कमलनाथ सरकार मजबूत, परंतु दिग्विजय फैक्टर बरकरार

चुनाव हारने के बाद ज्योतिरादित्य सिंधिया की आवाज दब गई, अब
विशेष संपादकीय
विजय कुमार दास

मध्यप्रदेश में कांग्रेस की कमलनाथ सरकार के बहुमत को लेकर जितनी अफवाहें बाजार में गर्म थीं, अब वह सब ठंडी पड़ गई हैं। पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने सेंट्रल प्रेस क्लब के ‘प्रेस से मिलिए कार्यक्रम में जब कहा कि कमलनाथ सरकार को हम नहीं गिराएंगे और न ही गिराने की कोशिश करेंगे, उसी समय मीडिया को यह आभास हो गया था कि अब कमलनाथ सरकार को कोई खतरा नहीं है। दूसरी तरफ मुख्यमंत्री कमलनाथ ने दो बार आगे आकर मीडिया के सामने कहा कि हम फ्लोर टेस्ट के लिए तैयार हैं, जब चाहे तब विशेष सत्र बुला लिया जाए और फ्लोर टेस्ट करा लिया जाए।
मुख्यमंत्री के इस आत्मविश्वास भरे बयानों के बाद मध्यप्रदेश की राजनीति में कमलनाथ सरकार गिराने को लेकर अटकलों का बाजार समाप्त हो गया, लेकिन कांग्रेस को अंदर से और बाहर से किन राजनीतिक नेताओं का समर्थन मिलेगा और सरकार बेधड़क चलेगी, इन सवालों को लेकर कयास लग ही रहे थे कि कल रातों-रात प्रशासनिक सर्जरी करते हुए दूसरी बार मुख्यमंत्री कमलनाथ ने चौका लगाया। बड़े एवं आला पुलिस अफसर इधर-उधर हो गए और प्रशासनिक गलियारों में फिर से एक बार चर्चा चल पड़ी कि आखिर कमलनाथ सरकार में कौन-कौन से नेताओं का फैक्टर प्रभावशाली है। 2019 लोकसभा चुनाव के परिणामों में मध्यप्रदेश से कांग्रेस का सूपड़ा साफ हो गया, लेकिन कमलनाथ अपना गढ़ बचाने में कामयाब हो गए। हारे हुए नेताओं में भोपाल लोकसभा सीट से पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह, गुना-शिवपुरी सीट से पूर्व केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया, सीधी लोकसभा सीट से विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष रहे अजय सिंह, खंडवा सीट से प्रदेश कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष अरुण यादव तथा रतलाम-झाबुआ सीट से कांतिलाल भूरिया उन नेताओं में से हैं, जिनको उम्मीद थी कि जीतने के बाद सरकार में उनकी दखलंदाजी बढ़ जाएगी, वे सब निराश हो गए। और तो और मुख्यमंत्री कमलनाथ के ऊपर से उपरोक्त सभी नेताओं का तबादलों को लेकर जो दबाव था, वह भी कम हो गया। परंतु प्रशासनिक हलकों में जिस तरह के आदेश प्रसारित किए जा रहे हैं, उससे स्पष्ट होता है कि कांग्रेस की गुटबाजी कायम है और कमलनाथ सरकार मजबूत है। जहां तक सवाल है पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह का तो यह कहने और लिखने में संकोच नहीं है कि भोपाल लोकसभा सीट को कांग्रेस के सारे बड़े नेता जानते थे कि हिंदुओं के धु्रवीकरण वाली सीट है, इसे कोई और नहीं निकाल पाएगा लेकिन सब कुछ ठीक रहा तो दिग्विजय सिंह के साफ्ट हिंदुत्व शैली की राजनीति कामयाब हो जाएगी। लेकिन ऐसा हो न सका, क्योंकि मोदी की आंधी में सब लुट गए तो बेचारे दिग्विजय अकेले क्या करते, राहुल गांधी भी आखिर परंपरागत सीट अमेठी से तो हार ही गए। सवाल उठता है कि यदि मुख्यमंत्री कमलनाथ मध्यप्रदेश का विकास करना चाहते हैं और वह भी छिंदवाड़ा मॉडल की तरह तो उनके सामने दो सबसे बड़ी चुनौती है जिसमें पहली चुनौती है केंद्र सरकार से उनके बेहतर से बेहतर संबंध स्थापित रहें और दूसरी सबसे बड़ी चुनौती है कि प्रशासनिक जमावट ऐसी हो, जिसमें सरकार की छवि नवीन पटनायक वाले उड़ीसा सरकार की बन जाए, जहां पर नवीन पटनायक ने 5 बार मुख्यमंत्री बनने का रिकार्ड तोड़ा है। इसलिए जिस तरह ज्योतिरादित्य सिंधिया हारने के बाद भोपाल नहीं आना चाह रहे हैं, यह भी एक गलत संकेत हैं और उन्हें पता होना चाहिए कि उनके समर्थकों में निराशा पैदा हो गई है। दूसरी तरफ पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह आज भी ऐसे बड़े फैक्टर हैं, जो कमलनाथ सरकार का सारथी बनकर डटे हुए हैं। दिग्विजय निराश भी नहीं हुए और न ही उन्होंने अपने समर्थकों को निराश होने का कोई मौका देने में हताशा जताई है। हमने जो समझा और जो देखा है, उसमें यह स्पष्ट है कि शासकीय मशीनरी की लगाम दिग्विजय के ही हाथ में है। तब सवाल उठता है कि विधानसभा अध्यक्ष नर्मदा प्रसाद प्रजापति, ज्योतिरादित्य सिंधिया, सुरेश पचौरी, अरुण यादव, कांतिलाल भूरिया, ये पांच पांडव कमलनाथ सरकार के साथ तालमेल बैठाने में अपनी भूमिका का निर्वहन किस तरह करेंगे। भाजपा की राजनीति अपनी जगह है, लेकिन कमलनाथ सरकार के प्रशासकीय संचालन में दिग्विजय सिंह की अहम भूमिका आज भी मायने रख रही है, इसमें संदेह नहीं है। फिर भी मुख्यमंत्री कमलनाथ को अपनी सरकार का मॉडल गुड गवर्नेंस, डिलेवरी सिस्टम को ठीक करने के लिए सभी अनुभवी चेहरों के साथ की जरूरत है और खासकर मध्यप्रदेश की मीडिया का साथ उनकी विजनरी सोच को बेहतर आकार दे सकता है, यह कहा जाए तो आश्चर्य नहीं होगा, लेकिन मुख्यमंत्री को मीडिया के संबंधों से पूर्वाग्रह की सूचनाओं को दरकिनार करना होगा।
विशेष संपादकीय के लेखक इस पत्र समूह के प्रधान संपादक हैं।