आदिवासी हितों के संरक्षण के प्रति सरकार प्रतिबद्ध: कमलनाथ

पूर्ववर्ती सरकार में निरस्त हुए पट्टों पर पुनर्विचार किया जाएगा
भोपाल, 18 जून।
मुख्यमंत्री कमलनाथ ने कहा है कि राज्य सरकार आदिवासियों के हितों के संरक्षण के प्रति वचनबद्ध है। इसलिए हमने सरकार में आते ही पूर्ववर्ती सरकार के कार्यकाल में साढ़े तीन लाख से अधिक आदिवासियों के पट्टे के जो आवेदन निरस्त किए गये थे, उन पर पुनर्विचार करने का आदेश दिया है। नाथ ने ये बात आज पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के साथ आए एक प्रतिनिधिमंडल से चर्चा के दौरान कही। प्रतिनिधि मंडल में बुधनी विधानसभा क्षेत्र के आदिवासी शामिल थे।
पूर्ववर्ती सरकार में निरस्त हुए थे 3 लाख 55 हजार आवेदन
मुख्यमंत्री कमलनाथ ने कहा कि हमारी सदैव नीति रही है कि आदिवासी वर्ग का न केवल सर्वांगीण विकास हो, बल्कि परम्परा से उन्हें मिले अधिकारों का संरक्षण भी हो। नाथ ने बताया कि वनाधिकार कानून 2006 यूपीए सरकार ने लागू किया था। इस कानून के अंतर्गत मध्यप्रदेश में 6 लाख 25 हजार आवेदन पूर्ववर्ती सरकार के शासनकाल में आए थे। इनमें से 3 लाख 55 हजार आवेदन निरस्त कर दिए गए थे। नई सरकार ने इन सभी आवेदनों का पुनरीक्षण कर पात्र कब्जा धारियों को वनाधिकार पत्र देने का काम शुरू किया है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि यही नहीं, हमने तेंदूपत्ता संग्रहण की दर 2000 रुपये प्रति मानक बोरा से बढ़ाकर 2500 रुपये की है। सरकार के इस निर्णय से तेंदूपत्ता संग्रहण के कार्य में लगे आदिवासियों को प्रति बोरा 500 रुपये का लाभ मिला है। यह राशि पूर्व में बैंकों के माध्यमों से तेंदूपत्ता श्रमिकों को दी जाती थी, जिससे उन्हें कठिनाई होती थी। नई सरकार ने यह निर्णय लिया कि तेंदूपत्ता संग्रहण की राशि का संग्राहक को नगद भुगतान किया जाएगा।
कमलनाथ ने कहा कि आज आदिवासी वर्ग को उनके पारंपरिक अधिकार देने और उनका संरक्षण करने के प्रति हमारी प्रतिबद्धता सर्वविदित है। इसलिए आदिवासी परिवारों के साथ किसी भी प्रकार के अन्याय को सरकार बर्दाश्त नहीं करेगी।

प्रदेश में वन अधिकार अधिनियम में प्राप्त दावों का 100 प्रतिशत निराकरण
मध्यप्रदेश में अनुसूचित-जनजाति और अन्य परम्परागत वन-निवासियों को उनकी काबिज भूमि पर अधिकार-पत्र सौंपने का कार्य वन अधिकार अधिनियम के अंतर्गत तेजी से किया जा रहा है। प्रदेश में अब तक अधिनियम के अंतर्गत वन अधिकार समितियों द्वारा सत्यापित दावों का 99.98 प्रतिशत निराकरण किया जा चुका है। प्रदेश में 2 लाख 66 हजार 208 मान्य दावों में से 2 लाख 55 हजार 152 दावेदारों को उनकी काबिज भूमि के हक प्रमाण-पत्र वितरित किये जा चुके हैं। शेष 11 हजार 56 दावेदारों के हक प्रमाण-पत्रों के वितरण की प्रक्रिया प्रचलन में है। वन अधिकार अधिनियम के प्रभावी क्रियान्वयन के लिये प्रदेश के सभी जिलों में ग्राम-स्तर पर ग्राम वन अधिकार समिति, उपखण्ड-स्तर पर उपखण्ड-स्तरीय वन अधिकार समिति और जिला-स्तर पर जिला-स्तरीय वन अधिकार समिति का गठन किया गया है। उल्लेखनीय है कि वन अधिकार समिति, ग्रामसभा एवं उपखण्ड-स्तर पर गठित समिति द्वारा सत्यापित दावों का 100 प्रतिशत निराकरण किया गया है। केवल जिला-स्तर पर 122 दावों का निराकरण लंबित है, जिसे अतिशीघ्र निराकृत कर लिया जाएगा।
वन अधिकार अधिनियम-2006 एवं नियम 2008 के तहत 31 मई, 2019 तक प्रदेश में कुल 6 लाख 26 हजार 511 दावे प्राप्त हुए। इसमें 5 लाख 84 हजार 457 व्यक्तिगत और 42 हजार 54 सामुदायिक दावे शामिल हैं। कुल प्राप्त दावों में अन्य परम्परागत वर्ग के 26.39 प्रतिशत, आदिवासी वर्ग के 73.61 और वन अधिकार समितियों द्वारा सत्यापित, ग्रामसभा द्वारा पारित संकल्प, उपखण्ड समितियों द्वारा प्रस्तुत दावे शामिल हैं। जिला स्तर पर 122 लंबित दावों में से 118 अजजा और 2-2 अन्य परम्परागत वर्ग के और सामुदायिक दावे हैं। जिला-स्तरीय समितियों द्वारा निरस्त दावों की संख्या 3 लाख 60 हजार 181 और मान्य दावों की संख्या 2 लाख 66 हजार 208 है। मान्य दावों में से 2 लाख 55 हजार 152 में हक प्रमाण-पत्र वितरित किये जा चुके हैं। शेष 11 हजार 56 हक प्रमाण-पत्र वितरण की कार्यवाही तेजी से की जा रही है। डिण्डोरी जिले में विशेष पिछड़ी जनजाति समूह के बैगा जनजाति की 7 बसाहटों में हैबीटेट राइट्स दिए गए हैं। इस मामले में मध्यप्रदेश देशभर में अग्रणी है।