30 वर्षों बाद विधानसभा में पहली बार अध्यक्ष ने सदस्यों को नियमों में बांध लिया…


विधानसभा अध्यक्ष प्रजापति का प्रशासन विधानसभा की गौरवशाली परंपराएं लौटने का संकेत, उन्होंने जो व्यवस्था दी उससे विपक्ष भी निरुत्तर रहा, इसका मतलब

विशेष संपादकीय
विजय कुमार दास

मध्यप्रदेश विधानसभा का पहला सत्र संभवत: 1956 में प्रारंभ हुआ था और इसी के साथ सदन में यह भी स्थापित हुआ था कि तत्कालीन प्रथम अध्यक्ष पंडित कुंजी लाल दुबे ने अनुशासन का पाठ पढ़ाते हुए सदस्यों को बता दिया था कि विधानसभा की गरिमा, अध्यक्ष की गरिमा, नेता पक्ष तथा नेता प्रतिपक्ष दोनों का अपने-अपने दलों में नेतृत्व के साथ सदस्यों को नियमों के अंतर्गत विधानसभा अध्यक्ष के संचालन में किस तरह करना है। कुंजी लाल दुबे द्वारा स्थापित गौरवशाली परंपरा तब तक चली, जब तक मध्यप्रदेश विधानसभा में पंडित श्रीनिवास तिवारी अध्यक्ष रहे, लेकिन उसके बाद विधानसभा सत्र का महत्व विधायकों के वेतन, भत्ते और सुविधाओं के साथ-साथ हल्ला बोल के असंसदीय आचरण में सिमट कर रह गया। पिछले 15 वर्षों का इतिहास विधानसभा का कुछ लिखने लायक इतिहास नहीं है, क्योंकि सदन को चलाने में न तो सत्ता पक्ष की रुचि होती थी और न ही विपक्ष, इसी के चलते लोकहित के मुद्दे सदन के अंदर से चूहे के रूप में बाहर निकल आते थे। 15 वर्षों में विपक्ष में कांग्रेस ने भी कोई ऐसा कमाल नहीं किया कि भाजपा सरकार के खिलाफ एक भी अविश्वास प्रस्ताव टिक जाए, इसका कारण था कि सदन को नहीं चलाने में दोनों दल एक मत हो जाते थे और जिस जनता ने अपनी आवाज उठाने के लिए उन्हें चुना, वे सबके सब कुछ इस तरह गुम हो जाते थे, जैसे जंगल में वन्य प्राणी। इस संपादकीय में मेरे जैसे पत्रकार का जिसने 45 वर्षों से विधानसभा मध्यप्रदेश के परंपराओं से लेकर अपरंपराओं तक उतार-चढ़ाव देखे हों, उसके द्वारा कड़े शब्दों का उपयोग कुछ वरिष्ठ विधायकों को बुरा लग सकता है, लेकिन मेरा सवाल उनसे है कि वे अपने आप ही से पूछें कि मध्यप्रदेश विधानसभा की गौरवशाली परंपरा पिछले 20 वर्षों में लगातार तार-तार क्यों हुई। पहली बार आज इतने वर्षों बाद हमें कुंजी लाल दुबे, यज्ञदत्त शर्मा, रामकिशोर शुक्ल और श्रीनिवास तिवारी याद आए, जब आसंदी से विधानसभा के अध्यक्ष नर्मदा प्रसाद प्रजापति ने सदस्यों को यह कहकर अनुशासन का पाठ पढ़ा दिया कि चाहे पक्ष हो या विपक्ष सबकी जिम्मेदारी है, नए सदस्यों को जो युवा हैं उन्हें भी सीखने का मौका दिया जाए और सदन में नियमों के अंतर्गत संचालन में सहयोग किया जाए। विधानसभा अध्यक्ष ने आज जब सदन के अंदर व्यवस्थाएं प्रारंभ की तो प्रश्नकाल के दौरान वरिष्ठ विधायकों के तो पांव जमीन से ही खिसक गए, क्योंकि अध्यक्ष ने स्पष्ट कहा कि एक सदस्य को अपने मूल प्रश्न तीन बार पूछने का अधिकार है और उस पर प्रति प्रश्न कोई भी विधायक केवल एक ही सवाल कर सकते हैं और सवाल करने के लिए बीच में खड़े होने की बजाय उनके पास पर्ची भेजी जाए, तब वे नाम पुकारेंगे और प्रति प्रश्न होगा। हमने जब विधानसभा अध्यक्ष से यह पूछा कि इस तरह का कड़ा अनुशासन नेता प्रतिपक्ष या वरिष्ठ विधायकों को आपत्ति जनक हो सकता है और ऐसी स्थिति में यदि कोई विधायक मुख्यमंत्री अथवा मंत्री के उत्तर से संतुष्ट न होकर सवाल करना चाहे तो क्या होगा। उन्होंने दो-टूक स्पष्ट कहा कि यदि अनुशासन ऐसा लागू नहीं होगा तो बहुत सारे विधायकों के प्रश्न जो लोकहित के मुद्दों से जुड़े हैं, वे धरे के धरे रह जाएंगे। उन्होंने दावा किया कि इस व्यवस्था को सत्तारूढ़ दल के नेता मुख्यमंत्री कमलनाथ और नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव सबको पसंद आना चाहिए। आज जब सदन में विधानसभा अध्यक्ष ने नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव को यह याद दिलाया कि वे चाहें तो नेता प्रतिपक्ष के रूप में सुंदरलाल पटवा और विक्रम वर्मा को भी याद कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि पटवा जी के समय लोकहित के किसी भी मुद्दे को दरकिनार नहीं किया जाता था और तब तक स्वस्थ बहस होती थी, जब तक मुद्दे का सकारात्मक हल न निकल जाए। अध्यक्ष ने आज स्वास्थ्य मंत्री तुलसी सिलावट को एक प्रश्न के उत्तर में यहां तक निर्देश दिया कि सदस्य हरदीप डंग ने जो गंभीर मामला किसी डॉक्टर को लेकर सदन के ध्यान में लाया है, उसकी जांच रिपोर्ट दो घंटे के भीतर सदन के पटल पर पेश किया जाए। क्या गजब ढाया आपने, अध्यक्ष के रूप में इस आत्मविश्वास की कोई सानी नहीं है। अब सभी मंत्रियों को सदन के अंदर संबंधित प्रश्न के उत्तर को लेकर तैयारी से आना पड़ेगा, वरना उस विभाग के मुखिया की भी खैर नहीं होगी, जिसने प्रश्न को टालने के लिए केवल यह कह दिया है कि हम जानकारी जुटा रहे हैं। अब यह भी नहीं चलेगा कि मंत्री सदन में अध्यक्ष को आश्वासन देंगे कि दोषी नौकरशाहों के खिलाफ जांच होगी फिर कार्यवाही होगी। अब तो गलत जानकारी सदन में आई तो नौकरशाह कितना भी बड़ा रसूखदार होगा, उसे सार्वजनिक रूप से जलील होना पड़ सकता है। जहां तक तुलसी सिलावट का उत्तर था, अध्यक्ष संतुष्ट होने का संकेत दे गए, लेकिन जब पारी आई नगरीय प्रशासन एवं विकास मंत्री युवा जयवद्र्धन सिंह का तो अध्यक्ष ने यह कहकर उन्हें सदन के सामने निरुत्तर किया कि हमने भी तुम्हें 35 लोगों के पट्टे देने की सूची दी थी उनके भी नाम नहीं जुड़े, इसलिए कृपया सावधान रहें। इस संपादकीय का लब्बोलुआब यह है कि यदि जिस तरह विधानसभा अध्यक्ष के रूप में पहली बार नर्मदा प्रसाद प्रजापति ने सदन को परंपराओं से बांधा और नियमों के अंतर्गत संचालित करने का साहस दिखाया, उससे किसी भी विधायक को विचलित होने की जरूरत इसलिए नहीं होगी क्योंकि यह उनके साथ-साथ मध्यप्रदेश विधानसभा की गौरवशाली परंपराओं को लौटाने एवं सदस्यों को संपूर्ण रूप से संरक्षण देने का इरादा समझ में आना चाहिए। बार-बार अब बहिर्गमन से भी शायद मध्यप्रदेश की विधानसभा को निजात मिल सकती है, क्योंकि विपक्ष इस बार जबरदस्त है, अनुभवी शिवराज सिंह चौहान जैसे सदस्य का नेतृत्व भी विपक्ष के सदस्यों को मिलेगा, यह उम्मीद की जानी चाहिए, अब परंपराएं लौटेंगी…?
विशेष संपादकीय के लेखक इस पत्र समूह के प्रधान संपादक हैं।