झुक कर सलाम करने को दिल चाहता है…


भोपाल का राजपथ

सुनील दत्त तिवारी
देशी और विदेशी मीडिया में टीआरपी के लिए सबसे हॉट इवेंट बनाए गए भोपाल लोकसभा सीट का चुनाव शांतिपूर्ण संपन्न हो गया। सभी मीडिया हाउसेस की अपेक्षा के विपरीत इतने सलीके से निर्विघ्न संपन्न हुए चुनाव के बाद अफसोस गंगा-जमुनी तहजीब की भोपाली जनता को वो श्रेय नहीं मिला, जिसकी वाजिब हकदार थी। दरअसल पूरे देश की नजरें भोपाल के निर्वाचन पर टिकी हुई थीं, कुछ लोग अनायास ही अनहोनी का कयास लगा रहे थे। लेकिन, भोपाल की जनता के अलावा दोनों ही प्रमुख राजनैतिक दलों के परिपक्व नेतृत्व, चुनाव आयोग का प्रोएक्टिव रवैया और स्थानीय पुलिस के अलावा राज्य के प्रशासनिक अमले का भी इस चुनाव में बेहतरीन योगदान के लिए, झुककर सलाम करने को दिल चाहता है। दरअसल, पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह की उम्मीदवारी के बाद से ही कुछ लोग गैस पीडि़तों का दंश झेल चुके इस शहर को ध्रुवीकरण का नया केंद्र बनाने की चाह रखने लगे थे। एक वर्ग का दूसरे वर्ग से अविश्वास पैदा कर सालों से चली आ रही सौहार्द की, विश्वास की दीवार दरकाने के भी प्रयास परदे के पीछे चल ही रहे थे। लेकिन, 12 मई को मतदान समाप्त होने के बाद ऐसे तत्वों की उम्मीदें भी धराशायी हो गयीं। लोकतंत्र के इस महापर्व में प्रतिस्पर्धात्मक होड़ में आगे निकल जाने की जिद में किसी भी दल ने अपनी मर्यादा नहीं तोड़ी, इसके लिए वो भी साधुवाद के पात्र हैं। भारतीय जनता पार्टी की उम्मीदवार साध्वी प्रज्ञा ठाकुर ने चुनाव की शुरुआत में शहीद हेमंत करकरे को लेकर जो बयान दिया (जिस पर उन्होंने तत्काल माफी मांगी) उसके बाद उन्होंने भी शब्दों की मर्यादा को तोडऩे का काम नहीं किया। राजनैतिक तपिश के कारण एक्का-दुक्का बयानों को छोड़ दिया जाए तो साध्वी ने यह चुनाव एक सुलझे हुए राजनेता की ही तरह लड़ा, जिसे यह पता था कि कब, कहाँ और क्या बोलना है। हालांकि उनके इस व्यवहार से मीडिया को निराशा ही हाथ लगी, जो हमेशा एक सेंसेशनल बाइट के लिए दिन-रात साध्वी के पीछे घूमता रहा है। दिखाऊ मीडिया को इससे भी ज्यादा परेशानी दिग्विजय सिंह के कुछ भी न बोलने से हुई। इस पूरे चुनाव अभियान के दौरान आधुनिक राजनीति के चाणक्य दिग्विजय सिंह ने कोई ऐसा बयान नहीं दिया, जो नेशनल हेडलाइन बनी हो। ये वाकई पूर्व मुख्यमंत्री के स्वभाव के सर्वथा विपरीत ही था, लेकिन उन्होंने इस चुनाव में अपना पूरा ध्यान मतदाताओं से संगत बैठाने में ही लगाया। सभी को उम्मीद थी कि इतने लम्बे चुनाव अभियान में और लगातार उकसाने पर दिग्विजय कोई न कोई ऐसी बात बोलेंगे जिस पर मीडिया हाउस में बैठे लोग अपने-अपने तरीके से भावार्थ खोजने की कोशिश करेंगे। मतदान हो गया लेकिन कांग्रेस प्रत्याशी दिग्विजय सिंह ने एक भी ऐसा मौका नहीं दिया जिससे कटुता पैदा हो। लिहाजा, वो भी इस महोत्सव को बिना व्यवधान सम्पादित कराने के लिए बड़े भागीदार हैं। मध्यप्रदेश के संवेदनशील और अनुभवी मुख्य सचिव सुधि रंजन मोहंती, पुलिस के मुखिया वसंत कुमार सिंह और उनकी गुप्तचर शाखा के अलावा स्थानीय भोपाल पुलिस ने भी पूरी मुस्तैदी से काम करते हुए भोपाल को ध्रुवीकरण का केंद्र बनाने वाले मंसूबों पर पानी फेर दिया। फिर भोपाल की जनता, जिसने इन चुनावों में रिकॉर्ड तोड़ मतदान तो किया, लेकिन बिना भय, पक्षपात, अनुराग और द्वेष के उससे बड़ी बात भोपाल की संस्कृति और संस्कारों को आदर्शों के उच्च मानदंडों पर स्थापित करते हुए। चुनाव हो गया, आगे भी अपना प्रतिनिधि चुनने के अवसर आते रहेंगे, लेकिन लोकतंत्र की सच्ची जीत भोपाल के जमीं पर हुई और इसकी खुशबू पूरे देश में फैले, लिहाजा इकबाल अजीम ने कहा था कि झुक कर सलाम करने में क्या हर्ज है मगर, सर इतना मत झुकाओ कि दस्तार गिर पड़े, के बावजूद मेरा दिल करता है कि सभी को झुककर सलाम करूं।