विजय दास का शहर है भोपाल, सुबह नाश्ता कीजिए, समझदारी से मतदान करिए…


विशेष संपादकीय
विजय कुमार दास

भारतीय लोकतंत्र में 2019 का लोकसभा चुनाव देश के 65 प्रतिशत युवा मतदाताओं के लिए एक टर्निंग प्वाइंट है। इसलिए यह लोकसभा चुनाव जितना अहम है, उससे ज्यादा अहम भोपाल की लोकसभा सीट है। भोपाल लोकसभा क्षेत्र में राजधानी के 7 विधानसभा क्षेत्र का हर मतदाता निर्णायक होगा। मैं राष्ट्रीय हिन्दी मेल के सम्पादक के रूप में नहीं, बल्कि भोपाल लोकसभा क्षेत्र के एक जागरुक मतदाता के रूप में लिख रहा हूं, क्योंकि भोपाल शहर हर मतदाता का अपना शहर है। इसलिए मेरे उपरोक्त शीर्षक से आप चौंकिए मत क्योंकि यह मेरा अपना ही शहर है। जन्मभूमि छत्तीसगढ़ की हो सकती है राजनांदगांव, लेकिन कर्मभूमि मेरी भोपाल है, इसलिए भोपाल के सुख-दुख, वैभव और ऐश्वर्य तथा गौरवशाली परंपरा के साथ मेरी हर सांस जुड़ी हुई है।
वैसे तो मेरे जैसे बहुत सारे पत्रकार भोपाल में आए और चले भी गए, लेकिन मैंने भोपाल को संवारने का संकल्प इसलिए लिया है, क्योंकि 45 वर्षों से अधिक का समय यहां के हिन्दू-मुसलमान भाइयों के साथ सिर्फ पत्रकार के रूप में नहीं बल्कि एक परिवार के सदस्य के रूप में मैंने गुजारे हैं। मैंने लिखा है शीर्षक में कि भोपाल विजय दास का शहर है, इसका बारीकी से अर्थ या मतलब समझिए, जीतने वाला विजयी कहलाएगा और भोपाल में दास बनकर उसे रहना पड़ेगा। वरना भोपाल का इतिहास कभी बदलेगा नहीं। निर्वाचन आयोग रोज अपील करता है-मतदान करने जरूर जाइए, लोकतंत्र के महोत्सव को सफल बनाइए, यही बात मैं भी कहता हूं लेकिन मेरे कहने का अंदाज अलग है। मेरी अपील है कि सुबह उठिए, तैयार होइए, नाश्ता करिए और मतदान करने निकल जाइए, ताकि आपको लू और धूप के थपेड़े न लगें। बिना तकलीफ के बढिय़ा मतदान हो जाए, जब आप घर लौटें तो पड़ोसियों को भी बताइए कि आप मतदान करके आ गए हैं, वे भी जाएं मतदान करें और साथ में यह भी कहिए- मतदान समझदारी से करिए, मुझे उम्मीद है भोपाल लोकसभा क्षेत्र पूरे देश में हॉट सीट है और यहां लोकसभा का परिणाम तय करेगा कि देश दाएं चलेगा या बाएं चलेगा। या फिर 65 प्रतिशत युवा मतदाताओं के साथ सीधे चलेगा।
अब आइए हम बात करें भोपाल लोकसभा क्षेत्र की ख्याति को लेकर। कांग्रेस के उम्मीदवार दिग्विजय सिंह ने और भाजपा की उम्मीदवार प्रज्ञा ठाकुर ने इसे जरूरत से ज्यादा लोकप्रिय बना दिया है। प्रज्ञा के हिंदुत्व के चेहरे को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा के राश्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह आत्मविश्वास से लबरेज हैं। तो दूसरी और कांग्रेस के उम्मीदवार दिग्विजय सिंह का अनुभवी चेहरा, कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी और मुख्यमंत्री कमलनाथ के भरोसे को मजबूत बना रहा है। दिग्विजय सिंह और प्रज्ञा ठाकुर दोनों में समानता यह है कि दोनों बाहरी हैं। और उग्र भी हैं, लेकिन चुनाव के समय दोनों की उग्रता दबी जुबान से अग्नि परीक्षा के दौर में है। एक तरफ कट्टर हिंदुत्व और प्रधानमंत्री के 5 वर्षों के कार्यकाल की बैलेंस शीट जनता के सामने है तो दूसरी तरफ नरम हिंदुत्व और 72000 रुपए सालाना का राहुल गांधी का नया बैंक खाता दिग्विजय सिंह के साथ है। लेकिन जनता के दिमाग में या विजय दास जैसे मतदाता के दिमाग में शायद सुबह 8 बजे तक यह बात समझ में आएगी कि किसे वोट देने से भोपाल का फायदा है। अमित शाह का संकल्प पत्र और राहुल गांधी का घोषणा पत्र तथा भोपाल लोकसभा क्षेत्र के दोनों उम्मीदवारों की भोपाल के विकास के प्रति राजनीति का तरीका विश्लेषण का विषय जरुर होगा। मैं मानकर चलता हूं कि इस बार भोपाल में एकतरफा कुछ भी नहीं होगा, बस इतना जरूर होगा कि मतदान 80 प्रतिशत से ऊपर होगा, क्योंकि धु्रवीकरण की संभावनाएं भोपाल में इस समय मुद्दा नहीं हैं। इस समय मुद्दा है झूठ और सच के बीच में किसी एक को चुनना। और मुद्दा है 15 साल तथा 5 साल का हिसाब मांगने वाले मुख्यमंत्री कमलनाथ का मध्यप्रदेश में नरेंद्र मोदी से मुकाबला। कौन बनेगा प्रधानमंत्री यह तो देश का मुद्दा हो सकता है लेकिन भोपाल में कौन बनेगा सिकंदर, यह एक बड़ा और अहम मुद्दा है।
संपादक होने के नाते न काहू से दोस्ती न काहू से बैर, लेकिन यह कहने में संकोच नहीं कि विश्व के नक्शे में भोपाल का गैस कांड और व्यापमं का कलंक इसे कौन धो सकता है, यह हमारे लिए भोपाल लोकसभा सीट को लेकर साढ़े सात लाख युवा बेरोजगारों के साथ इस समय सोचने और निर्णय लेने का विषय है। जहां तक सवाल है भोपाल के विकास का, दिग्विजय सिंह हों या प्रज्ञा ठाकुर, दोनों कर सकते हैं, लेकिन वोट डालने वाले मतदाता उम्मीदवारों से आज की तारीख में जरूरत से ज्यादा विजनरी हैं। इसलिए मेरी प्रार्थना है कि यदि आप सचमुच में भोपाल को विश्व के नक्शे में गौरशाली बनाना चाहते हैं तो सुबह उठिए, नाश्ता करिए और समझदारी से मतदान करने जरूर जाइए।