चुनाव आयोग के लिए ‘एग्जिट-पोल पेड न्यूज है या नहीं…?


मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल विशेषज्ञों से शायद ले रहे हैं सलाह, अखिलेश और मायावती भी पूछ रहे हैं कि

विशेष संपादकीय
विजय कुमार दास

भारतीय लोकतंत्र में 2019 का लोकसभा चुनाव देश के लिए बिना मुद्दे का ही चुनाव माना जाएगा, क्योंकि यह चुनाव प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के हिन्दुत्व एवं राष्ट्रवाद तथा कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की मोदी को हराने की जिद को लेकर ही लड़ा गया। देश के विकास के मुद्दे, बेरोजगारों के मुद्दे और भविष्य में भारत का विश्व नेतृत्व करने की क्षमता को लेकर जनता के सामने खुलकर अपनी बात रखने के बजाय नेताओं ने गाली-गलौच और अमर्यादित भाषाओं की सारी सीमाओं को पार करते हुए 2019 के लोकसभा चुनाव को उत्सव के बजाय राजनैतिक महत्वाकांक्षाओं की सीमा के अंतर्गत ही दोनों दलों के नेताओं के साथ-साथ मोदी विरोधी सभी नेताओं ने बांध लिया। एक तरफ नरेन्द्र मोदी तो दूसरी तरफ पूरा विपक्ष यह बात तो उस समय भी चली थी, जब श्रीमती इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री का पद छोडऩा ही नहीं चाहती थी और पूरे देश के विपक्ष को एक मंच पर विचारों के मेल नहीं होते हुए भी एक होना पड़ा था। 2019 के लोकसभा चुनाव में भी कमोबेश स्थिति 1977 वाली तो है, लेकिन इस चुनाव में आपातकाल जैसा कोई मुद्दा विपक्ष के पास नहीं है। राहुल गांधी ने लड़ाई बहुत बहादुरी से लड़ी, लेकिन राफेल को लेकर अंतत: उन्हें बैकफुट पर आना पड़ा। चुनाव निपट गया, लेकिन परिणाम आने के 72 घंटे पहले पूरे देश में 8 बड़ी सर्वे एजेंसियों ने एनडीए को बहुमत और नरेन्द्र मोदी को दूसरी बार प्रधानमंत्री बनाए जाने का अपने-अपने एग्जिट पोल में दावा कर दिया है। सभी सर्वे एजेंसी की रिपोर्ट औसतन ठीक उसी तरह की है, जिस तरह 2015 में विधानसभा के दिल्ली और बिहार के चुनाव में एग्जिट पोल आया था।
सेंट्रल प्रेस क्लब के राष्ट्रीय अध्यक्ष अरूण दीक्षित ने अपने एक पोस्ट में यह लिखा है कि ”अगर एग्जिट पोल को सही मान लिया जाए तो यह काम करने वाली कंपनियों से एक सवाल तो बनता है कि इस काम पर कुल कितना पैसा खर्च हुआ? साथ ही यह सवाल भी पूछा जाएगा कि यह पैसा कहां से आया? उपरोक्त सभी कंपनियों के आंकड़ें मान लिए जाएं तो उन्होंने लाखों लोगों से संपर्क किया इस हिसाब से कई सौ करोड़ रुपए खर्च हुए होंगे। अत: यह बात देश को पता चलना चाहिए कि इन कंपनियों द्वारा खर्च किया गया धन किनके पास था या फिर किसी ने उन्हें अपने हित के लिए धन मुहैया कराया। अगर नहीं तो फिर सवाल यह है कि तो क्या इन्होंने किसी के इशारे पर फर्जीवाड़ा किया है। वैसे फर्जियों के इस दौर में सच का पता लगाना थोड़ा कठिन है, लेकिन सच सामने लाया ही जाना चाहिए।
इधर छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने एग्जिट पोल को पूरी तरह से खारिज कर दिया है और दूसरी ओर मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ ने एग्जिट पोल को मनोरंजन पोल की संज्ञा दे दी है। राष्ट्रीय हिन्दी मेल के संपादक की हैसियत से मुझे यह लिखने में गुरेज नहीं है कि भारत के निर्वाचन आयोग को एग्जिट पोल के ऊपर किए जा रहे संदेह की सच्चाई को सामने लाना चाहिए। कमलनाथ, भूपेश बघेल और समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव तथा बहुजन समाज पार्टी की मायावती सबने एकस्वर में एग्जिट पोल की निंदा क्यों की, उसे खारिज क्यों किया, इस सवाल का उत्तर अब देश के उन 65 प्रतिशत युवा मतदाताओं को चाहिए, जिन्होंने लोकतंत्र के इस महोत्सव में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया है।
हम यह नहीं कहते कि एग्जिट पोल पेड न्यूज की श्रेणी में आना चाहिए, लेकिन जिस तरह के सवाल एग्जिट पोल की प्रक्रिया को लेकर खड़े किए जा रहे हैं, वह निश्चित रूप से सर्वे एजेंसियों के खिलाफ एक संगीन आरोप है। हमने आज छत्तीसगढ़ में लोकसभा के एक उम्मीदवार से पूछा कि एग्जिट पोल के बारे में आपका क्या मत है तो उन्होंने कहा कि मेरे लोकसभा क्षेत्र की सीमा 200 किलोमीटर है, 20 दिन में अर्थात चुनाव चिन्ह आवंटित होने के बाद मैं एक तिहाई क्षेत्र का दौरा ही नहीं कर पाया। आश्चर्य की बात यह है, वे आगे कहते हैं कि ये एग्जिट पोल वाले दिल्ली में बैठकर 7 लाख लोगों से बात भी कर लेते हैं और परिणाम आने से पहले उम्मीदवारों के चेहरे की खुशी को या तो गायब कर देते हैं या फिर अतिउत्साह में ऐसे बयान देने के लिए मजबूर कर देते हैं, जिसकी भारतीय लोकतंत्र में कोई गुंजाइश नहीं है। हमने मध्यप्रदेश के भोपाल लोकसभा क्षेत्र में भी लोगों से बातचीत की, तो व्यापारी कहते हैं हमसे तो कोई पूछने नहीं आया, युवा कहते हैं कि हमने उन एजेंसियों का भी नाम नहीं सुना, जिन्होंने 350 सीटों का एनडीए को दावा किया है, आखिर लोकतंत्र में एग्जिट पोल की कवायद संदेह के घेरे में क्यों आ गई, यह मेरा दोनों प्रमुख दलों के राष्ट्रीय अध्यक्षों से सवाल भी है और इसका उत्तर ढूंढने के लिए मैं अपील करता हूं कि एग्जिट पोल के परिणामों से यदि आप संतुष्ट नहीं हैं तो चुनाव आयोग से यह पूछा जाना चाहिए कि क्या एग्जिट पोल पेड न्यूज की श्रेणी में आता है या नहीं…?

कमलनाथ ने लिखा गोपाल भार्गव को पत्र, कहा जनहित के मुद्दे पर चर्चा के लिए सदैव तैयार हैं
भोपाल। मध्यप्रदेश विधानसभा में विपक्ष के नेता गोपाल भार्गव के द्वारा राज्यपाल को विधानसभा का सत्र आहूत करने के संबंध में लिखे गए पत्र के एक दिन बाद आज मुख्यमंत्री कमलनाथ ने गोपाल भार्गव को पत्र लिखकर कहा है कि वे जनहित के मुद्दे पर चर्चा के लिए सदैव तैयार हैं।
कमलनाथ ने भार्गव को संबोधित तीन पेज के पत्र में राज्य सरकार की विभिन्न योजनाओं का जिक्र करते हुए कहा कि आपने (भार्गव ने) बिना किसी तथ्यों की जानकारी के मात्र अनुमान और कल्पना के आधार पर राज्यपाल को पत्र लिखा है। मुख्यमंत्री ने कहा कि वे जनहित से जुड़े किसी भी मुद्दे पर चर्चा के लिए सदैव तैयार हैं। यदि शासन से जुड़ी हुयी कोई भी शंका या प्रश्न भार्गव के मन में हो, तो उसका समाधान करने में उन्हें (मुख्यमंत्री) को खुशी होगी। कमलनाथ ने पत्र की शुरूआत में लिखा है कि विपक्ष के नेता की ओर से राज्यपाल को लिखे गए पत्र की प्रतिलिपि मुख्यमंत्री के रूप में उन्हें भी प्रेषित की गयी है। नेता प्रतिपक्ष के पत्र में राज्य सरकार द्वारा दी जा रही विभिन्न सेवाओं में कमी बताते हुए इन विषयों पर चर्चा करने के लिए विधानसभा का विशेष सत्र बुलाने का अनुरोध किया गया है। मुख्यमंत्री ने कहा कि उन्हें ऐसा प्रतीत होता है कि नेता प्रतिपक्ष लोकसभा चुनाव में व्यस्तताओं के कारण आम नागरिकों से जुड़ी हुयीं सेवाओं और उनकी समस्याओं की ओर संभवत: ध्यान नहीं दे पाए हैं और अनभिज्ञ हैं। इस कारण इस तरह का अनुरोध पत्र में किया गया है। उन्होंने कहा कि मौजूदा सरकार ने 10 मार्च को आदर्श आचार संहिता लगने के बीच लगभग ढाई माह में अनेक जनकल्याणकारी महत्वपूर्ण निर्णय लिए। इस अवधि में लगभग 85 वचन पूरे किए गए। इसमें सर्वाधिक महत्वपूर्ण निर्णय किसानों की ऋण माफी को लेकर है और इसके जरिए अभी तक 21 लाख किसानों के फसल ऋण माफ किए गए।
मुख्यमंत्री के अनुसार पूर्ववर्ती सरकार के खजाना खाली छोड़े जाने के बावजूद मौजूदा सरकार ने भावांतर और गेहूं पर प्रोत्साहन योजना का लाभ किसानों को देना जारी रखा है। कमलनाथ ने भार्गव पर आरोप लगाया कि उन्होंने गेहंू और चने के उपार्जन एवं भुगतान के संबंध में भी भ्रमित करने का प्रयास किया। आज तक राज्य में 11 लाख किसानों से 68 लाख टन से अधिक गेहंू, चना, मसूर और सरसों का उपार्जन किया गया। इसके साथ ही किसानों को उनके खाते में सात दिनों के अंदर भुगतान किया जा रहा है। जबकि पहले किसान भुगतान के लिए महीनों परेशान रहते थे।
संबल और अन्य योजनाएं भी जारी : मुख्यमंत्री ने विभिन्न आकड़े देते हुए कहा कि राज्य में संबल और अन्य योजनाएं भी जारी हैं। पेयजल की स्थिति भी बेहतर है। उन्होंने कानून-व्यवस्था की स्थिति नियंत्रण में बताते हुए कहा कि यही वजह है कि लोकसभा चुनाव पिछले चुनावों की तुलना में पूरी शांति से संपन्न हुए। कानून-व्यवस्था पर बेहतर नियंत्रण है और जो भी आपराधिक घटनाएं हुयी हैं, उसमें तत्काल कार्रवाई की गयी है।
लोकसभा चुनाव संबंधी एग्जिट पोल के नतीजे सामने आने के बाद भार्गव ने कल यहां पत्रकारों से चर्चा में कहा था कि मौजूदा स्थितियों के चलते राज्य की कांग्रेस सरकार को विधानसभा में बहुमत साबित करना चाहिए। इसके बाद उन्होंने राज्यपाल को एक पत्र लिखकर विभिन्न समस्याओं का जिक्र किया और उनसे विधानसभा का विशेष सत्र बुलाने का अनुरोध किया था। हालांकि पत्र में बहुमत साबित करने संबंधी बात का जिक्र नहीं था।

विशेष संपादकीय के लेखक इस पत्र समूह के प्रधान संपादक हैं।