में होने वाली जीत-हार पर यह संकेत देगा कि केन्द्र में किसकी सरकार बनने वाली है। राजनैतिक पर्यवेक्षकों को और मीडिया के विश्लेषकों का भी मानना है कि यदि मध्यप्रदेश में भोपाल, सीधी और इंदौर में कांग्रेस जीत जाती है तो केन्द्र में मोदी सरकार फिर से एक बार की संभावनाओं पर भी प्रश्नचिन्ह लग सकता है। इस रिपोर्ट का लब्बोलुआब यह है कि मध्यप्रदेश न तो मोदीमय है और न ही राहुल गांधी के साथ है, लेकिन मध्यप्रदेश के मतदाता जनता की समस्याओं, स्थानीय मुद्दों को लेकर विकास के मॉडल के प्रति उम्मीदवार की सजगता और उसकी योग्यता को आधार बनाकर ही निर्णय करेगी, इसमें संदेह नहीं है।
विशेष रिपोर्ट के लेखक इस पत्र समूह के प्रधान संपादक हैं।