मजबूत होंगे कमलनाथ…


यूपीए की सरकार केंद्र में नहीं बनी तो भी

विशेष टिप्पणी
सुनील दत्त तिवारी

2019 लोकसभा चुनाव के बाद संभावित परिणामों को देखने के लिए सर्वे एजेंसियों के अनुमान को लेकर एक बहस तो चल रही है और एग्जिट पोल की वास्तविकता और सच्चाई पर कई सवाल भी खड़े हो चुके हैं। और यह भी सही है कि कई बार एग्जिट पोल चुनावी गणित को समझने में नाकाम भी साबित हुए हैं। इस पर आगे भी बहस होती रहेगी, लेकिन यदि आज के एग्जिट पोल के सभी नतीजों को जोड़कर उनका औसत निकाला जाए तो संभावना बनती दिख रही है कि केंद्र में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में एनडीए एक बार फिर सरकार बनाती नजर आ रही है और मेरी टिप्पणी इन्हीं संभावनाओं को परिणामों में तब्दील मानते हुए लिखी जा रही है। दरअसल ऊपर की हैड लाइन आपको अविश्वसनीय लग सकती है, लेकिन यह भी जरूर है जब-जब केंद्र और राज्य में अलग अलग दलों का शासन रहा है, तब-तब राज्य में सत्ताधारी दल के मुखिया को मजबूती मिली है। यह कोई अतिशयोक्ति नहीं बल्कि पूर्व में कई बार ऐसे परिणाम सामने आए हैं। जैसा कि एग्जिट पोल दिखा रहे हैं कि केंद्र में यूपीए की सरकार नहीं बन पा रही है। तो ऐसे में मध्यप्रदेश के संभावित राजनैतिक परिस्थितियों पर भी ऑकलन जरूरी होता है। ऐसी संभावनाओं के बाद यह माना जा सकता है कि मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ इन परिणामों के बाद और अधिक मजबूत बनकर सामने आएंगे, हालांकि इस बात में भी कोई दो राय नहीं कि अभी तक सत्ता संचालन उन्होंने अपनी ही मर्जी से किया है। लेकिन कभी कभी पार्टी के क्षेत्रीय क्षत्रपों के दबाव और प्रभाव का भी प्रमाण देखने को मिला है। इस पूरे लोकसभा चुनाव प्रचार अभियान के दौरान मुख्यमंत्री कमलनाथ एक योद्धा की तरह नेतृत्व करते दिखाई दिए। परंतु पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के हाथ में 1800 तबादलों का मुद्दा जबरन हाथ लग गया और शिवराज ने चिल्ला-चिल्लाकर कहा पैसे ला और आर्डर ले। पूरे प्रदेश में 250 से ज्यादा छोटी-बड़ी सभाएं और रोड शो में कमलनाथ ही आकर्षण का प्रमुख केंद्र बने। शायद यही वजह है कि कांग्रेस पार्टी के वोट प्रतिशत में इजाफे की जो संभावना एग्जिट पोल में बताई जा रही है तो उसका श्रेय भी यदि मुख्यमंत्री को दें तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए। कांग्रेस की सीटें भी इस चुनाव में बढ़ रही है, लेकिन जिन क्षेत्रीय क्षत्रपों ने तबादले और अन्य अप्रासंगिक चीजों के लिए लगातार मुख्यमंत्री पर दबाव बनाया यह भी उतना ही सच है कि इस चुनाव में वे कमलनाथ के कंधे से कंधा मिलाकर चलने में असफल ही साबित हुए। कांग्रेस महासचिव ज्योतिरादित्य सिंधिया ने ग्वालियर-चंबल के गढ़ को बचाने की पुरजोर कोशिश की और वे लगातार इन्हीं अंचलों में सक्रिय रहे लेकिन अन्य नेता पार्टी की रीति और नीति को आम जनता तक पहुंचाने में प्रयास करते दिखाई नहीं दिए। शायद 23 मई के बाद ऐसे कई बयानवीर मंत्रियों के पर भी कतरने की तैयारी है। जिन्होंने वादे तो बड़े किए लेकिन उस पर अमल नहीं कर पाए। कांग्रेस पार्टी का राष्ट्रीय नेतृत्व जिसने विपरीत परिस्थितियों में कमलनाथ को एक बड़ी जिम्मेदारी सौंपी थी, निश्चित तौर पर इस परिणाम के आने के बावजूद भी उनका कद और बढ़ेगा, साथ ही वे हर स्तर पर चाहे वह संगठनात्मक हो या फिर अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के संचालन के लिए पोलिटिकल फंड जुटाने का मामला ही क्यों न हो, कमलनाथ पर सोनिया गांधी, राहुल गांधी और प्रियंका गांधी की निर्भरता और बढ़ेगी, मतलब साफ है अब कमलनाथ मध्यप्रदेश में ही नहीं, पूरे देश में मजबूत नेता के रूप में उभरकर सामने आ जाएंगे।
शिवराज सिंह चौहान शिवराज सिंह चौहान शिवराज सिंह चौहान